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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 505, कुल 759 में से

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पृष्ठ 505

५४०) न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽर्थापत्त्यन्तर्भाव-
न्यायकन्दली
वाक्यस्य तदर्थस्य वा रात्रिवाक्येन सह प्रत्यासत्त्यभावान्न ताभ्यां तदुपस्थापनमिति, अर्थ-
प्रत्यासत्तिद्वारेण वाक्यस्यापि प्रत्यासन्नत्वात् । न चार्थार्थापत्तावनुमानवत् प्रत्यासत्तिरपेक्षते,
तस्या अनुपपत्तिमात्रेणैव प्रवृत्तेः । तदुक्तम्-
न चार्थेनार्थ एवार्थं द्वितीयो गम्यते पुनः ।
सविकल्पकविज्ञानग्राह्यात्यावृत्तिरोहितः ॥
शब्दान्तराण्युबुद्ध्याऽसामर्थ्यमेवावगच्छति ।
तेनैषां प्रथमं तावन्नियतं वाक्यगोचराः ।
वाक्यमेव तु वाक्यार्थं गत्वाऽथ गमयिष्यति' ॥ इति ।
'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य की उपस्थिति नहीं हो सकती । (उ.) चूँकि 'पीनो दिवा
न भुङ्क्ते' इस वाक्य के अर्थ के साथ 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य के अर्थ का नियत
सम्बन्ध है । इस सम्बन्ध के द्वारा ही 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य के साथ
भी 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य का नियत सम्बन्ध अवश्य है । (दूसरी बात है कि)
अर्थापत्ति को अपने प्रमेय में प्रवृत्त होने के लिए अनुमान की तरह नियत सम्बन्ध
की अपेक्षा भी नहीं होती है, उसका काम अर्थानुपपत्ति से ही चल जाता है । जैसा
कहा गया है कि -
(१) 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य से भोजन न करने वाले
देवदत्त की पीनता का शाब्दबोध रूप सविकल्पक ज्ञान उत्पन्न होता है (इस
सविकल्पक ज्ञान में विषयीभूत दिन में न खानेवाले देवदत्त की मोटाई रूप प्रथम)
अर्थ के द्वारा (रात्रि-भोजन रूप) द्वितीय अर्थ ज्ञात नहीं होता है; क्योंकि वह
(रात्रि-भोजन रूप द्वितीय अर्थ) 'वृत्तिरोहित' नहीं है, अर्थात् किसी शब्द से
(अभिधादि)' 'वृत्ति' के द्वारा उपस्थित नहीं है ।
(२) अतः 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य को सुनने के बाद
'रात्रि-भोजन' रूप दूसरे अर्थ को समझानेवाले 'रात्रौ भुङ्क्ते' इत्यादि किसी दूसरे
शब्द को न सुनकर (समझनेवाला पुरुष) इतना ही समझता है कि 'पीनो दिवा न
भुङ्क्ते' इस वाक्य में रात्रि-भोजन रूप अर्थ को समझाने का सामर्थ्य नहीं है ।
(३) अतः (श्रुतार्थापत्ति स्थल में) अर्थापत्ति के द्वारा पहले 'रात्रौ भुङ्क्ते'
इत्यादि वाक्यों का ही बोध होता है । इसके बाद अर्थापत्ति के द्वारा ज्ञात 'रात्रौ
भुङ्क्ते' यह वाक्य ही रात्रि-भोजन रूप अर्थविषयक बोध को उत्पन्न करेगा ।

  1. उपक्रम और उपसंहार की दृष्टि से इन श्लोकों का यथाश्रुत पाठ ठीक नहीं जँचता । इन
    श्लोकों का निम्नलिखित स्वरूप का होना उचित जान पड़ता है, तदनुसार ही अनुवाद
    किया गया है ।
    न चार्थे नार्थ एवार्थं द्वितीयो गम्यते पुनः । स विकल्पकविज्ञानग्राह्योनावृत्तिरोहितः ।।
    शब्दान्तराणेयबुद्ध्वाऽसामर्थ्यमेवावगच्छति ।
    तेनैषा प्रथमं तावन्नियतं वाक्यगोचरा ।। वाक्यमेव तु वाक्यार्थ गत्वाऽद् गमयिष्यति ।।