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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages
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भाषाटीकासमेतम् । (११)

गमन न किया । तब उसको दुःखी देख साथियोंने कहा- "भो सेठ ! क्यो इस
बैलके निमित्त सिंह व्याघ्रसे युक्त अनेक विपत्तिवाले इस वनमें सम्पूर्ण साथियोंको
तुमने सन्देहमे नियुक्त किया है, कहाहै कि-
न स्वल्पस्य कृते भूरि नाशयेन्मतिमान्नरः ।
एतदेवात्र पाण्डित्यं यत्स्वल्पाद्भूरिरक्षणम् ॥ १९ ॥”
बुद्धिमान् थोडेके निमित्त बहुतका नाश न करै, यह पडिताई है कि, थोडेहिसे
बहुतकी रक्षा करै ॥ १९ ॥”
अथासौ तदवधार्य सञ्जीवकस्य रक्षापुरुषान् निरूप्य
अशेषसार्थं नीत्वा प्रस्थितः । अथ रक्षापुरुषा अपि बह्वपायं
तद्वनं विदित्वा सञ्जीवकं परित्यज्य पृष्ठतो गत्वा अन्येद्युस्तं
सार्थवाहं मिथ्याहुः- "स्वामिन् । मृतोऽसौ सञ्जीवकोऽस्मा-
भिस्तु सार्थवाहस्याभीष्ट इति मत्वा वह्निना संस्कृतः” इति
तच्छ्रुत्वा सार्थवाहः कृतज्ञतया स्नेहार्द्रहृदयस्तस्य और्ध्व-
देहिकक्रियाः वृषोत्सर्गादिकाः सर्वाश्चकार । सञ्जीवकोऽप्या-
युःशेषतया यमुनासलिलमिश्रैः शिशिरतरवातैः आप्या-
यितशरीरः कथञ्चिदप्युत्थाय यमुनातटमुपपेदे ॥ तत्र मरक-
तसदृशानि बालतृणाग्राणि भक्षयन् कतिपयैरहोभिर्हरवृषभ
इव पीनः ककुद्मान् बलवांश्च संवृत्तः प्रत्यहं वल्मीकशिखरा-
ग्राणि शृङ्गाभ्यां विदारयन् गर्जमानः आस्ते । साधु चेदमु-
च्यते-
तब यह वैश्य इस बातको विचारकर, सञ्जीवकके निमित्त रक्षापुरुषोंको
निरूपण कर और सब साथियोंको लेकर चला । तब रक्षक पुरुषभी अनेक
कष्टयुक्त उस वनको देख सञ्जीवकको छोड उसके पीछे जाकर दूसरे दिन सार्थ-
वाहसे मिथ्या कहने लगे- “हे स्वामिन् ! वह सञ्जीवक मरगया, हमने आप (सार्थ
वाह ) का प्यारा जानकर अग्निसे सस्कार किया”। यह सुनकर सार्थवाह कृत-
ज्ञता और प्रेमसे आर्द्रहृदय होकर उसकी और्ध्वदेहिक क्रिया वृषोत्सर्गादि सब
करता भया । ( इधर ) सञ्जीवकभी आयु शेष रहनेके कारण यमुनाजलसे मिली
अत्यन्त शीतल वायुद्वारा तृप्तशरीरसे किसी प्रकार उठकर यमुनाके किनारे प्राप्त

( १२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

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( १२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
हुआ, वहां मरकतमणीकी समान छोटे तृणके अग्रभाग भक्षण करता हुआ कुछ
दिनोंमें शिवजीके वृषभके समान स्थूल ककुदवाला बलवान् हुआ प्रतिदिन
वल्मीकके शिखरके अग्रभागोंको शृंगोंसे विदीर्ण करता गर्जता रहा । कहाभी
सत्य है कि-
अरक्षितं तिष्ठति दैवराक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति ।
जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे विन-
श्यति ॥ २० ॥
अप्रतिपालित वस्तु दैवसे रक्षित हुई स्थित रहती है, भली प्रकार रक्षित हुई
वस्तुभी दैवसे अरक्षितहो नष्ट होजातीहै, अनाथभी वनमे त्यागन किया जीताहै
यत्न करनेपरभी घरमें नहीं जीताहै, वंशस्थ वृत्त ॥ २० ॥
अथ कदाचित् पिंगलको नाम सिंहः सर्वमृगपरिवृतःपिपा-
साकुल उदकपानार्थं यमुनातटमवतीर्णः सञ्जीवकस्य गम्भीर-
तरारावं दूरादेव अशृणोत् । तच्छ्रुत्वा अतीव व्याकुलहृदयः
ससाध्वसमाकारं प्रच्छाद्य वटतले चतुर्मण्डलावस्थानेन अव-
स्थितः । चतुर्मण्डलावस्थानं त्विदम्-सिंहः सिंहानुयायिनः
काकरवाः किंवृत्ता इति । अथ तस्य करटकदमनकनामानौ द्वौ
शृगालौ मन्त्रिपुत्रौ भ्रष्टाधिकारौ सदानुयायिनौ आस्ताम् ।
तौ च परस्परं मन्त्रयतः। तत्र दमनकोऽब्रवीत्-“भद्र करटक !
अयं तावदस्मत्स्वामी पिङ्गलक उदकग्रहणार्थं यमुनाकक्ष-
मवतीर्य्य स्थितः स किं निमित्तं पिपासाकुलोऽपि निवृत्त्य
व्यूहरचनां विधाय दौर्मनस्येनाभिभूतोऽत्र वटतले स्थितः”।
करटक आह-“भद्र ! किमावयोरनेन व्यापारेण । उक्तञ्च यतः-
एक समय पिंगलक नाम सिंह सम्पूर्ण मृगोंसे युक्त प्याससे व्याकुल जल
पीनेके निमित्त यमुनाके किनारे प्राप्त हुआ, संजीवकका अधिक गम्भीर शब्द दूरसे
सुनता भया । वह सुन अत्यन्त व्याकुल हृदय होकर भयके आकारको छिपाकर
वटवृक्षके नीचे चतुर्मण्डलावस्थान ( जिसके चारों ओर मृग बैठे हों ) से बैठा ।
चतुर्मण्डलावस्थान इसको कहतेहैं, कि सिंह,सिंहानुयायी, काकरव (काककेसे शब्द
करनेवाले ), किंवृत्त (क्यों उपस्थित हुआ है, इस वृत्तान्तके जाननेवाले ) बैठे ।

