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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५४५

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५४५
न्यायकन्दली
अथ मतम्-निरधिकरणो न कस्यचिदभावः प्रतीयते, देशादिनियमेन प्रवृत्ति-
निवृत्तिदर्शनात् । यदधिकरणश्चायं प्रतीयते तस्य प्रतीताविन्द्रियव्यापारो नाभावग्रहणे,
इन्द्रियव्यापारोपरमेऽप्यभावप्रतीतिदर्शनात् । तथा हि-कश्चित् स्वरूपेण देवकुलादिकं प्रतीत्य
स्थानान्तरगतो देवकुले देवदत्तोऽस्ति नास्तीति केनचित् पृष्टस्तदानीमेव ज्ञातजिज्ञासो
नास्तीति प्रतीत्याऽभावं व्यवहरति नास्तीति । न च पूर्वमेव देवकुलग्रहणसमये देवदत्ता-
भावो निर्विकल्पेन गृहीतः, सम्प्रति स्मर्यमाण इति वाच्यम्, युक्तं घटादीनामिन्द्रियसन्नि-
कर्षात्रिर्विकल्पेन ग्रहणम्, तेषां स्वरूपस्य परानपेक्षत्वात् । अभावस्य तु प्रतिषेध्यस्वभावस्य
स्वरूपमेव यस्यायं (एव) प्रतिषेधः स्यात् तदधीनम्। अतस्तत्प्रतिषेधतामन्तरेण
तदभावस्य स्वरूपान्तराभावात् । तत्रास्य प्रतियोगिस्वरूपनिरूपणमन्तरेण निरूपणम-
इस प्रसङ्ग में अभाव को प्रमाण माननेवालों का कहना है कि नियमतः किसी
विशेष देश में ही अभाव के प्रसङ्ग में प्रवृत्ति होती है, इससे यह सिद्ध होता है कि
किसी अधिकरण में ही अभाव की प्रतीति होती है, अधिकरण को छोड़कर केवल
अभाव की प्रतीति नहीं होती है । तदनुसार जिस अधिकरण में अभाव की प्रतीति
होती है, उस अधिकरण की प्रतीति में ही इन्द्रिय का व्यापार अपेक्षित होगा ।
(प्र.) उस अधिकरण में भी अभाव की प्रतीति के लिए इन्द्रिय का व्यापार
अपेक्षित नहीं है; क्योंकि इन्द्रियों के व्यापार के हट जाने पर भी अभाव की
प्रतीति होती है । जैसे किसी पुरुष को किसी देवालय को देखने के बाद किसी
दूसरे स्थान में जाने पर कोई पूछता है कि 'वहाँ देवदत्त है या नहीं, ? उसी समय
उस पुरुष की जिज्ञासा को समझकर 'देवालय में देवदत्त नहीं है' इस प्रतीति के
द्वारा वह पुरुष 'नास्ति' का व्यवहार (अर्थात् 'देवकुले देवदत्तो नास्ति' इस वाक्य
का व्यवहार) करता है । (प्र.) देवालय के देखने के समय ही उसे वहाँ देवदत्त के अभाव
का निर्विकल्पक ज्ञान हो गया था । अभी वह उसी निर्विकल्पक ज्ञानजनित स्मृति
के द्वारा देवदत्त के अभाव का व्यवहार करता है । (उ.) ऐसा कहना भी ठीक
नहीं है; क्योंकि अभाव का निर्विकल्पक ज्ञान सम्भव ही नहीं है । घटादि पदार्थों
का निर्विकल्पक ज्ञान इसलिए सम्भव होता है कि उनके ज्ञान के लिए प्रतियोगी
प्रभृति किसी दूसरे पदार्थों को जानने की अपेक्षा नहीं होती है; किन्तु अभाव तो
किसी भाव पदार्थ का प्रतिषेध रूप है, अतः उसको जानने के लिए उस भाव पदार्थ
को भी जानना आवश्यक है, जिसका कि वह प्रतिषेध है; क्योंकि भाव के प्रतिषेध
को छोड़कर अभाव का कोई दूसरा स्वरूप ही नहीं है । तस्मात् प्रतिषेध्य (प्रतियोगि)
ज्ञान के बिना अभाव का ज्ञान सम्भव ही नहीं है । (अर्थात् अभाव का ज्ञान प्रतियोगी
