वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५४९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५४९
न्यायकदली
कारः ? निवृत्तो हि तदस्त्यनुपलम्भस्तस्योपलम्भेन । न चानुपलम्भः पूर्वमासीदिति सम्प्रत्य-
विद्यमानोऽपि प्रतीतिहेतुः, प्रनष्टेन्द्रियस्यापि विषयग्रहणप्रसङ्गात् । अद्यतनेन तूपलम्भेनाद्य-
तनानुपलम्भस्तस्य निवर्तितः, प्राक्तनानुपलम्भस्त्वस्त्येव । तेन प्राक्कालीनाभावपरिच्छेदोयोग्येन
प्राक्तनाभावः परिच्छिद्यत इति चेत् ? अहो पाण्डित्यम् ? अहो नैपुण्यम् ? अनुपलब्ध
उपलम्भप्रागभावः, स च वस्तूत्पत्यवधिरेक एव न प्राक्तनाद्यतनकालभेदेन भिद्यते,
तत्रायतनानुपलम्भो निवृत्तः, प्राक्तनो न निवृत्त इति कः कुशाग्रीयबुद्धेरन्य इममति-
सूक्ष्मविवेकमवगाहते । तस्मादभावोऽभावेनैव परिच्छिद्यत इति न बुद्ध्यामहे ।
कथं तर्हि स्वरूपमात्रं गृहीत्वा स्थानान्तरगतस्य स्मर्यमाणे प्रति-
योगिन्यभावप्रतीतिः ? अनुमानात्, यो हि यस्मिन् स्मर्यमाणे स्मृतियोग्यः
इस प्रकार का ज्ञान होता है कि 'उस अधिकरण में उस समय यह वस्तु नहीं थी'
वहाँ (अनुपलब्धि को प्रमाण माननेवाले) आप क्या प्रतीकार करेंगे ? अर्थात् यहाँ
अभाव का ग्रहण किससे होगा ? क्योंकि यहाँ वर्त्तमान काल के प्रतियोगी की
उपलब्धि से प्रतियोगी की भूतकालिक अनुपलब्धि नष्ट हो चुकी है । (प्र.) उस
अधिकरण में उस वस्तु की अनुपलब्धि तो पहले से ही थी; किन्तु उसका ज्ञान
भर नहीं था । वही (भूतकालिक) अनुपलब्धि वर्त्तमान काल में उपलब्धि के द्वारा
नष्ट हो जाने पर भी उस अधिकरण में उस वस्तु के अभाव का ग्राहक होगी ।
(उ.) यह समाधान भी ठीक नहीं है; क्योंकि कार्य के अव्यवहित पूर्वक्षण में न
रहने पर भी यदि भूतकाल में कभी रहने से ही कोई किसी का उत्पादन कर
सके, तो फिर जिसे कभी इन्द्रिय थी और अभी वह नष्ट हो गयी है, ऐसे व्यक्ति
को भी रूपादि का प्रत्यक्ष होना चाहिए । (प्र.) आज की किसी वस्तु की उपलब्धि
से आज की ही उस वस्तु की अनुपलब्धि विनष्ट होगी, उससे पूर्व की अनुपलब्धि
नहीं, अतः पूर्वकाल की उस विषय की अनुपलब्धि तो इस (उपलब्धि के) समय
भी है ही, इस अनुपलब्धि का तो विनाश नहीं हुआ है । पूर्वकालिक इसी
अनुपलब्धि के द्वारा पूर्वकालिक उस वस्तु के अभाव का निश्चय होगा । (उ.) इस
पाण्डित्य और निपुणता का क्या कहना ? ( यह आप नहीं समझते कि)
अनुपलब्धि शब्द का अर्थ है उपलब्धि का प्रागभाव । वह अनादि काल से अपने
प्रतियोगी की उत्पत्ति के समय तक बराबर रहने वाली एक ही वस्तु है । वह
वर्तमानकाल और भूतकाल के भेद से भिन्न नहीं हो सकती । अतः प्रकृत में
पूर्वकालिक अनुपलब्धि का नाश नहीं हुआ है और एतत्कार्लिक अनुपलब्धि का
नाश हो गया है, इस भेद को किसी कुशाग्रबुद्धि महापुरुष को छोड़कर और कौन