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भाषाटीकासमेतम् । ( १३ )

तब उसके करटक, दमनक नामवाले दो शृगाल मंत्रीके पुत्र अधिकारसे भ्रष्ट

सदा अनुयायी थे । वह दोनो परस्पर सम्मति करने लगे, उसमे दमनक बोला-

“भद्र करटक! यह तो हमारा स्वामी पिंगलक जल पीनेको यमुनाच्छमें प्राप्त हो

स्थित हुआ था। क्या कारण है कि, प्याससे व्याकुल होकरभी लौटकर अपनी सेनाकी

मण्डल रचनाको विधानकर दुर्मनस्कतासे तिरस्कृत हुआ इस वट वृक्षके नीचे

बैठा है?” करटक बोला-“भद्र ! हमारा इस व्यापारसे क्या लाभ है, कहा भी है-

अव्यापारेषु व्यापारं यो नरः कर्तुमिच्छति ।

स एव निधनं याति कीलोत्पाटीव वानरः ॥ २१ ॥”

जो मनुष्य अनधिकारियोमे अधिकार करनेकी इच्छा करता है वही नाश

होता है, जैसे कीलको उखाडकर वानर ॥ २१ ॥ ”

दमनक-आह-“कथमेतत्” ? । सोऽब्रवीत्-

दमनक बोला “यह कैसी कथा है’ ? ? वह बोला-

कथा १.

