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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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पृष्ठ 357

३९२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
तन्तुवीरणयोर्वा संयोगे सति द्रव्यानुत्पत्तौ पूर्वोक्तेन विधानेनाश्रयविनाश-
संयोगाभ्यां तन्तुवीरणविभागविनाश इति ।
अथवा (इस स्थिति में भी आश्रय के नाश से विभाग का नाश हो
सकता है, जहाँ) तन्तु और वीरण (तृणविशेष) में संयोग होता है । इस
संयोग से किसी द्रव्य की उत्पत्ति नहीं होती; क्योंकि यह विजातीय दो
द्रव्यों का संयोग है । पहले कथित रीति के अनुसार आश्रय का विनाश
और संयोग इन दोनों से तन्तु और वीरण के विभाग का नाश होता है ।
न्यायकन्दली
समं विभागं करोत्येव, ततो विभागाच्च परमाणोराकाशसंयोगनिवृत्तावुत्तरसंयोगे सति
तदाश्रितस्य कर्मणो विनाशो भवत्येव ।
समानजातीयसंयोगे सति द्रव्योत्पत्तावाश्रयविनाशाद् विभागकर्मणोर्विनाशः कथितः,
सम्प्रति विजातीयसंयोगे द्रव्यानुत्पत्तौ संयोगाश्रयविनाशाभ्यां विभागविनाशं कथयति-तन्तु-
वीरणयोर्वा संयोगे सतिद्रव्यानुत्पत्तौ पूर्वोक्तेन विधानेनेति । तन्त्वारम्भकांशौ कर्मोत्पत्ति-
समकालं वीरणे कर्म, ततोंऽशुक्रियया अंशान्तराद् विभागो वीरणकर्मणा च तस्य विभज्य-
मानावयवेन तन्तुना आकाशाद्देशेन च समं विभागः क्रियते, ततोंऽशुविभागादंशुसंयोगविनाशो
को अवश्य ही उत्पन्न करती है । इसके बाद विभाग के द्वारा परमाणु और
आकाश के संयोग के नष्ट हो जाने पर उत्तर संयोग के बाद परमाणु में
रहनेवाली क्रिया का भी अवश्य विनाश होता है ।
(समानजातीय द्रव्यों के संयोग के रहने पर) द्रव्य की उत्पत्ति के बाद
आश्रय के विनाश से विभाग और क्रिया दोनों का ही नाश अभी कहा
गया है । अब विजातीय द्रव्यों के संयोग के रहने के कारण द्रव्य की उत्पत्ति
न होने पर भी संयोग और आश्रय के विनाश, इन दोनों से विभाग का
विनाश 'तन्तुवीरणयोर्वा संयोगे सति द्रव्यानुत्पत्तौ पूर्वोक्तेन विधानेन' इत्यादि
सन्दर्भ के द्वारा कहा गया है । इसकी यही प्रक्रिया है कि तन्तु के उत्पादक
अंशु में क्रिया की उत्पत्ति के समय ही वीरण (तृणविशेष) में भी क्रिया
उत्पन्न होती है । इसके बाद अंशु की क्रिया से दूसरे अंशु के साथ उसका
विभाग उत्पन्न होता है । वीरण की क्रिया से अवयव से विभक्त होते हुए
तन्तु के साथ एवं आकाशादि देशों के साथ भी विभाग उत्पन्न होते हैं ।