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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३९
न्यायकन्दली
अथ मतम्-अर्थोऽर्थेनैवोपपद्यत इति तदुपपत्तयैव तच्छब्दस्याप्युपपन्नता, किन्तु
शाब्दोऽर्थः शाब्देनैवार्थेनोपपद्यते, प्रमाणान्तरावगतस्य तेन सहान्वयाभावात् । न हि
पचतीत्युक्ते क्रियायाः कर्मणा विनानुपपत्तिः पच्यमानस्य कलायस्य प्रत्यक्षेणोप-
शाम्यति, तस्मिन् सत्यपि किं पचतीत्याकाङ्क्षाया अनिवृत्तेः। शब्दोपनीते तु कर्मणि
निर्विचिकित्सः प्रत्ययो भवति 'शाकं पचति कलायं पचति' इति । 'पीनो दिवा
न भुङ्क्ते' इत्यपि वाक्यार्थानुपपत्तिरियम्, तस्मादस्यापि शाब्देनैवार्थेनोपशान्तिर्भवि-
ष्यतीति प्रथममर्थापत्त्या रात्रिभोजनप्रतिपादकं वाक्यमेवार्थनीयम्, अन्यथा दिवावाक्य-
पदार्थैः सह रात्रिभोजनस्यानन्वयाभावात् । वाक्यविषये चार्थापत्तिपर्यवसाने रात्रिभोजन-
मर्थो नार्थापत्तिविषयतामेति, तस्य वाक्यदेवावगमात् । न चैतद्वाच्यम्, दिवा-
यदि यह कहें कि (प्र.) यह तो ठीक है कि एक अर्थ की उपपत्ति उससे
नियत दूसरे अर्थ से ही होती है एवं अर्थ की उपपत्ति से ही तद्बोधक शब्द की भी
उपपत्ति होती है; किन्तु इतना अन्तर है कि शब्द के द्वारा उपस्थित अर्थ की
अनुपपन्नता शब्द के द्वारा उपस्थित दूसरे अर्थ से ही निवृत्त की जा सकती है;
क्योंकि शब्द से भिन्न अन्य प्रमाणों के द्वारा उपस्थित अर्थ का अन्वय शब्द प्रमाण
के द्वारा उपस्थित अर्थ के साथ नहीं होता है । जैसे कि केवल 'पचति' पद के
उच्चारण के बाद जो कर्म के बिना पाक क्रिया की अनुपपत्ति उपस्थित होती है,
उसकी निवृत्ति प्रत्यक्ष के द्वारा पकते हुए मटर (कलाय) को देखकर भी नहीं होती ।
उसके प्रत्यक्ष के बाद भी 'किं पचति' यह जिज्ञासा बनी ही रहती है । 'कलायम्'
'शाकम्' इत्यादि पदों के प्रयोग के बाद जब इन शब्दों से कलाय या शाक रूप
कर्म उपस्थित हो जाता है, तभी 'कलाय पक रहा है' या 'शाक पक रहा है' इत्यादि
आकार के निश्चयात्मक बोध होते हैं । 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' यहाँ वाक्य के द्वारा
उपस्थित अर्थ की ही अनुपपत्ति है, अतः 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य के द्वारा उपस्थित
किये हुए रात्रि-भोजन रूप अर्थ से ही उसकी निवृत्ति हो सकती है (दूसरे प्रमाणों
के द्वारा उपस्थित किये हुए रात्रि-भोजन रूप अर्थ से नहीं)। अतः प्रकृत में
अर्थापत्ति से रात्रि-भोजन के बोधक 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य की ही कल्पना
करनी होगी । ऐसा न करने पर (अर्थापत्ति के द्वारा सीधे रात्रि-भोजन रूप अर्थ
की ही कल्पना करने पर) 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इस (दिवा) वाक्य के
द्वारा उपस्थित पदार्थों के साथ (दूसरे प्रमाण के द्वारा उपस्थित) रात्रि-भोजन रूप
अर्थ का अन्वय नहीं हो सकेगा । (उ.) जब प्रकृत श्रुतार्थापत्ति की विषयता
केवल वाक्य के द्वारा उपस्थित अर्थ में नियत हो जाती है, तो फिर रात्रि-भोजन
रूप अर्थ अर्थापत्ति प्रमाण से ग्राह्य ही नहीं रह जाता; क्योंकि (अर्थापत्ति प्रमाण
के द्वारा 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस) वाक्य रूप शब्द प्रमाण से ही उसकी अवगति हो