कस्मिंश्चित् नगराभ्यासे केनापि वणिक्पुत्रेण तरुषण्ड-

मध्ये देवतायतनं कर्तुमारब्धम् । तत्र च ये कर्मकराः स्थप-

त्यादयः ते मध्याह्नवेलायामाहारार्थं नगरमध्ये गच्छन्ति ।

अथ कदाचित् तत्रानुषङ्गिकं वानरयूथमितश्चेतश्च परिभ्रमत

आगतम् । तत्र एकस्य कस्यचित् शिल्पिनोऽर्द्धस्फाटितोऽञ्ज-

नवृक्षदारुमयः स्तम्भः खदिरकीलकेन मध्यनिहितेन तिष्ठति

एतस्मिन् अन्तरे ते वानराः तरुशिखरप्रासादशृङ्गदारुपर्य-

न्तेषु यथेच्छया क्रीडितुमारब्धाः । एकश्च तेषां प्रत्यासन्नमृत्युः

चापल्यात् तस्मिन्नर्द्धस्फाटितस्तम्भे उपविश्य पाणिभ्यां

कीलकं संगृह्य यावत् उत्पाटयितुमारेभे तावत् तस्य स्तम्भ-

मध्यगतवृषणस्य स्वस्थानात् चलितकीलकेन यद्वृत्तं तत्प्रा-

गेव निवेदितम् । अतोऽहंब्रवीमि “अव्यापारेषु” इति ।

आवयोः भक्षितशेष आहारोऽस्त्येव, तत् किमनेन व्यापा-

रेण”। दमनक आह-“तत् किं भवान् आहारार्थी केवलमेव।

तन्न युक्तम् । उक्तं च-

( १४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

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( १४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
किस एक नगरके समीप किसी वैश्यपुत्रने वृक्षमण्डलके मध्यमें देवस्थान
बनाना प्रारंभ किया, उसमें जो कर्मचारी थे शिल्पी आदि वे दोपहरके समय
भोजनके निमित्त नगरमें जातेथे। एक समय अपनी जातिके अनुक्रमसे प्राप्त
वानरयूथ इधर उधर घूमता हुआ आया, वहां किसी एक कारीगरका आधा
चीरा हुआ अञ्जनवृक्षका काष्ठस्तम्भ बीचमें खैरकी खूंटी अडाया हुआ था, इसी
समय वे वानर वृक्षोंके शिखर प्रासाद श्रृंग तथा काष्ठके चारों ओर क्रीडा करना
प्रारम्भ करते हुए एक उनमेंसे निकटमृत्युवाला चंचलतासे उस आधे फाडे हुए
स्तम्भपर बैठकर हाथसे उस खूंटीको पकड ज्योंही उखाडने लगा कि त्योंही
उसके स्तम्भके छिद्रमें लटके हुए वृषणो (अंडकोष) की अपने स्थानसे कीलीके
उखडनेसे जो दशा हुई है सो पहलेही निवेदन कर दी है। इससे मैं कहता हूं
“अनधिकारमे” इत्यादि । हम दोनोंका खानेसे बचा भोजन स्थित है ही, फिर
इस व्यापारसे क्या है”। दमनकने कहा- “तो क्या आप केवल आहारमात्रकी
इच्छा करते हो ? सो युक्त नहीं है, कहा है कि-
सुहृदामुपकारकारणाद्द्विषतामप्यपकारकारणात् ।
नृपसंश्रय इष्यते बुधैर्जठरं को न बिभर्ति केवलम् ॥ २२॥
मित्रोंका उपकार करनेसे, शत्रुओंका अपकार करनेसे बुद्धिमान् राजाका आश्रय
करते हैं, केवल पेट कौन नहीं भरता है॥ २२ ॥
किञ्च-
कारण कि,
यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहवः सोऽत्र जीवतु ।
वयांसि किं न कुर्वन्ति चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् ? ॥ २३ ॥
जिसके जीनेसे बहुतसे पुरुष जियें, सोई जीता है और पक्षी क्या चोंचसे
अपना उदरपूर्ण नहीं करते हैं ? ॥ २३ ॥
तथाच-
औरभी-
यज्जीव्यते क्षणमपि प्रथितं मनुष्यैर्विज्ञानशौर्य्यविभवार्य्य-
गुणैः समेतम् । तन्नाम जीवितमिह प्रवदन्ति तज्ज्ञाः काको-
ऽपि जीवति चिरञ्च बलिं च भुंक्ते ॥ २४॥

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भाषाटीकासमेतम् । (१५)
जो क्षणमात्र भी मनुष्योसे प्रतिष्ठित होकर जीना है, विज्ञान, शूरता, ऐश्वर्यके
गुणोंसे सहित जो जीवित है, उसके जाननेवाले उसीका नाम जीवित कहते हैं,
यो तो कौआभी बहुत कालतक जीता और बलि खाता है ॥ २४ ॥
यो नात्मना न च परेण च बन्धुवर्गे दीने दयां न कुरुते
न च मर्त्यवर्गे। किं तस्य जीवितफलं हि मनुष्यलोके काको
ऽपि जीवति चिरञ्च बलिं च भुंक्ते ॥ २५॥
जो न अपने, न दूसरोंमें, न बन्धुवर्गमें, न दीनोंमें, न मनुष्योमे दया करता
हे, मनुष्यलोकमे उसके जीनेका क्या फल है, योतो कौआभी चिरकालतक
जीता और बलि खाता है ॥ २५ ॥
सुपूरा स्यात्कुनदिका सुपूरो मूषिकाञ्जलिः ।
सुसन्तुष्टः कापुरुषः स्वल्पकेनापि तुष्यति ॥ २६ ॥
कुनदी जल्दी भर जाती है, मूषककी अञ्जली शीघ्र भरजाती है, कापुरुष
शीघ्र सतुष्ट हो जातेहैं, यह स्वल्प वस्तुसे ही सन्तुष्ट हो जाते है ॥ २६ ॥
किञ्च-
कारण कि-
किं तेन जातु जातेन मातुर्यौवनहारिणा ।
आरोहति न यः स्वस्य वंशस्याग्रे ध्वजो यथा ॥ २७ ॥
माताके यौवन हरनेवाले उस पुरुषके जन्मसे क्या है, जो अपने वंशमे
ध्वजाके अग्रभागकी समान नहीं स्थित होता है ॥ २७ ॥
परिवर्त्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ।
जातस्तु गण्यते सोऽत्र यः स्फुरेच्च श्रियाधिकः ॥ २८ ॥
बदलते हुए संसारमें कौन नहीं मरा और कौन नहीं उत्पन्न हुआ, वही जन्म
लेनेवाला गिना जाता है, जो अधिक लक्ष्मीसे स्फुरायमानहो ॥ २८ ॥
किञ्च-
और भी-
जातस्य नदीतीरे तस्यापि तृणस्य जन्मसाफल्यम् ।
यत्सलिलमज्जनाकुलजनहस्तालम्बनं भवति ॥ २९ ॥

