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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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पृष्ठ 516

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५५१
न्यायकन्दली
अथ मतम्-एकज्ञानसंसर्गिणोरेकोपलब्धेऽपरस्यानुपलम्भोऽभावसाधनं न सर्वः। येन
हि ज्ञानेन प्रदेशो गृह्यते तेनैव तत्संयोगी घटोऽपि गृह्यते, यैव प्रदेशग्रहणे सामग्री सैव
घटस्यापि सामग्री । यदि प्रदेशे घटोऽभविष्यत् सोऽपि प्रदेशे ज्ञायमाने विज्ञास्येत, तत्तुल्य-
सामग्रीकत्वात् । न ज्ञायते च, तस्मान्नास्त्येव, तदनुपलम्भस्य प्रकारान्तरेणासम्भवा-
दिति । यद्येवमस्माकमप्येकज्ञानसंसर्गिणोरेकस्मरणेऽपरस्यास्मरणमभावसाधनम् । यैव
देवकुलग्रहणसामग्री सा देवदत्तस्यापि तत्संयुक्तस्य ग्रहणसामग्री, या च देवकुलस्य
स्मरणसामग्री सा देवदत्तस्यापि स्मृतिसामग्री, तदेकज्ञानसंसर्गित्वाद् यदि देवकुलग्रहणकाले
देवदत्तोऽभविष्यत् सोऽपि देवकुले स्मर्यमाणे अस्मरिष्यत्, तत्तुल्यसामग्रीत्वात् । न च
उसके स्मरण के कारणों में कुछ त्रुटि रहती है । ऐसी स्थिति में भूतल के स्मरण
के बाद घट का स्मरण न होने से भूतल में घट के न रहने की सिद्धि किस
प्रकार होगी ।
यदि यह कहें कि (प्र.) सभी अनुपलब्धियाँ अभाव की साधिका नहीं हैं;
किन्तु एक ज्ञान में विषय होनेवाले दो विषयों में से एक की अनुपलब्धि ही दूसरे
के अभाव की साधिका है । अतः जिस ज्ञान के द्वारा भूतल रूप प्रदेश का ग्रहण
होता है, उसी ज्ञान के द्वारा भूतल में संयुक्त घट का भी ग्रहण होता है । जिन
कारणों के समूह से प्रदेश का ज्ञान होता है, उसी कारण समूह से भूतल में संयोग
सम्बन्ध से रहनेवाले घट का भी ज्ञान होता है । अतः भूतल में यदि घट रहता तो
भूतल के दीखने पर वह भी दीख पड़ता ही; क्योंकि भूतल और घट दोनों का
ग्रहण एक ही प्रकार के कारणों से होता है ; किन्तु भूतल के ज्ञात होने पर भी
घट ज्ञात नहीं होता है । तस्मात् घट की उक्त अनुपलब्धि से समझते हैं कि वहाँ
भूतल में घट है ही नहीं; क्योंकि भूतल में घटाभाव के बिना घट की इस
अनुपलब्धि की सम्भावना नहीं है । (उ.) यदि ऐसी बात है तो समान रूप से हम
भी कह सकते हैं कि एक ज्ञान में विषय होनेवाले दो विषयों में से एक विषय की
स्मृति के न रहने की दशा में यदि दूसरे की स्मृति नहीं होती है, तो फिर यह
'अस्मरण' (या उस विषय की स्मृति का न होना) ही उस दूसरे विषय के भाव
का साधक है । तदनुसार देवकुल को देखने की सामग्री (कारणसमूह) एवं देवकुल
में संयोग सम्बन्ध से रहनेवाले देवदत्त को देखने का कारण समूह चूँकि दोनों एक
ही हैं । अतः जिस सामग्री से देवालय का स्मरण होगा, उसी सामग्री से देवदत्त
का भी स्मरण होना चाहिए । इस उपपत्ति के अनुसार देवालय के दर्शन के समय
यदि उसमें देवदत्त रहते तो देवकुल की स्मृति के बाद उनकी भी स्मृति अवश्य
होती; क्योंकि देवकुल और देवदत्त दोनों की स्मृतियों के उत्पादक कारणसमूह
समान रूप के हैं; किन्तु देवकुल की स्मृति होने पर भी देवदत्त का स्मरण