समझ सकता है? तस्मात् हम लोग इस बात को नहीं समझ पाते कि (अनुपलब्धि
रूप) अभाव से ही अभाव का ग्रहण होता है ।
५५० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावान्तर्भाव-
न्यायकन्दली
सत्यामपि सुस्मूर्षायां न स्मर्यते, स तस्य ग्रहणकाले नासीदिति । यथा केवले प्रदेशे
स्मर्यमाणे तत्र प्राक्प्रतीताभावो घटोऽस्मर्यमाणः । न च स्मर्यते देवकुले स्मर्यमाणे
सत्यामपि सुस्मूर्षायां स्मृतियोग्योऽपि देवदत्तः । तस्मात् सोऽपि देवकुलग्रहणसमये नासीदिति
स्मृत्यभावादनुमानम् । सहोपलब्धयोरपि वस्तुनोः संस्कारपाटवादिविरहादेकस्य स्मरणम-
परस्यास्मरणं दृष्टम्, यथाधीतस्य श्लोकस्यैकस्य पदान्तरस्मरणेऽपि पदान्तरास्मरणम् ।
तत्र कथमेकस्य स्मरणे परस्यास्मरणाद् अभावानुमानमनैकान्तिकत्वादिति चेत् ?
सहस्थितयोरपि पदार्थयोः कदाचित् कारणानुरोधादेक उपलभ्यते नापरः, तत्रापि कथं
भूतलोपलम्भादनुपलभ्यमानस्य घटस्याभावसिद्धिः ?
(प्र.) तब फिर जहाँ कोई व्यक्ति केवल भूतल रूप आश्रय को देखकर दूसरी
जगह चला जाता है, वहीं कुछ काल के बाद घट रूप प्रतियोगी का स्मरण होने
पर 'उस भूतल रूप अधिकरण में उस समय घट नहीं था' इस प्रकार से उसे
अभाव का ग्रहण होता है, उसकी उपपत्ति कैसे होगी ? (उ.) उस अभाव का
ग्रहण अनुमान प्रमाण से होगा; क्योंकि (घट से असंयुक्त) केवल भूतल के स्मरण
की पूर्ण इच्छा रहने पर भी पहले से ज्ञात भूतल में घट का स्मरण नहीं होता है,
वहाँ यह निश्चित है कि घट नहीं था । इससे यह सामान्य नियम उपपन्न होता है
कि जिस एक वस्तु का स्मरण होने पर और स्मरण की पूर्ण इच्छा रहने
पर भी स्मृति के योग्य जिस दूसरी वस्तु का स्मरण नहीं होता है,उस (एक)
वस्तु में वह (दूसरी) वस्तु नहीं है । तदनुसार देवालय का स्मरण होने पर देवदत्त
के स्मरण की इच्छा रहने पर और देवदत्त में स्मृति की पूर्ण योग्यता रहने पर भी
यदि उनकी स्मृति नहीं होती है, तो यह अनुमान सुलभ हो जाता है 'उस समय
देवालय में देवदत्त नहीं थे' ।(प्र.) उक्त नियम में व्यभिचार रहने के कारण
कथित रीति से भूतकालिक अभाव का अनुमान सम्भव नहीं है; क्योंकि साथ-
साथ अनुभव होनेवाले दो विषयों में से यदि एकविषयक संस्कार दृढ़ नहीं
रहता है या उसमें कुछ पटुता की कमी रहती है, तो फिर उसका स्मरण
नहीं होता है । एवं दूसरे विषय का संस्कार यदि उन दोषों से दूर रहता है,
तो उस विषय का स्मरण होता है । जैसे कि पढ़े हुए एक पद्य के एक अंश का
स्मरण होता है, दूसरे का नहीं । इस प्रकार के स्थलों में एक का स्मरण न
होने पर भी दूसरे का स्मरण किस प्रकार हो सकेगा ? (उ.) (जिस प्रकार एक
साथ ज्ञात होनेवाले दो विषयों में से कभी एक का स्मरण होता है,दूसरे का
नहीं,उसी प्रकार) एक साथ रहनेवाले दो पदार्थों में से भी एक का स्मरण होता है,