( १६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

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( १६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
नदीके किनारे उत्पन्न हुए उस तृणका भी जन्म सफल है, जो जलमें
डूबनेसे घबड़ाये हुए मनुष्योका अवलम्बन होता है ॥ २९ ॥
तथाच-
और देखो-
स्तिमितोन्नतसञ्चारा जनसन्तापहारिणः ।
जायन्ते विरला लोके जलदा इव सज्जनाः ॥ ३० ॥
ऊँचे नीचे संचरण करनेवाले जनके सन्ताप हरनेवाले मेघकी समान कोई
सज्जन विरलेही होते हैं ॥ ३० ॥
निरतिशयं गरिमाणं तेन जनन्याः स्मरन्ति विद्वांसः ।
यत्कमपि वहति गर्भं महतामपि यो गुरुर्भवति ॥ ३१ ॥
विद्वान् लोग उसके जन्मसे माताकी अधिक भारत्ता स्मरण करते हैं कि, उसने
इसको किस प्रकार धारण किया है, जो बडे पुरुषोंको भी भारी होता है ॥ ३१॥
अप्रकटीकृतशक्तिः शक्तोऽपि जनस्तिरस्क्रियां लभते ।
निवसन्नन्तर्दारुणि लंघ्यो वह्निर्न तु ज्वलितः ॥ ३२ ॥”
शक्ति न प्रगट करनेवाला समर्थभी जनोंसे तिरस्कृत होजाता है, काठके भीतर
रहनेवाली अग्निको सब कोई उलंघन करता है, न जलती हुई को ॥ ३२ ॥
करटक आह-
करटक बोला-
“आवां तावदप्रधानौ तत्किमावयोरनेन व्यापारेण । उक्तञ्च-
“हम तो यहां अप्रधानहैं, सो हमे इस वार्तासे क्या प्रयोजनहै । कहा भी है-
अपृष्टोऽत्राप्रधानो यो ब्रूते राज्ञः पुरः कुधीः ।
न केवलमसंमानं लभते च विडम्बनम् ॥ ३३ ॥
बिना पूछे जो अप्रधान कुबुद्धि इस संसारमें राजाके आगे बोलता है, वह
केवल असम्मानकोही प्राप्त नहीं होता किन्तु अवमानताकोभी प्राप्त होता है ॥३३॥
तथाच-
और भी-
वचस्तत्र प्रयोक्तव्यं यत्रोक्तं लभते फलम् ।
स्थायीभवति चात्यन्तं रागः शुक्लपटे यथा ॥ ३४ ॥”

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भाषाटीकासमेतम् । ( १७ )'
वचन वहां कहना चाहिये, जहां कुछ कहनेका फल हो जैसे कि, सफेद
वस्त्रपर रंग अत्यन्त स्थायी होता है ॥ ३४ ॥"
दमनक आह-"मा मा एवं वद ।
दमनक बोला-"ऐसे मत कहो ।
अप्रधानः प्रधानः स्यात्सेवते यदि पार्थिवम् ।
प्रधानोऽप्यप्रधानः स्याद्यदि सेवाविवर्जितः ॥ ३५ ॥
यदि राजाको सेवनकरे तो अप्रधानभी प्रधान होजाता है और सेवासे
वर्जित हो तो प्रधानभी अप्रधान होजाता है ॥ ३५ ॥
यत उक्तञ्च-
कारण कहाभी है-
आसन्नमेव नृपतिर्भजते मनुष्यं
विद्याविहीनमकुलीनमसंस्कृतं वा ।
प्रायेण भूमिपतयः प्रमदा लताश्च
यत्पार्श्वतो भवति तत्परिवेष्टयन्ति ॥ ३६ ॥
राजा निकटकेही मनुष्यको भजतेहैं, चाहे वह विद्याहीन, अकुलीन, सस्कार-
हीन हो, प्रायः राजा,स्त्री और वेल जो निकट होताहै उसीको वेष्टन करते हैं ३६
तथाच-
और भी-
कोपप्रसादवस्तूनि ये विचिन्वन्ति सेवकाः ।
आरोहन्ति शनैः पश्चाद्दुन्वन्तमपि पार्थिवम् ॥ ३७ ॥
जो सेवक क्रोध और प्रसन्नताके विषयको खोजते रहतेहैं, वे-क्रमसे विरक्त
राजाकोभी प्राप्त होते हैं ॥ ३७ ॥
विद्यावतां महेच्छानां शिल्पविक्रमशालिनाम् ।
सेवावृत्तिविदाञ्चैव नाश्रयः पार्थिवं विना ॥ ३८ ॥
विद्यायुक्त, कारीगर और विक्रमसे सम्पन्न, सेवावृत्तिके जाननेवाले महाश-
योंको राजाके विना अन्य आश्रय नहीं है ॥ ३८ ॥
२