जायेगी । यह कहना भी उचित नहीं है कि (प्र.) 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' यह
वाक्य और इस वाक्य के अर्थ दोनों में से किसी का भी 'रात्रौ भुङ्क्ते'
इस वाक्य के साथ कोई नियत सम्बन्ध नहीं हैं, अतः इनमें से किसी के द्वारा

५४०) न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽर्थापत्त्यन्तर्भाव-
न्यायकन्दली
वाक्यस्य तदर्थस्य वा रात्रिवाक्येन सह प्रत्यासत्त्यभावान्न ताभ्यां तदुपस्थापनमिति, अर्थ-
प्रत्यासत्तिद्वारेण वाक्यस्यापि प्रत्यासन्नत्वात् । न चार्थार्थापत्तावनुमानवत् प्रत्यासत्तिरपेक्षते,
तस्या अनुपपत्तिमात्रेणैव प्रवृत्तेः । तदुक्तम्-
न चार्थेनार्थ एवार्थं द्वितीयो गम्यते पुनः ।
सविकल्पकविज्ञानग्राह्यात्यावृत्तिरोहितः ॥
शब्दान्तराण्युबुद्ध्याऽसामर्थ्यमेवावगच्छति ।
तेनैषां प्रथमं तावन्नियतं वाक्यगोचराः ।
वाक्यमेव तु वाक्यार्थं गत्वाऽथ गमयिष्यति' ॥ इति ।
'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य की उपस्थिति नहीं हो सकती । (उ.) चूँकि 'पीनो दिवा
न भुङ्क्ते' इस वाक्य के अर्थ के साथ 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य के अर्थ का नियत
सम्बन्ध है । इस सम्बन्ध के द्वारा ही 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य के साथ
भी 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य का नियत सम्बन्ध अवश्य है । (दूसरी बात है कि)
अर्थापत्ति को अपने प्रमेय में प्रवृत्त होने के लिए अनुमान की तरह नियत सम्बन्ध
की अपेक्षा भी नहीं होती है, उसका काम अर्थानुपपत्ति से ही चल जाता है । जैसा
कहा गया है कि -
(१) 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य से भोजन न करने वाले
देवदत्त की पीनता का शाब्दबोध रूप सविकल्पक ज्ञान उत्पन्न होता है (इस
सविकल्पक ज्ञान में विषयीभूत दिन में न खानेवाले देवदत्त की मोटाई रूप प्रथम)
अर्थ के द्वारा (रात्रि-भोजन रूप) द्वितीय अर्थ ज्ञात नहीं होता है; क्योंकि वह
(रात्रि-भोजन रूप द्वितीय अर्थ) 'वृत्तिरोहित' नहीं है, अर्थात् किसी शब्द से
(अभिधादि)' 'वृत्ति' के द्वारा उपस्थित नहीं है ।
(२) अतः 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य को सुनने के बाद
'रात्रि-भोजन' रूप दूसरे अर्थ को समझानेवाले 'रात्रौ भुङ्क्ते' इत्यादि किसी दूसरे
शब्द को न सुनकर (समझनेवाला पुरुष) इतना ही समझता है कि 'पीनो दिवा न
भुङ्क्ते' इस वाक्य में रात्रि-भोजन रूप अर्थ को समझाने का सामर्थ्य नहीं है ।
(३) अतः (श्रुतार्थापत्ति स्थल में) अर्थापत्ति के द्वारा पहले 'रात्रौ भुङ्क्ते'
इत्यादि वाक्यों का ही बोध होता है । इसके बाद अर्थापत्ति के द्वारा ज्ञात 'रात्रौ
भुङ्क्ते' यह वाक्य ही रात्रि-भोजन रूप अर्थविषयक बोध को उत्पन्न करेगा ।

  1. उपक्रम और उपसंहार की दृष्टि से इन श्लोकों का यथाश्रुत पाठ ठीक नहीं जँचता । इन
    श्लोकों का निम्नलिखित स्वरूप का होना उचित जान पड़ता है, तदनुसार ही अनुवाद
    किया गया है ।
    न चार्थे नार्थ एवार्थं द्वितीयो गम्यते पुनः । स विकल्पकविज्ञानग्राह्योनावृत्तिरोहितः ।।
    शब्दान्तराणेयबुद्ध्वाऽसामर्थ्यमेवावगच्छति ।
    तेनैषा प्रथमं तावन्नियतं वाक्यगोचरा ।। वाक्यमेव तु वाक्यार्थ गत्वाऽद् गमयिष्यति ।।