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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 534, कुल 759 में से

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पृष्ठ 534

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५६:
न्यायकन्दली
स एव चोभयात्मायं गम्यो गमक एव च ।
असिद्धेनैकदेशेन गम्यः सिद्धो न बोधकः ॥ इति ।
प्रतिज्ञाया उदाहरणमाह-द्रव्यं वायुरिति । यो वायुं प्रतिपद्यमानोऽपि तस्य द्रव्यत्वं न
प्रतिपद्यते, तं प्रति साधयितुमिष्टेन द्रव्यत्वेन विशिष्टस्य वायोरभिधानं प्रतिज्ञा क्रियते-
द्रव्यं वायुरिति । अविरोधिग्रहणस्य तात्पर्यं कथयति-अविरोधिग्रहणात् प्रत्यक्षानुमाना-
भ्युपगतशास्त्रस्ववचनविरोधिन्नो निरस्ता भवन्तीति । वादिना साधयितुमभिप्रेतोऽर्थः
साध्य इत्युच्यते । प्रत्यक्षादिविरुद्धोऽपि कदाचिदनेन भ्रमात् साधयितुमिष्यते, तद् यद्यविशेषेणा-
नुमेयोद्देशः प्रतिज्ञेत्येतावन्मात्रमुच्येत, प्रत्यक्षादिविरुद्धमपि वचनं प्रतिज्ञा स्यात् । न चेयं
प्रतिज्ञा, तदर्थस्य साधयितुमशक्यत्वात्, अतोऽविरोधिग्रहणं कृतम् । न विद्यते प्रत्यक्षादि-
धर्मी के दो भेद हैं, पहला है साध्यरूप धर्म से युक्त, जो पक्ष कहलाता है ।
दूसरा है केवल धर्मी, जो 'धर्मी' ही कहलाता है । इनमें पहला (पहले से सिद्ध न
होने के कारण) 'गम्य' है अर्थात् साध्य है । दूसरा 'गमक' अर्थात् (अपने ज्ञान
के द्वारा अथवा पक्षधर्मता सम्पादन के द्वारा) 'गमक' अर्थात् साध्य ज्ञान का
कारण है । अर्थात् धर्मी के दो स्वरूप हैं, एक साध्य से सम्बद्धवाला, दूसरा केवल
अपने स्वरूपवाला, इनमें पहले स्वरूप से वह 'गम्य' अर्थात् साध्य है (क्योंकि उस
रूप से पहले वह सिद्ध नहीं है), दूसरे स्वरूप से वह 'गमक' अर्थात् स्वज्ञान के
द्वारा अथवा पक्षधर्मता सम्पादन के द्वारा साधक है ।
'द्रव्यं वायुः' इस वाक्य के द्वारा प्रतिज्ञा का उदाहरण कहा गया है । जो व्यक्ति
वायु को समझता है; किन्तु उसे द्रव्य नहीं समझता, उसको वायु में द्रव्यत्व
को समझाना अभिप्रेत है । उसके लिए द्रव्यत्व से युक्त वायु को समझाने के
लिए 'द्रव्यं वायुः' ऐसी प्रतिज्ञा की जाती है। 'अविरोधिग्रहणात्प्रत्यक्षानुमानाभ्युपगतस्व-
शास्त्रस्ववचनविरोधिन्नो निरस्ता भवन्ति' इस वाक्य के द्वारा (प्रतिज्ञा के लक्षण
वाक्य में) 'अविरोधि' शब्द के प्रयोग का हेतु दिखलाया गया है । वादी को
जिस वस्तु का साधन अभिप्रेत होता है, उसे 'साध्य' कहते हैं । ऐसे भी
वादी हैं जो भ्रान्ति से वशीभूत होकर प्रत्यक्षादि प्रमाणों से बाधित अर्थों के
साधन के लिए भी प्रवृत्त हो जाते हैं । ऐसी स्थिति में यदि सामान्य रूप
से 'अनुमेयोद्देशः प्रतिज्ञा' (अर्थात् अनुमेय के बोधक सभी वाक्य प्रतिज्ञा हैं) ऐसा
ही प्रतिज्ञा का लक्षण किया जाय, तो प्रत्यक्षादि प्रमाणों से विरुद्ध ('वह्निरनुष्णः'
इत्यादि) वाक्य भी प्रतिज्ञा हो जायेंगे; किन्तु उस प्रकार के वाक्य प्रतिज्ञा नहीं हैं;
क्योंकि उनके द्वारा कथित विषय का साधन सम्भव नहीं है । अतः ऐसे वाक्यों में
प्रतिज्ञात्व के निराकरण के लिए ही भाष्यकार ने प्रतिज्ञा लक्षण में 'अविरोधि'