( १८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

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( १८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
ये जात्यादिमहोत्साहान्नरेन्द्रान्नोपयान्ति च ।
तेषामामरणं भिक्षा प्रायश्चित्तं विनिर्मितम् ॥ ३९ ॥
जो अपनी जाती आदिके महा अभिमानसे राजाके समीप नहीं जातेहैं, उनको
मरण पर्यन्त भिक्षाका प्रायश्चित्त कहा है ॥ ३९ ॥
ये च प्राहुर्दुरात्मानो दुराराध्या महीभुजः ।
प्रमादालस्यजाड्यानि ख्यापितानि निजानि तैः ॥ ४० ॥
और जो दुरात्मा कहते हैं कि राजा दुराराध्य ( कठिनतासे सेवने योग्य ) हैं,
उन्होंने अपनी प्रमाद, आलस्य और जडता प्रगट की है ॥ ४० ॥
सर्पान् व्याघ्रान् गजान् सिंहान् दृष्टोपायैर्वशीकृतान् ।
राजेति कियती मात्रा धीमतामप्रमादिनाम् ॥ ४१ ॥
सर्प, व्याघ्र, गज, सिंहोंकोभी उपायोंसे वशीभूत देखा है, अप्रमादी बुद्धि-
मानोंको राजाका वशमें करना क्या बड़ी बात है ? ॥ ४१ ॥
राजानमेव संश्रित्य विद्वान्याति परां गतिम् ।
विना मलयमन्यत्र चन्दनं न प्ररोहति ॥ ४२ ॥
राजाकेही आश्रयसे विद्वान् परमगति ( उन्नति ) को प्राप्त होता है, मलयाच-
लके बिना अन्यत्र चन्दन नहीं उगता है ॥ ४२ ॥
धवलान्यातपत्राणि वाजिनश्च मनोरमाः ।
सदा मत्ताश्च मातङ्गाः प्रसन्ने सति भूपतौ ॥ ४३ ॥”
श्वेत छत्र, मनोहर घोड़े, मत्त मातङ्ग यह सदा राजाकी प्रसन्नतासे
होते हैं ॥ ४३ ॥”
करटक आह-
करटक बोला-
“अथ भवान् किं कर्तुमनाः ?” । सोऽब्रवीत्- “अद्य
अस्मत्स्वामी पिङ्गलको भीतो भीतपरिवारश्च वर्तते । तत्
एनं गत्वा भयकारणं विज्ञाय सन्धिविग्रहयानासनसंश्र-
यद्वैधीभावानामेकतमेन संविधास्ये”। करटक आह-“कथं
वेत्ति भवान् यद्भयाविष्टोऽयं स्वामी ?” सोऽब्रवीत्-“ज्ञेयं
किमत्र । यत उक्तञ्च-

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भाषाटीकासमेतम् । (१९)
"फिर आपकी क्या करनेकी इच्छा है ?" वह बोला-"आज हमारा
स्वामी पिंगलक डेरेकुटुम्बसहित भीत स्थितहै सो इसके निकट जाय
डरके कारणको जान सन्धि (मेल) विग्रह (युद्ध) यान् ('शत्रुके प्रतियात्रा)
आसन (समयका देखना) संश्रय (बलवानसे अभियुक्त होनेके कारण सब-
लका आश्रय) इनमेंसे एकका आश्रय करूंगा।" करटक बोला-"आप कैसे
जानते हैं कि, स्वामी भयभीत है?" वह बोला-"इस जाननेमें क्या है, कहा है-
उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते
हयाश्च नागाश्च वहन्ति चोदिताः ।
अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः
परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥ ४४ ॥
कहे अर्थको पशुभी ग्रहण करलेते हैं, हाथी, घोडे प्रेरितहुए (भार) वहन
करते हैं, पण्डितजन बिनकही बातकोभी ग्रहण करतेहैं, क्योंकि पराई चेष्टाके
ज्ञान होनेके फलवाली बुद्धियां होतीहैं ॥ ४४ ॥
तथाच मनुः-
जैसाही मनुजीने कहाहै-
आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषणेन च ।
नेत्रवक्त्रविकारैश्च लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ ४५ ॥
आकार (अवयव विषाद प्रसादको प्राप्त) से संकेतसे, गमन, क्रिया, भाषण,
नेत्र और मुखके विकारसे, मनके अन्तरकी बात जानी जाती है ॥ ४५ ॥
तदहैनं भयाकुलं प्राप्य स्वबुद्धिप्रभावेण निर्भयं कृत्वा वशी-
कृत्य च निजां साचिव्यपदवीं समासादयिष्यामि" । करटक
आह- "अनभिज्ञो भवान् सेवाधर्मस्य । तत्कथमेनं वशीकरि-
ष्यसि ?'। सोऽब्रवीत्- "कथमहं सेवानभिज्ञः। मया हि तातो-
त्सङ्गे क्रीडता अभ्यागतसाधूनां नीतिशास्त्रं पठतां यच्छ्रुतं
सेवाधर्मस्य सारभूतं हृदि स्थापितं श्रूयतां तच्चेदम्-
सो इस भयसे व्याकुल हुएको प्राप्त होकर अपनी बुद्धिसे निर्भय कर इसको
वशीभूत कर अपनी मन्त्रिपदवीको प्राप्त हूंगा"। करटक बोला-"आप सेवाधर्मसे
अनभिज्ञ हो तो इसे किस प्रकारसे वशीभूत करोगे"। वह बोला-"मैं किस
प्रकारमें सेवासे अनभिज्ञ हूं, मैने पिताकी गोदमें खेलते हुए अभ्यागत साधुओंकी