चूँकि उसके सभी कारण ठीक रहते हैं । दूसरे का स्मरण नहीं होता; क्योंकि
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५५१
न्यायकन्दली
अथ मतम्-एकज्ञानसंसर्गिणोरेकोपलब्धेऽपरस्यानुपलम्भोऽभावसाधनं न सर्वः। येन
हि ज्ञानेन प्रदेशो गृह्यते तेनैव तत्संयोगी घटोऽपि गृह्यते, यैव प्रदेशग्रहणे सामग्री सैव
घटस्यापि सामग्री । यदि प्रदेशे घटोऽभविष्यत् सोऽपि प्रदेशे ज्ञायमाने विज्ञास्येत, तत्तुल्य-
सामग्रीकत्वात् । न ज्ञायते च, तस्मान्नास्त्येव, तदनुपलम्भस्य प्रकारान्तरेणासम्भवा-
दिति । यद्येवमस्माकमप्येकज्ञानसंसर्गिणोरेकस्मरणेऽपरस्यास्मरणमभावसाधनम् । यैव
देवकुलग्रहणसामग्री सा देवदत्तस्यापि तत्संयुक्तस्य ग्रहणसामग्री, या च देवकुलस्य
स्मरणसामग्री सा देवदत्तस्यापि स्मृतिसामग्री, तदेकज्ञानसंसर्गित्वाद् यदि देवकुलग्रहणकाले
देवदत्तोऽभविष्यत् सोऽपि देवकुले स्मर्यमाणे अस्मरिष्यत्, तत्तुल्यसामग्रीत्वात् । न च
उसके स्मरण के कारणों में कुछ त्रुटि रहती है । ऐसी स्थिति में भूतल के स्मरण
के बाद घट का स्मरण न होने से भूतल में घट के न रहने की सिद्धि किस
प्रकार होगी ।
यदि यह कहें कि (प्र.) सभी अनुपलब्धियाँ अभाव की साधिका नहीं हैं;
किन्तु एक ज्ञान में विषय होनेवाले दो विषयों में से एक की अनुपलब्धि ही दूसरे
के अभाव की साधिका है । अतः जिस ज्ञान के द्वारा भूतल रूप प्रदेश का ग्रहण
होता है, उसी ज्ञान के द्वारा भूतल में संयुक्त घट का भी ग्रहण होता है । जिन
कारणों के समूह से प्रदेश का ज्ञान होता है, उसी कारण समूह से भूतल में संयोग
सम्बन्ध से रहनेवाले घट का भी ज्ञान होता है । अतः भूतल में यदि घट रहता तो
भूतल के दीखने पर वह भी दीख पड़ता ही; क्योंकि भूतल और घट दोनों का
ग्रहण एक ही प्रकार के कारणों से होता है ; किन्तु भूतल के ज्ञात होने पर भी
घट ज्ञात नहीं होता है । तस्मात् घट की उक्त अनुपलब्धि से समझते हैं कि वहाँ
भूतल में घट है ही नहीं; क्योंकि भूतल में घटाभाव के बिना घट की इस
अनुपलब्धि की सम्भावना नहीं है । (उ.) यदि ऐसी बात है तो समान रूप से हम
भी कह सकते हैं कि एक ज्ञान में विषय होनेवाले दो विषयों में से एक विषय की
स्मृति के न रहने की दशा में यदि दूसरे की स्मृति नहीं होती है, तो फिर यह
'अस्मरण' (या उस विषय की स्मृति का न होना) ही उस दूसरे विषय के भाव
का साधक है । तदनुसार देवकुल को देखने की सामग्री (कारणसमूह) एवं देवकुल
में संयोग सम्बन्ध से रहनेवाले देवदत्त को देखने का कारण समूह चूँकि दोनों एक
ही हैं । अतः जिस सामग्री से देवालय का स्मरण होगा, उसी सामग्री से देवदत्त
का भी स्मरण होना चाहिए । इस उपपत्ति के अनुसार देवालय के दर्शन के समय
यदि उसमें देवदत्त रहते तो देवकुल की स्मृति के बाद उनकी भी स्मृति अवश्य
