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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 693, कुल 759 में से

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पृष्ठ 693

७२८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
पृथिव्युदकयोर्गुरुत्वविधारकसंयोगप्रयत्नवेगाभावे सति गुरुत्वाद् यदधोगमनं
तत् पतनम् । यथा मुसलशरीरादिषूक्तम् । तत्राद्यं गुरुत्वात्, द्वितीयादीनि तु
गुरुत्वसंस्काराभ्याम् ।
जो प्रदेश किसी से छुये नहीं जाते या अभिहत नहीं होते, उनमें भी
क्रिया की उत्पत्ति होती है ।
गुरुत्व के विरोधी संयोग, प्रयत्न और वेग इन सबों के न रहने पर
भी पृथिव्यादि द्रव्य केवल गुरुत्व के द्वारा जो नीचे की तरफ गिरते हैं,
उस क्रिया को ही 'पतन' कहते हैं । जैसा कि मूसल और तीर प्रभृति
द्रव्यों में कह आये हैं । उनमें पहली क्रिया गुरुत्व से उत्पन्न होती है
और दूसरी क्रियायें गुरुत्व और वेग दोनों से उत्पन्न होती हैं ।
न्यायकन्दली
संयुक्तसंयोगं व्याचष्टे- पादादिभिर्नुद्यमानायामिति । एकत्र पृथिव्यां पादेन नुद्यमा-
नायामभिहन्यमानायां वा ये प्रदेशा न नुद्यन्ते नाप्यभिहन्यन्ते तेष्वपि कर्म दृश्यते । तत्र
चलतां प्रदेशान्तराणां नुद्यमानाभिहन्यमानभूप्रदेशैः सह संयुक्तप्रदेशसंयोगः कारणम् ।
यत्राभिघातकं द्रव्यं भूप्रदेशमभिहत्य किञ्चिदधो नीत्वोत्पतति, तत्र प्रदेशान्तरक्रियाया-
मुभयापेक्षः संयुक्तसंयोगो हेतुः ।
गुरुत्वस्य कर्मकारणत्वमाह-पृथिव्युदकयोर्गुरुत्वविधारकसंयोगप्रयत्न-
वेगाभावे गुरुत्वाद् यदधोगमनं तत् पतनम् । यथा मुसलशरीरादिषूक्तम् ।
गुरुत्वप्रतिबन्धकस्य हस्तसंयोगस्याभावे मुसलस्य यदधोगमनं तत् पतनं गुरुत्वाद्
भवति । एवं गुरुत्वविधारकप्रयत्नाभावे शरीरस्य पतनम्, क्षिप्तस्येषोरन्तराले
'पादादिभिर्नुद्यमानायाम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा 'संयुक्तसंयोग' की व्याख्या
करते हैं । पृथिवी का एकदेश पैर के द्वारा छुये जाने पर या अभिहत होने पर
(उस देश से सम्बद्ध) पृथिवी के अन्य प्रदेशों में भी-जो पैर से न छुवे गये हैं
और न अभिहत ही हुए हैं-क्रिया देखी जाती है । उस क्रिया का कारण वह
संयुक्तसंयोग है, जो क्रिया से युक्त भूप्रदेश के साथ पैर से छुए हुए या अभिहत
हुए दूसरे भूप्रदेश का है । जहाँ अभिघात करनेवाला द्रव्य भूप्रदेश में अभिघात को
उत्पन्न कर थोड़ा-सा नीचे जाकर ऊपर की ओर उठता है । वहाँ जो दूसरे भूप्रदेश
में क्रिया की उत्पत्ति होती है, उसका कारण (वेग और संयोग) इन दोनों से
साहाय्यप्राप्त संयुक्तसंयोग ही है ।
'पृथिव्युदकयोः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा गुरुत्व से कर्म की उत्पत्ति
कही गयी है । मूसल में हाथ का जो संयोग है, वह गुरुत्व का प्रतिबन्धक
है । उसके न रहने पर ही मूसल नीचे की ओर जाता है, मूसल की वह
पतन क्रिया गुरुत्व से उत्पन्न होती है । गुरुत्व एवं शरीरधारण के उपयुक्त
प्रयत्न का अभाव, इन दोनों के रहने पर जो शरीर का पतन होता
है, उसका कारण भी गुरुत्व ही है । इसी प्रकार फेंके हुए तीर में वेग के