( २० ) पञ्चतन्त्रम् ।

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( २० ) पञ्चतन्त्रम् ।
नीतिशास्त्र पढते हुए जो सुना है, वह सेवाधर्मका सारभूत हृदयमें स्थापन कर-
लिया है उसे सुनो-
सुवर्णपुष्पितां पृथ्वीं विचिन्वन्ति नरास्त्रयः ।
शूरश्च कृतविद्यश्च यश्च जानाति सेवितुम् ॥ ४६ ॥
विक्रमी, विद्वान् और सेवक सुवर्णके पुष्पवाली पृथ्वीको खोज करतेहैं
(प्राप्त करते हैं) ॥ ४६ ॥
सा सेवा या प्रभुहिता ग्राह्या वाक्यविशेषतः ।
आश्रयेत्पार्थिवं विद्वांस्तद्वारेणैव नान्यथा ॥ ४७ ॥
वही सेवा है, जो प्रभुका हित करनेवाली है, वह प्रभुके वाक्यसे ग्रहणकरी
जाती है, विद्वान् पुरुष उस (वाक्य) द्वारसे राजाका आश्रय करे और उपाय
नहीं है ॥ ४७ ॥
यो न वेत्ति गुणान्यस्य न तं सेवेत पण्डितः ।
न हि तस्मात्फलं किंचित्सुकृष्टादूपरादिव ॥ ४८ ॥
जो जिसके गुण न जाने, विद्वान् उसकी सेवा न करें, कारण कि, उससे
कुछ फल नहीं होता, जैसे ऊषर भूमिके जोतनेसे ॥ ४८ ॥
द्रव्यप्रकृतिहीनोऽपि सेव्यः सेव्यगुणान्वितः ।
भवत्याजीवनं तस्मात्फलं कालान्तरादपि ॥ ४९ ॥
धन और प्रकृतिसे हीन पुरुषभी सेवनीय गुणोंसे युक्त हो तो सेवा करनी
चाहिये, उससे आजीवन और कालान्तरसे फलकी प्राप्तिभी होसकती है ॥४९॥
अपि स्थाणुवदासीनः शुष्यन्परिगतः क्षुधा ।
न त्वेवानात्मसम्पन्नाद्वृत्तिमीहेत पण्डितः ॥ ५० ॥
ठूंठकी समान स्थित हुआ सूखता हुआ महाभूखसे स्थित रहना (अच्छा)
है परन्तु चतुर पुरुष ज्ञानशून्य प्रभुसे वृत्तिप्राप्त होनेकी इच्छा न करै ॥ ५० ॥
सेवकः स्वामिनं द्वेष्टि कृपणं परुषाक्षरम् ।
आत्मानं किं स न द्वेष्टि सेव्यासेव्यं न वेत्ति यः ॥ ५१ ॥
सेवक कृपण स्वामीको कठिन अक्षरोंसे निन्दा करताहै, परन्तु वह अपनी
निन्दा क्यों नहीं करता, वह जो सेव्य और असेव्यको नहीं जानता है, (कारण
कि यह कृपण है वा नहीं पहले ही वह विचार कर स्वामीकी सेवा करै ) ५१॥

