वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७२७
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७२७
प्रशस्तपादभाष्यम्
वेगापेक्षो यः संयोगविशेषो विभागहेतोरेकस्य कर्मणः कारणं सोऽभिघातः ।
तस्मादपि चतुर्षु महाभूतेषु कर्म भवति, यथा पाषाणादिषु निष्ठुरे वस्तुन्य-
भिपतितेषु, तथा पादादिभिर्नुद्यमानायामभिहन्यमानायां वा । पङ्काख्यायां
पृथिव्यां यः संयोगो नोदनाभिघातयोरन्यतरापेक्ष उभयापेक्षो वा स संयुक्तसंयोगः,
तस्मादपि पृथिव्यादिषु कर्म भवति । ये च प्रदेशा न नुद्यन्ते नाप्यभिहन्यन्ते
तेष्वपि कर्म जायते ।
'अभिघात' उस विशेष प्रकार के संयोग का नाम है जो वेग की
सहायता से विभाग को उत्पन्न करनेवाले कर्म का कारण हो ।
अभिघात नाम के संयोग से भी चारों महाभूतों में क्रियाओं की उत्पत्ति
होती है । जैसे कि पत्थर प्रभृति कठिन द्रव्यों पर गिरे हुए द्रव्यों
में (क्रिया की उत्पत्ति होती है ) एवं पैर प्रभृति से केवल छुये जाने
पर या अभिहत होने पर पङ्क नाम की पृथिवी में (कथित) नोदन और
अभिघात नाम के दोनों संयोगों से या दोनों में से किसी एक संयोग
से जिस संयोग की उत्पत्ति होती है, उसे 'संयुक्तसंयोग' कहते हैं ।
इस संयुक्तसंयोग से भी पृथिव्यादि भूतों में क्रिया की उत्पत्ति होती है ।
न्यायकन्दली
वेगापेक्षो यः संयोग एकस्य विभागकृतः कर्मणः कारणं सोऽभिघातः,
अभिघात्याभिघातकयोः परस्परविभागो यतः कर्मणो जायते तस्यैवैकस्य हेतुर्यः
संयोगविशेषः सोऽभिघातः । तस्मादपि चतुर्षु महाभूतेषु कर्म भवति । यथा पाषा-
णादिषु निष्ठुरे वस्तुन्यभिपतितेषु । नोदनं परस्परविभागहेतोरेवैकस्य कर्मणः कारणं न
परस्परविभागहेतोः, एवमभिघातोऽपि परस्परविभागहेतोरेवैकस्य कर्मणः कारणं न
परस्परविभागहेतोरिदमुक्तमेकस्य कर्मणः कारणम् ।
"वेगापेक्षो यः संयोग एकस्य विभागकृतः कर्मणः कारणं सोऽभिघातः" अर्थात्
अभिघात्य और अभिघातक इन दोनों में परस्पर विभाग की उत्पत्ति जिस एक
क्रिया से हो, उस क्रिया का कारणीभूत विशेष प्रकार का संयोग ही 'अभिघात' है ।
'तस्मादपि चतुर्षु महाभूतेषु कर्म भवति, यथा पाषाणादिषु निष्ठुरे वस्तुन्यभि-
पतितेषु' (जिस प्रकार) परस्पर विभाग के अकारणीभूत एक क्रिया का ही कारण
'नोदन' है, परस्पर विभाग के कारणीभूत एक क्रिया का कारण नोदन नहीं है । उसी
प्रकार (ठीक उससे विपरीत) अभिघात भी परस्पर विभाग के हेतुभूत एक क्रिया
का ही कारण है, वह परस्पर विभाग के अहेतुभूत एक क्रिया का कारण नहीं है।
७२८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
पृथिव्युदकयोर्गुरुत्वविधारकसंयोगप्रयत्नवेगाभावे सति गुरुत्वाद् यदधोगमनं