रूप विशेषण से युक्त होकर ही होगा, अतः अभाव का निर्विकल्पक ज्ञान असम्भव
है) । भाव और अभाव में यही अन्तर है कि भाव का अपने भावत्व रूप से ही

५४६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावान्तर्भाव-
न्यायकन्दली
शक्यम् । अयमेव हि भावाभावयोर्विशेषो यदेकस्य विधिरूपतया ग्रहणम्, अपरस्य
त्वन्यप्रतिषेधमुखेन । यदाह न्यायवार्त्तिककारः- "स्वतन्त्रपरतन्त्रोपलब्ध्यनुपलब्धिकारण-
भावाच्च विशेषः, सत्तु खलु प्रमाणस्यालम्बनं स्वतन्त्रम्, असत्तु परतन्त्रमन्यप्रतिषेध-
मुखेनेति" । यदि त्वभावस्यापि स्वातन्त्र्येण ग्रहणं तदा भावादविशेषः स्यात् । अतो
नास्त्यभावस्य निर्विकल्पकेन ग्रहणम् ।
यदपि विकल्पितं किं देवदत्तसङ्कीर्णस्य देवकुलस्य पूर्वं प्रतीति-
रासीत् ? तद्विविक्तस्य वा ? सङ्कीर्णग्रहणे तावत् केवलस्य न स्मरणम् ।
विविक्तग्रहणे वाभावोऽगृहीत एव पश्चात् स्मर्यत इति प्राप्तम् । तदप्यसारम्,
देवदत्तभावाभावयोरग्रहणेऽपि देवकुलस्य स्वरूपेण ग्रहणात् । तस्मान्न पूर्वमभाव-
ग्रहणम्, तदभावान्न स्मृतिः, न च तदानीं प्रमाणान्तरमुपलभ्यते, तस्माद् व्यवहितेऽपि
ग्रहण होता है; किन्तु अभाव का भाव के प्रतिषेध रूप से ग्रहण होता है । जैसा
कि न्यायवार्त्तिककार उद्योतकर ने कहा है कि "भाव और अभाव में यही अन्तर
है कि एक (भाव) स्वतन्त्र है और दूसरा (अभाव) परतन्त्र । एवं एक की सत्ता
का उसकी अपनी उपलब्धि ही नियामक है और दूसरे की सत्ता के प्रतियोगी की
अनुपलब्धि नियामक है । 'सत्' अर्थात् भाव पदार्थ प्रमाण के द्वारा स्वतन्त्र ही
गृहीत होता है; किन्तु 'असत्' अर्थात् अभाव प्रतियोगी के प्रतिषेध रूप से, फलतः
प्रतियोगी परतन्त्र होकर प्रमाण के द्वारा ज्ञात होता है" । यदि अभाव की भी
स्वतन्त्र उपलब्धि ही हो तो भाव और अभाव दोनों में कोई अन्तर नहीं रह
जाएगा, फलतः दोनों अभिन्न हो जायेंगे । अतः निर्विकल्पक ज्ञान के अभाव का
गृहीत होना सम्भव नहीं है ।
इस प्रसङ्ग में किसी ने जो यह विकल्प उपस्थित किया था कि पहले
देवदत्त और देवालय (देवकुल) दोनों की साथ-साथ प्रतीति थी ? या देवदत्त से
असम्पृक्त केवल देवकुल की ही प्रतीति थी ? यदि साथ-साथ प्रतीति मानें तो
फिर केवल देवकुल का स्मरण नहीं होगा । (उस स्मृति में देवदत्त भी अवश्य ही
भासित होगा, एवं देवदत्त के भासित होने पर उसके अभाव की प्रतीति
असम्भव होगी) । यदि दूसरा पक्ष मानें तो (यह अनिष्टापत्ति होगी कि) पूर्व में
अज्ञात ही देवकुल का स्मरण होता है । (उ.) इस विकल्प में भी कुछ सार
नहीं है; क्योंकि देवदत्त या उनका अभाव, इन दोनों में से किसी का ग्रहण न
होने पर भी देवकुल अपने देवकुलत्व स्वरूप के साथ ही वहाँ ज्ञात होता है ।
देवदत्त के अभाव का उस पुरुष को पहले सविकल्पक या निर्विकल्पक कोई भी
ज्ञान नहीं था । अतः देवदत्त के अभाव की स्मृति भी उस पुरुष को नहीं हो
सकती । उस समय देवदत्त के अभाव का ज्ञापक कोई दूसरा प्रमाण भी नहीं
उपलब्ध होता है, अतः यही कहना पड़ेगा कि उस पुरुष को देवदत्त की सन्निधि