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भाषाटीकासमेतम् । ( २१ )
यमाश्रित्य न विश्रामं क्षुधार्त्ता यान्ति सेवकाः ।
सोऽर्कवन्नृपतिस्त्याज्यः सदा पुष्पफलोऽपि सन् ॥ ५२ ॥
जिसको प्राप्त होकर क्षुधासे व्याकुल सेवक विश्रामको प्राप्त नहीं होते हैं, वह
सदा पुष्प फलयुक्तभी राजा आकके वृक्षकी समान त्यागने योग्य है ॥ ५२ ॥
राजमातरि देव्यां च कुमारे मुख्यमन्त्रिणि ।
पुरोहिते प्रतीहारे सदा वर्त्तेत राजवत् ॥ ५३ ॥
राजमाता, पटरानी, कुमार, मुख्यमन्त्री, पुरोहित और द्वारपाल इनसे राजाकी
समान बर्ताव करै ॥ ५३ ॥
जीवेति प्रभु प्रोक्तः कृत्याकृत्यविचक्षणः ।
करोति निर्विकल्पं : स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५४ ॥
कृत्य अकृत्यका जाननेवाला पुकारनेसे जिव ऐसा कहै और विना विचारे आज्ञा
सम्पादन करे वह राजाका प्रिय होताहै ॥ ५४ ॥
प्रभुप्रसादजं वित्तं सुपाप्तं यो निवेदयेत् ।
वस्त्राद्यञ्च दधात्यङ्गे स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५५ ॥
जो प्रभुकी प्रसन्नतासे प्राप्त हुए द्रव्यसे सन्तोष प्रकाश करे और
उनके वस्त्र आदि अपने अंगमे धारण करे वह राजाका प्रिय होताहै ॥ ५५ ॥
अन्तःपुरचरैः सार्द्धं यो न मन्त्रं समाचरेत् ।
न कलत्रैर्नरेन्द्रस्य स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५६ ॥
अन्तःपुरमें रहनेवालोंके साथ जो सलाह नहीं करता है, न राजाकी कल-
त्रोंसे बात करताहै, वह राजप्रिय होताहै ॥ ५६ ॥
द्यूतं यो यमदूताभं हालां हालाहलोपमाम् ।
पश्येद्दारान्वृथाकारान्स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५७ ॥
जुएको यमदूतकी समान, सुराको विषकी समान, स्त्रियोंको कुत्सित आकार-
वाली देखता है, वह राजप्रिय होता है ॥ ५७ ॥
युद्धकालेऽग्रगो यः स्यात्सदा पृष्ठानुगः पुरे ।
प्रभोर्द्वाराश्रितो हर्म्ये स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५८ ॥
जो युद्धकालमे आगे चले, पुरमे पीछे २ चले, महलमें प्रभुक द्वारे स्थित रहे
वह राजाका प्रिय होता है ॥ ५८ ॥

(२२) पञ्चतन्त्रम् ।

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(२२) पञ्चतन्त्रम् ।
सम्मतोऽहं विभोर्नित्यमिति मत्वा व्यतिक्रमेत् ।
कृच्छ्रेष्वपि न मर्यादां स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५९ ॥
मैं प्रभुका नित्य सम्मत हूं, ऐसे विचार कर जो कठिनतामें भी मर्यादाका
आक्रमण नहीं करता है वह राजाका प्रिय होता है ॥ ५९ ॥
द्वेषिद्वेषपरो नित्यमिष्टानामिष्टकर्मकृत् ।
यो नरो नरनाथस्य स भवेद्राजवल्लभः ॥ ६० ॥
जो राजाके द्वेषियोंसे नित्य द्रोह करता है, प्रियजनोंका नित्य प्रिय करता है,
वह राजाका प्रिय होता ॥ ६० ॥
प्रोक्तः प्रत्युत्तरं नाह विरुद्धं प्रभुणा च यः ।
न समीपे हसत्युच्चैः स भवेद्राजवल्लभः ॥ ६१ ॥
जो प्रभुके कहनेपर विरुद्ध उत्तर नहीं देता है समीपमें उच्च स्वरसे नहीं हँस-
ताहै, वह राजप्रिय होता है ॥ ६१ ॥
यो रणं शरणं तद्वन्मन्यते भयवर्जितः ।
प्रवासं स्वपुरावासं स भवेद्राजवल्लभः ॥ ६२ ॥
जो भयरहित हो, युद्धको गृहवत् मानता है, परदेशको अपने नगरकी समान
मानता है, वह राजवल्लभ होता है ॥ ६२ ॥
न कुर्यान्नरनाथस्य योषिद्भिः सह सङ्गतिम् ।
न निन्दां न विवादं च स भवेद्राजवल्लभः ॥ ६३ ॥”
राजाकी स्त्रियोंके साथ संगती न करे, तथा उनकी निन्दा और विवाद न
करै, वह राजाका प्रिय होताहै ॥ ६३ ॥”
करटक आह-“अथ भवान् तत्र गत्वा किं तावत् प्रथमं
वक्ष्यति तत् तावदुच्यताम् ?”
करटक बोला-“तो तुम प्रथम वहां जाकर क्या कहोगे, वह तो कहो ?”
दमनक आह-
दमनक बोला-
“उत्तरादुत्तरं वाक्यं वदतां सम्प्रजायते ।
सुवृष्टिगुणसम्पन्नाद्बीजाद्बीजमिवापरम् ॥ ६४ ॥
“कहनेसे वाक्य उत्तरोत्तर प्रवृत्त हो जाता है, जैसे सुवृष्टिके गुणसे बीजसे
बीज होताहै ॥ ६४ ॥