होती; क्योंकि देवकुल और देवदत्त दोनों की स्मृतियों के उत्पादक कारणसमूह
समान रूप के हैं; किन्तु देवकुल की स्मृति होने पर भी देवदत्त का स्मरण
५५२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावान्तर्भाव-
न्यायकन्दली
स्मर्यते, तस्मान्नासीद् देवदत्तः, तदस्मरणस्य प्रकारान्तरेणासम्भवादिति समानम् ।
श्लोकस्य तु पदान्युच्चारणानुरोधात् क्रमेण पठ्यन्ते, नैकज्ञानसंसर्गीणि । तेषु यत्र तु
बहुतरः संस्कारो जातस्तत् स्मर्यते, नापरमिति नास्त्यनुपपत्तिः ।
एवमुपलभ्यमानस्यापि वस्तुनो यत् प्राक्तनाभावज्ञानं प्रागिदमिह नासीदिति ज्ञानम्,
तदपि प्रतियोगिनः प्राक्तनास्तित्वे स्मर्यमाणे तत्तत्स्मृत्यभावादनुमानम् ।
ये तु स्मृत्यभावमप्यभावं प्रमाणमाचक्षते तेषाम् "अभावोऽपि प्रमाणाभावः" इति
भाष्यविरोधः, "प्रमाणपञ्चकं यत्र वस्तुरूपे न जायते" इत्यादिवार्त्तिकविरोधश्चेत्यलं
बहुना ।
ये पुनरेवमाहुः-अभावरूपस्य प्रमेयस्याभावान्न साध्वी तस्य प्रमाण-
चिन्तेति । त इदं प्रष्टव्याः-नास्तीति संविदः किमालम्बनम् ? यदि न किञ्चित् ?
नहीं होता है, अतः उस समय देवकुल में देवदत्त नहीं थे; क्योंकि उस समय
देवकुल में देवदत्त के अभाव के बिना उसकी उपपत्ति नहीं हो सकती । किसी
श्लोक के एक अंश की स्मृति और दूसरे अंश की देवदत्त की उक्त अस्मृति की
स्थिति ही भिन्न है; क्योंकि श्लोक के प्रत्येक पद अलग-अलग पढ़े जाते हैं, एवं
उनके ज्ञान भी अलग-अलग क्रमशः ही उत्पन्न होते हैं, अतः श्लोक रूप वाक्य के
कोई भी अनेक अंश एक ज्ञान के द्वारा गृहीत नहीं होते । सुतरां श्लोक के प्रत्येक
पद के ज्ञान से उत्पन्न होनेवाला संस्कार अलग-अलग है। इन संस्कारों में से जिन
पदों के संस्कारों में दृढ़ता अधिक होती है, उनके द्वारा उन पदों का स्मरण होता
जाता है और जिन पदों के संस्कार दुर्बल होते हैं, उनका स्मरण नहीं होता है ।
अतः श्लोक के प्रसङ्ग में भी कोई अनुपपत्ति नहीं है।
इसी प्रकार वर्तमानकाल में जिस वस्तु की उपलब्धि है, उसके पूर्वकालिक
अभाव की जो इस आकार की प्रतीति होती है कि 'यह पहले नहीं था', वह
(प्रतीति) भी अनुमान ही है ; क्योंकि इस अभाव के प्रतियोगी का पूर्वकालिक
अस्तित्व के स्मृत होने पर भी अधिकरण में उसकी सत्ता की स्मृति न होने से ही
उक्त प्राक्तन अभाव की प्रतीति उत्पन्न होती है ।
(मीमांसकों का) जो सम्प्रदाय स्मृति के अभाव को भी 'अभाव' प्रमाण मानता
है, उसको "अभावोऽपि प्रमाणाभावः" इस शाबरभाष्य और "प्रमाणपञ्चकं यत्र"
इत्यादि उसके वार्त्तिक दोनों के विरोध का सामना करना पड़ेगा ?
जो कोई यह कहते हैं कि (प्र.) अभाव नाम का कोई अलग प्रमेय ही नहीं
है, अतः उसके प्रमाण की बात ही अनुचित है । (उ.) उनसे यह पूछना चाहिए