वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५१
प्रशस्तपादभाष्यम्
तत्र रूपं चक्षुर्ग्राह्यं पृथिव्युदकज्वलनवृत्ति द्रव्याद्यु-
पलम्भकं नयनसहकारि शुक्लाद्यनेकप्रकारं सलिलादिपरमाणुषु नित्यं
उनमें चक्षु से ही जिसका ग्रहण हो वही 'रूप' है । यह पृथिवी,
जल और तेज इन तीन द्रव्यों में रहता है । द्रव्यादि के प्रत्यक्ष के
उत्पादन में आँख का सहारा है । यह शुक्लादि भेद से अनेक प्रकार
का है । जलादि के परमाणुओं में यह नित्य है एवं पृथिवी के परमाणु में
न्यायकन्दली
सर्वपदार्थानामभिव्यक्तिनिमित्तत्यादादौ रूपं निरूपयति-तत्र रूपं चक्षुर्ग्राह्यमिति ।
तेषां गुणानां मध्ये रूपं चक्षुषैव गृह्यते नेन्द्रियान्तरेण । ननु रूपत्वमपि चक्षुषैव गृह्यते
कथमिदं वैधर्म्यं रूपस्य ? न, गुणेभ्यो वैधर्म्यस्य विवक्षितत्वात् । तथा च
प्रकृतेभ्यो निर्धारणार्थे तत्रेत्युक्तम् । सामान्यादस्य वैधर्म्यं तु सामान्यवत्त्वमेव ।
पृथिव्युदकज्वलनवृत्ति । पृथिव्युदकज्वलनेष्वेव वर्त्तते । द्रव्याद्युपलम्भकम् । यस्मिन्नाश्रये
वर्त्तते तस्य द्रव्यस्य तद्गतानां च गुणकर्मसामान्यानामुपलम्भकम् । नयनसहकारि । स्वगतं
रूपं चक्षुषो विषयग्रहणे सहकारि । शुक्लाद्यनेकप्रकारम् । शुक्लादयोऽनेके प्रकारा यस्य
तत् तथाविधम् । सलिलादिपरमाणुषु नित्यम् । सलिलपरमाणुषु तेजःपरमाणुषु च
रूप सभी वस्तुओं के प्रत्यक्ष में किसी न किसी प्रकार से अवश्य ही कारण
है, अतः 'तत्र रूपं चक्षुर्ग्राह्यम्' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा गुणों में सबसे पहले रूप का
ही निरूपण करते हैं । इन सभी गुणों में रूप चक्षु के ही द्वारा गृहीत होता है
और किसी भी इन्द्रिय के द्वारा नहीं । (प्र.) रूपत्व भी तो केवल चक्षु से ही
गृहीत होता है तो फिर 'चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व' रूपों का असाधारण धर्म कैसे है ?
(उ.) ऐसी बात नहीं है; क्योंकि और गुणों की ही अपेक्षा चक्षुर्ग्राह्यत्व को रूप का
असाधारण धर्म कहना यहाँ अभिप्रेत है, सभी पदार्थों की अपेक्षा नहीं । इसी
'निर्द्धारण' को ही समझाने के लिए 'तत्र' शब्द का प्रयोग किया गया है । रूपों
में जाति का रहना ही (रूपत्वादि) जातियों से रूप के भिन्न होने का प्रयोजक है
(क्योंकि सामान्य में सामान्य नहीं रह सकता ) । 'पृथिव्युदकज्वलनवृत्ति' अर्थात्
रूप पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों में ही रहता है । 'द्रव्याद्युपलम्भकम्'
अर्थात् रूप जिस आश्रय में रहता है उस द्रव्य का एवं उस आश्रय द्रव्य में रहने
वाले अन्य गुणों, क्रियाओं और सामान्यों के भी प्रत्यक्ष का प्रयोजक है । 'नयनसह-
कारि' चक्षुरूप द्रव्य में रहनेवाला रूप चक्षु से होनेवाले सभी प्रत्यक्षों का सहकारि-