तत् पतनम् । यथा मुसलशरीरादिषूक्तम् । तत्राद्यं गुरुत्वात्, द्वितीयादीनि तु
गुरुत्वसंस्काराभ्याम् ।
जो प्रदेश किसी से छुये नहीं जाते या अभिहत नहीं होते, उनमें भी
क्रिया की उत्पत्ति होती है ।
गुरुत्व के विरोधी संयोग, प्रयत्न और वेग इन सबों के न रहने पर
भी पृथिव्यादि द्रव्य केवल गुरुत्व के द्वारा जो नीचे की तरफ गिरते हैं,
उस क्रिया को ही 'पतन' कहते हैं । जैसा कि मूसल और तीर प्रभृति
द्रव्यों में कह आये हैं । उनमें पहली क्रिया गुरुत्व से उत्पन्न होती है
और दूसरी क्रियायें गुरुत्व और वेग दोनों से उत्पन्न होती हैं ।
न्यायकन्दली
संयुक्तसंयोगं व्याचष्टे- पादादिभिर्नुद्यमानायामिति । एकत्र पृथिव्यां पादेन नुद्यमा-
नायामभिहन्यमानायां वा ये प्रदेशा न नुद्यन्ते नाप्यभिहन्यन्ते तेष्वपि कर्म दृश्यते । तत्र
चलतां प्रदेशान्तराणां नुद्यमानाभिहन्यमानभूप्रदेशैः सह संयुक्तप्रदेशसंयोगः कारणम् ।
यत्राभिघातकं द्रव्यं भूप्रदेशमभिहत्य किञ्चिदधो नीत्वोत्पतति, तत्र प्रदेशान्तरक्रियाया-
मुभयापेक्षः संयुक्तसंयोगो हेतुः ।
गुरुत्वस्य कर्मकारणत्वमाह-पृथिव्युदकयोर्गुरुत्वविधारकसंयोगप्रयत्न-
वेगाभावे गुरुत्वाद् यदधोगमनं तत् पतनम् । यथा मुसलशरीरादिषूक्तम् ।
गुरुत्वप्रतिबन्धकस्य हस्तसंयोगस्याभावे मुसलस्य यदधोगमनं तत् पतनं गुरुत्वाद्
भवति । एवं गुरुत्वविधारकप्रयत्नाभावे शरीरस्य पतनम्, क्षिप्तस्येषोरन्तराले
'पादादिभिर्नुद्यमानायाम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा 'संयुक्तसंयोग' की व्याख्या
करते हैं । पृथिवी का एकदेश पैर के द्वारा छुये जाने पर या अभिहत होने पर
(उस देश से सम्बद्ध) पृथिवी के अन्य प्रदेशों में भी-जो पैर से न छुवे गये हैं
और न अभिहत ही हुए हैं-क्रिया देखी जाती है । उस क्रिया का कारण वह
संयुक्तसंयोग है, जो क्रिया से युक्त भूप्रदेश के साथ पैर से छुए हुए या अभिहत
हुए दूसरे भूप्रदेश का है । जहाँ अभिघात करनेवाला द्रव्य भूप्रदेश में अभिघात को
उत्पन्न कर थोड़ा-सा नीचे जाकर ऊपर की ओर उठता है । वहाँ जो दूसरे भूप्रदेश
में क्रिया की उत्पत्ति होती है, उसका कारण (वेग और संयोग) इन दोनों से
साहाय्यप्राप्त संयुक्तसंयोग ही है ।
'पृथिव्युदकयोः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा गुरुत्व से कर्म की उत्पत्ति
कही गयी है । मूसल में हाथ का जो संयोग है, वह गुरुत्व का प्रतिबन्धक
है । उसके न रहने पर ही मूसल नीचे की ओर जाता है, मूसल की वह
पतन क्रिया गुरुत्व से उत्पन्न होती है । गुरुत्व एवं शरीरधारण के उपयुक्त
प्रयत्न का अभाव, इन दोनों के रहने पर जो शरीर का पतन होता
है, उसका कारण भी गुरुत्व ही है । इसी प्रकार फेंके हुए तीर में वेग के