वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५६:
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५६:
न्यायकन्दली
स एव चोभयात्मायं गम्यो गमक एव च ।
असिद्धेनैकदेशेन गम्यः सिद्धो न बोधकः ॥ इति ।
प्रतिज्ञाया उदाहरणमाह-द्रव्यं वायुरिति । यो वायुं प्रतिपद्यमानोऽपि तस्य द्रव्यत्वं न
प्रतिपद्यते, तं प्रति साधयितुमिष्टेन द्रव्यत्वेन विशिष्टस्य वायोरभिधानं प्रतिज्ञा क्रियते-
द्रव्यं वायुरिति । अविरोधिग्रहणस्य तात्पर्यं कथयति-अविरोधिग्रहणात् प्रत्यक्षानुमाना-
भ्युपगतशास्त्रस्ववचनविरोधिन्नो निरस्ता भवन्तीति । वादिना साधयितुमभिप्रेतोऽर्थः
साध्य इत्युच्यते । प्रत्यक्षादिविरुद्धोऽपि कदाचिदनेन भ्रमात् साधयितुमिष्यते, तद् यद्यविशेषेणा-
नुमेयोद्देशः प्रतिज्ञेत्येतावन्मात्रमुच्येत, प्रत्यक्षादिविरुद्धमपि वचनं प्रतिज्ञा स्यात् । न चेयं
प्रतिज्ञा, तदर्थस्य साधयितुमशक्यत्वात्, अतोऽविरोधिग्रहणं कृतम् । न विद्यते प्रत्यक्षादि-
धर्मी के दो भेद हैं, पहला है साध्यरूप धर्म से युक्त, जो पक्ष कहलाता है ।
दूसरा है केवल धर्मी, जो 'धर्मी' ही कहलाता है । इनमें पहला (पहले से सिद्ध न
होने के कारण) 'गम्य' है अर्थात् साध्य है । दूसरा 'गमक' अर्थात् (अपने ज्ञान
के द्वारा अथवा पक्षधर्मता सम्पादन के द्वारा) 'गमक' अर्थात् साध्य ज्ञान का
कारण है । अर्थात् धर्मी के दो स्वरूप हैं, एक साध्य से सम्बद्धवाला, दूसरा केवल
अपने स्वरूपवाला, इनमें पहले स्वरूप से वह 'गम्य' अर्थात् साध्य है (क्योंकि उस
रूप से पहले वह सिद्ध नहीं है), दूसरे स्वरूप से वह 'गमक' अर्थात् स्वज्ञान के
द्वारा अथवा पक्षधर्मता सम्पादन के द्वारा साधक है ।
'द्रव्यं वायुः' इस वाक्य के द्वारा प्रतिज्ञा का उदाहरण कहा गया है । जो व्यक्ति
वायु को समझता है; किन्तु उसे द्रव्य नहीं समझता, उसको वायु में द्रव्यत्व
को समझाना अभिप्रेत है । उसके लिए द्रव्यत्व से युक्त वायु को समझाने के
लिए 'द्रव्यं वायुः' ऐसी प्रतिज्ञा की जाती है। 'अविरोधिग्रहणात्प्रत्यक्षानुमानाभ्युपगतस्व-
शास्त्रस्ववचनविरोधिन्नो निरस्ता भवन्ति' इस वाक्य के द्वारा (प्रतिज्ञा के लक्षण
वाक्य में) 'अविरोधि' शब्द के प्रयोग का हेतु दिखलाया गया है । वादी को
जिस वस्तु का साधन अभिप्रेत होता है, उसे 'साध्य' कहते हैं । ऐसे भी
वादी हैं जो भ्रान्ति से वशीभूत होकर प्रत्यक्षादि प्रमाणों से बाधित अर्थों के
साधन के लिए भी प्रवृत्त हो जाते हैं । ऐसी स्थिति में यदि सामान्य रूप
से 'अनुमेयोद्देशः प्रतिज्ञा' (अर्थात् अनुमेय के बोधक सभी वाक्य प्रतिज्ञा हैं) ऐसा
ही प्रतिज्ञा का लक्षण किया जाय, तो प्रत्यक्षादि प्रमाणों से विरुद्ध ('वह्निरनुष्णः'
इत्यादि) वाक्य भी प्रतिज्ञा हो जायेंगे; किन्तु उस प्रकार के वाक्य प्रतिज्ञा नहीं हैं;
क्योंकि उनके द्वारा कथित विषय का साधन सम्भव नहीं है । अतः ऐसे वाक्यों में
प्रतिज्ञात्व के निराकरण के लिए ही भाष्यकार ने प्रतिज्ञा लक्षण में 'अविरोधि'