कारण है । 'शुक्लाद्यनेकप्रकारम्' 'शुक्लादयोऽनेके प्रकारा यस्य' इस व्युत्पत्ति के द्वारा
जिसके शुक्लादि अनेक प्रकार हों वही 'शुक्लाद्यनेकप्रकार' है (अर्थात् शुक्लादि
भेद से रूप अनेक प्रकार के हैं)। 'सलिलादिपरमाणुषु नित्यम्' जल और तेज के
२५२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे रूपादि-
प्रशस्तपादभाष्यम्
पार्थिवपरमाणुष्वग्निसंयोगविरोधि सर्वकार्यद्रव्येषु कारणगुणपूर्वकमाश्रयविनाशा-
देव विनश्यतीति ।
अग्नि के संयोग से उसका विनाश होता है । जन्य द्रव्यों में उनके
अवयवों में रहनेवाले रूप से यह उत्पन्न होता है एवं आश्रय के विनाश
से उसका विनाश होता है ।
न्यायकन्दली
नित्यम् । पार्थिवपरमाणुष्वग्नि संयोगविरोधि । अग्निसंयोगो विनाशकः पार्थिवपरमाणु-
रूपस्येति च वक्ष्यामः । सर्वकार्यद्रव्येषु कारणगुणपूर्वकम् । कार्यद्रव्यगतं रूपं स्वाश्रय-
समवायिकारणरूपपूर्वकम् । आश्रयविनाशादेव विनश्यति । कार्यरूपविनाशस्याश्रय-
विनाश एव हेतुः ।
आश्रयविनाशाद्रूपस्य विनाश इति न मृष्यामहे सहैव रूपद्रव्ययोर्विनाशप्रतीतेरिति चेत्,
न, कारणाभावात् । मुद्गराभिघातात् तावदवयवक्रियाविभागादिक्रमेण द्रव्यारम्भकसंयोग-
निवृत्तौ तदारब्धस्य द्रव्यस्य विनाशः कारणविनाशात्, तद्गतरूपविनाशे तु किं कारणम् ?
यदि ह्यकारणस्याप्यवयवसंयोगस्य विनाशाद्रूपविनाशः, कपालरूपाण्यपि ततो विनश्येयु-
परमाणुओं के रूप नित्य हैं । एवं 'पार्थिवपरमाणुष्वग्निसंयोगविरोधि' अर्थात्
पार्थिव परमाणुओं में रहनेवाले रूपों का अग्नि के संयोग से नाश होता है, यह
हम आगे कहेंगे । 'सर्वकार्यद्रव्येषु कारणगुणपूर्वकम्' अर्थात् कार्य-द्रव्यों में
रहनेवाले सभी रूप अपने आश्रय के समवायिकारणों में रहनेवाले रूपों से ही
उत्पन्न होते हैं। 'आश्रयविनाशादेव विनश्यति' अर्थात् उत्पन्न होनेवाले सभी रूपों
का नाश अपने आश्रयों के नाश से ही होता है ।
(प्र.) हम यह नहीं मानते कि रूप का नाश आश्रय के नाश से होता है;
क्योंकि रूप के नाश एवं उसके आश्रयीभूत द्रव्य के नाश दोनों की प्रतीति साथ
ही होती है । (उ.) नहीं; क्योंकि आश्रयीभूत द्रव्य के नाश के साथ उसमें
रहनेवाले रूप के नाश का कारण ही ( उस समय) नहीं है । मुद्गरादि के
आघात से कार्य-द्रव्य के अवयवों में क्रिया, क्रिया से अवयवों का विभाग, इस
क्रम के अनुसार द्रव्य के अवयवों के उत्पादक संयोग का विनाश हो जाने पर
अवयवी द्रव्य का विनाश होता है; किन्तु तद्गत रूप का विनाश किससे मानेंगे ?
आश्रयीभूत द्रव्य के अवयवों का संयोग रूप का कारण नहीं है । अकारणीभूत
इस संयोग के नाश को ही अगर रूपनाश का कारण मानें तो फिर उक्त
संयोग के नाश से कपालादि अवयवों में रहनेवाले रूप का भी नाश मानना
पड़ेगा; क्योंकि अवयवों का संयोग जैसे अवयवी के रूप का कारण नहीं है,
वैसे ही कपालादिगत रूप का भी कारण नहीं है । अगर अवयवी में