सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 511, कुल 759 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 511

५४६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावान्तर्भाव-
न्यायकन्दली
शक्यम् । अयमेव हि भावाभावयोर्विशेषो यदेकस्य विधिरूपतया ग्रहणम्, अपरस्य
त्वन्यप्रतिषेधमुखेन । यदाह न्यायवार्त्तिककारः- "स्वतन्त्रपरतन्त्रोपलब्ध्यनुपलब्धिकारण-
भावाच्च विशेषः, सत्तु खलु प्रमाणस्यालम्बनं स्वतन्त्रम्, असत्तु परतन्त्रमन्यप्रतिषेध-
मुखेनेति" । यदि त्वभावस्यापि स्वातन्त्र्येण ग्रहणं तदा भावादविशेषः स्यात् । अतो
नास्त्यभावस्य निर्विकल्पकेन ग्रहणम् ।
यदपि विकल्पितं किं देवदत्तसङ्कीर्णस्य देवकुलस्य पूर्वं प्रतीति-
रासीत् ? तद्विविक्तस्य वा ? सङ्कीर्णग्रहणे तावत् केवलस्य न स्मरणम् ।
विविक्तग्रहणे वाभावोऽगृहीत एव पश्चात् स्मर्यत इति प्राप्तम् । तदप्यसारम्,
देवदत्तभावाभावयोरग्रहणेऽपि देवकुलस्य स्वरूपेण ग्रहणात् । तस्मान्न पूर्वमभाव-
ग्रहणम्, तदभावान्न स्मृतिः, न च तदानीं प्रमाणान्तरमुपलभ्यते, तस्माद् व्यवहितेऽपि
ग्रहण होता है; किन्तु अभाव का भाव के प्रतिषेध रूप से ग्रहण होता है । जैसा
कि न्यायवार्त्तिककार उद्योतकर ने कहा है कि "भाव और अभाव में यही अन्तर
है कि एक (भाव) स्वतन्त्र है और दूसरा (अभाव) परतन्त्र । एवं एक की सत्ता
का उसकी अपनी उपलब्धि ही नियामक है और दूसरे की सत्ता के प्रतियोगी की
अनुपलब्धि नियामक है । 'सत्' अर्थात् भाव पदार्थ प्रमाण के द्वारा स्वतन्त्र ही
गृहीत होता है; किन्तु 'असत्' अर्थात् अभाव प्रतियोगी के प्रतिषेध रूप से, फलतः
प्रतियोगी परतन्त्र होकर प्रमाण के द्वारा ज्ञात होता है" । यदि अभाव की भी
स्वतन्त्र उपलब्धि ही हो तो भाव और अभाव दोनों में कोई अन्तर नहीं रह
जाएगा, फलतः दोनों अभिन्न हो जायेंगे । अतः निर्विकल्पक ज्ञान के अभाव का
गृहीत होना सम्भव नहीं है ।
इस प्रसङ्ग में किसी ने जो यह विकल्प उपस्थित किया था कि पहले
देवदत्त और देवालय (देवकुल) दोनों की साथ-साथ प्रतीति थी ? या देवदत्त से
असम्पृक्त केवल देवकुल की ही प्रतीति थी ? यदि साथ-साथ प्रतीति मानें तो
फिर केवल देवकुल का स्मरण नहीं होगा । (उस स्मृति में देवदत्त भी अवश्य ही
भासित होगा, एवं देवदत्त के भासित होने पर उसके अभाव की प्रतीति
असम्भव होगी) । यदि दूसरा पक्ष मानें तो (यह अनिष्टापत्ति होगी कि) पूर्व में
अज्ञात ही देवकुल का स्मरण होता है । (उ.) इस विकल्प में भी कुछ सार
नहीं है; क्योंकि देवदत्त या उनका अभाव, इन दोनों में से किसी का ग्रहण न
होने पर भी देवकुल अपने देवकुलत्व स्वरूप के साथ ही वहाँ ज्ञात होता है ।
देवदत्त के अभाव का उस पुरुष को पहले सविकल्पक या निर्विकल्पक कोई भी
ज्ञान नहीं था । अतः देवदत्त के अभाव की स्मृति भी उस पुरुष को नहीं हो
सकती । उस समय देवदत्त के अभाव का ज्ञापक कोई दूसरा प्रमाण भी नहीं
उपलब्ध होता है, अतः यही कहना पड़ेगा कि उस पुरुष को देवदत्त की सन्निधि