५७० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-
प्रशस्तपादभाष्यम्
यथा द्रव्यं वायुरिति । अविरोधिग्रहणात् प्रत्यक्षानुमानाभ्युपगतस्व-
शास्त्रस्ववचनविरोधिनो निरस्ता भवन्ति । यथाऽनुष्णोऽग्निरिति प्रत्यक्ष-
जैसे 'द्रव्यं वायुः' इत्यादि वाक्य । (प्रतिज्ञा के लक्षणवाक्य में)
'अविरोधि' पद के देने से १. प्रत्यक्षविरुद्ध, २. अनुमानविरुद्ध,
३. आगमविरुद्ध, ४. स्वशास्त्रविरोधी एवं ५. स्ववचनविरोधी उक्त प्रकार
के वाक्यों में प्रतिज्ञा लक्षण की अतिव्याप्ति का निवारण होता है ।
(इनमें) प्रत्यक्षविरोधी वाक्य का उदाहरण है- 'अनुष्णोऽग्निः' ।
न्यायकन्दली
विरोधो यस्यानुमेयोद्देशस्य असावप्रत्यक्षादिविरोधस्तस्य वचनं प्रतिज्ञा, यस्य तद्विरोधोऽस्ति
न सा प्रतिज्ञेत्यर्थः । किमनेनोक्तं भवति ? न वाद्यभिप्रायमात्रेण साध्यता; किन्तु यत्
साधनमर्हति तत् साध्यम्, स एव पक्षस्तदितरः पक्षाभास इति ।
प्रत्यक्षादिविरोधोदाहरणं यथा-अनुष्णोऽग्निरिति । अनुष्ण इत्युष्णस्पर्शप्रतिषेधोऽयम्,।
अवगतं च प्रतिषिध्यते नानवगतम् । न चोष्णत्वस्य वह्नेरन्यत्रोपलम्भसम्भवः, वह्नावपि
तस्य प्रतीतिर्नानुमानिकी, प्रत्यक्षाभावे अनुमानस्याप्रवृत्तेः। प्रत्यक्षप्रतीतस्य च प्रतिषेधे
पद का उपादान किया है । 'अनुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा' प्रतिज्ञा के इस लक्षण
वाक्य में प्रयुक्त 'अविरोधि' पद का विवरण इस प्रकार है कि 'न विद्यते
(प्रत्यक्षादि) विरोधो यस्यानुमेयोद्देशस्यासावप्रत्यक्षादिविरोधी, तस्य वचनं प्रतिज्ञा' ।
तदनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ है कि जिस 'अनुमेयोद्देश' में प्रत्यक्षादि प्रमाणों
का विरोध न रहे उसके बोधक वाक्य ही प्रतिज्ञा हैं । अर्थात् जिस अनुमेयोद्देश में
प्रत्यक्षादि प्रमाणों का विरोध रहे उसका बोधक वाक्य प्रतिज्ञा नहीं है । (प्र.)
इससे क्या निष्पन्न हुआ ? (उ.) यही कि साधन के लिए वादी के अभिप्रेत होने
से ही कोई विषय साध्य नहीं हो जाता । साध्य वही है जिसका साधन करना
सम्भव हो, वही साध्य पक्ष भी है, तद्भिन्न को अर्थात् प्रत्यक्षादि विरोध के कारण
जिसका साधन सम्भव न हो उसे 'पक्षाभास' कहते हैं ।
'अनुष्णो वह्निः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा प्रत्यक्षादि प्रमाणों के विरोधी प्रतिज्ञा-
वाक्यों के उदाहरण दिखलाये गये हैं । प्रकृत में 'अनुष्ण' शब्द उष्ण स्पर्श के प्रतिषेध
का बोधक है (उष्णस्पर्श विरोधी शीतस्पर्श का नहीं) । ज्ञात वस्तु का ही प्रतिषेध
भी किया जाता है, अज्ञात वस्तु का नहीं । एवं उष्णता की प्रतीति वह्नि को छोड़ और कहीं
सम्भव नहीं है । वह्नि में उष्णता की प्रतीति अनुमान से तब तक नहीं हो सकती, जब
तक वह्नि में उष्णता को प्रत्यक्षवेद्य न मान लिया जाय; क्योंकि बिना प्रत्यक्ष के अनुमान
की प्रवृत्ति नहीं होती है । प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होने योग्य वस्तु के प्रतिषेध के