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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 759 में से

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पृष्ठ 206

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५१
प्रशस्तपादभाष्यम्
तत्र रूपं चक्षुर्ग्राह्यं पृथिव्युदकज्वलनवृत्ति द्रव्याद्यु-
पलम्भकं नयनसहकारि शुक्लाद्यनेकप्रकारं सलिलादिपरमाणुषु नित्यं
उनमें चक्षु से ही जिसका ग्रहण हो वही 'रूप' है । यह पृथिवी,
जल और तेज इन तीन द्रव्यों में रहता है । द्रव्यादि के प्रत्यक्ष के
उत्पादन में आँख का सहारा है । यह शुक्लादि भेद से अनेक प्रकार
का है । जलादि के परमाणुओं में यह नित्य है एवं पृथिवी के परमाणु में
न्यायकन्दली
सर्वपदार्थानामभिव्यक्तिनिमित्तत्यादादौ रूपं निरूपयति-तत्र रूपं चक्षुर्ग्राह्यमिति ।
तेषां गुणानां मध्ये रूपं चक्षुषैव गृह्यते नेन्द्रियान्तरेण । ननु रूपत्वमपि चक्षुषैव गृह्यते
कथमिदं वैधर्म्यं रूपस्य ? न, गुणेभ्यो वैधर्म्यस्य विवक्षितत्वात् । तथा च
प्रकृतेभ्यो निर्धारणार्थे तत्रेत्युक्तम् । सामान्यादस्य वैधर्म्यं तु सामान्यवत्त्वमेव ।
पृथिव्युदकज्वलनवृत्ति । पृथिव्युदकज्वलनेष्वेव वर्त्तते । द्रव्याद्युपलम्भकम् । यस्मिन्नाश्रये
वर्त्तते तस्य द्रव्यस्य तद्गतानां च गुणकर्मसामान्यानामुपलम्भकम् । नयनसहकारि । स्वगतं
रूपं चक्षुषो विषयग्रहणे सहकारि । शुक्लाद्यनेकप्रकारम् । शुक्लादयोऽनेके प्रकारा यस्य
तत् तथाविधम् । सलिलादिपरमाणुषु नित्यम् । सलिलपरमाणुषु तेजःपरमाणुषु च
रूप सभी वस्तुओं के प्रत्यक्ष में किसी न किसी प्रकार से अवश्य ही कारण
है, अतः 'तत्र रूपं चक्षुर्ग्राह्यम्' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा गुणों में सबसे पहले रूप का
ही निरूपण करते हैं । इन सभी गुणों में रूप चक्षु के ही द्वारा गृहीत होता है
और किसी भी इन्द्रिय के द्वारा नहीं । (प्र.) रूपत्व भी तो केवल चक्षु से ही
गृहीत होता है तो फिर 'चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व' रूपों का असाधारण धर्म कैसे है ?
(उ.) ऐसी बात नहीं है; क्योंकि और गुणों की ही अपेक्षा चक्षुर्ग्राह्यत्व को रूप का
असाधारण धर्म कहना यहाँ अभिप्रेत है, सभी पदार्थों की अपेक्षा नहीं । इसी
'निर्द्धारण' को ही समझाने के लिए 'तत्र' शब्द का प्रयोग किया गया है । रूपों
में जाति का रहना ही (रूपत्वादि) जातियों से रूप के भिन्न होने का प्रयोजक है
(क्योंकि सामान्य में सामान्य नहीं रह सकता ) । 'पृथिव्युदकज्वलनवृत्ति' अर्थात्
रूप पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों में ही रहता है । 'द्रव्याद्युपलम्भकम्'
अर्थात् रूप जिस आश्रय में रहता है उस द्रव्य का एवं उस आश्रय द्रव्य में रहने
वाले अन्य गुणों, क्रियाओं और सामान्यों के भी प्रत्यक्ष का प्रयोजक है । 'नयनसह-
कारि' चक्षुरूप द्रव्य में रहनेवाला रूप चक्षु से होनेवाले सभी प्रत्यक्षों का सहकारि-
कारण है । 'शुक्लाद्यनेकप्रकारम्' 'शुक्लादयोऽनेके प्रकारा यस्य' इस व्युत्पत्ति के द्वारा
जिसके शुक्लादि अनेक प्रकार हों वही 'शुक्लाद्यनेकप्रकार' है (अर्थात् शुक्लादि
भेद से रूप अनेक प्रकार के हैं)। 'सलिलादिपरमाणुषु नित्यम्' जल और तेज के