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भाषाटीकासमेतम् । ( २३ )
अपायसन्दर्शनजां विपत्तिमुपायसन्दर्शनजाञ्च सिद्धिम् ।
मेधाविनो नीतिगुणप्रयुक्तां पुरःस्फुरन्तीमिव वर्णयन्ति ६५
'अपायसे प्राप्त होनेवाली विपत्ति, उपायके करनेसे सिद्धि बुद्धिमान् नीतिके
गुणसे प्रयुक्त की हुई आगे स्फुरायमान होते हुएकी समान वर्णन करते हैं ॥६५॥
एकेषां वाचि शुकवदन्येषां हृदि मूकवत् ।
हृदि वाचि तथान्येषां वल्गु वलगन्ति सूक्तयः ॥ ६६ ॥
किन्हींके वचन बोलनेमे तोतेकी समान मधुर और मनमे कपट, कोई 'हृदयमें
मूकवत् अर्थात् वाक्य तो सुननेमें कठोर और हृदय कपटशून्य, दूसरे पुरुषोंके
सुवचन हृदय और वचन दोनोंसेही सारताको प्रगट करते हैं ॥ ६६ ॥
न च अहमप्राप्तकालं वक्ष्ये । आकर्णितं मया नीतिसारं
पितुः पूर्वमुत्सङ्गं हि निषेवता ।
मैं असमयके वचनोंको न कहूंगा, पिताकी गोदीको सेवन करते हुए पहिले
मैने सुना है ।
अप्राप्तकालं वचनं बृहस्पतिरपि ब्रुवन् ।
लभते बह्ववज्ञानमपमानञ्च पुष्कलम् ॥ ६७ ॥”
अप्राप्त कालके वचनोंको बृहस्पतिभी कहें तो बहुत अवज्ञा और अपमानको
प्राप्त होते हैं ॥ ६७ ॥ ”
करटक आह-
करटक बोला-
“ दुराराध्या हि राजानः पर्वता इव सर्वदा ।
व्यालाकीर्णाः सुविषमाः कठिना दुष्टसेविताः ॥ ६८ ॥
“पर्वतकी समान राजा सदा दुराराध्य हैं, जैसे कि राजा और पर्वत सर्प
( हिंस्रजन ) श्वापद जीवोंसे युक्त दारुण और नीचे ऊंचे मागोंसे विषम होते हैं,
इसी प्रकार राजा दुष्ट सेवित होनेसे कठिन होते हैं ॥ ६८ ॥
तथाच-
और देखो-
भोगिनः कञ्चुकाविष्टाः कुटिलाः क्रूरचेष्टिताः ।
सुदुष्टा मन्त्रसाध्याश्च राजानः पन्नगा इव ॥ ६९ ॥

( २४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

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( २४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

सुख भोगमें रत, फणावाले, वस्त्रधारी, केंचलीवाले, कुटिल (कपटी), टेढी
गतिवाले, निष्ठुरचेष्टावाले, दुष्टराजा सर्पकी समान मन्त्र चित्तानुवृत्तिसेही
साध्य होते हैं ॥ ६९ ॥
द्विजिह्वाः क्रूरकर्माणोऽनिष्टाश्छिद्रानुसारिणः ।
दूरतोऽपि हि पश्यन्ति राजानो भुजगा इव ॥ ७० ॥
दो जिह्वावाले, क्षण क्षणमे भिन्न बचन कहनेवाले, क्रूरकर्म करनेवाले, अनिष्ट
(निष्पत्तिरहित) दोषके देखनेवाले, (बिलमें गमन करनेवाले) राजा
सर्पोंकी समान दूरसेही देखते हैं ॥ ७० ॥
स्वल्पमप्यपकुर्वन्ति येऽभीष्टा हि महीपतेः ।
ते वह्नाविव दह्यन्ते पतङ्गाः पापचेतसः ॥ ७१ ॥
जो राजाके इष्टपुरुष उनका थोडाभी अनिष्ट करते हैं, वे पापचित्तवाले
अग्निमें पतंगकी समान जलते हैं ॥ ७१ ॥
दुरारोहं पदं राज्ञां सर्वलोकनमस्कृतम् ।
स्वल्पेनाप्यपकारेण ब्राह्मण्यमिव दुष्यति ॥ ७२ ॥
सब लोकोंसे नमस्कार करनेके योग्य राजोंका पद दुरारोह (कठिनसे प्राप्त)
है, थोडेसेभी अपकारसे ब्राह्मणत्वकी समान दूषित होजाता है ॥ ७२ ॥
दुराराध्याः श्रियो राज्ञां दुरापा दुष्परिग्रहाः ।
तिष्ठन्त्याप इवाधारे चिरमात्मनि संस्थिताः ॥ ७३ ॥”
राजलक्ष्मी कठिनतासे सेवनीय होसक्ती है, इसी कारण दुर्लभ और प्राप्य
होनेको अशक्य है, लक्ष्मी आधार (पात्र) में जलकी समान यत्नसे रक्षित
की हुई चिरकालतक अपने पास रहती है ॥ ७३ ॥”
'दमनक आह- “सत्यमेतत्परं किन्तु-
दमनक बोला,-“यह सत्य है किन्तु-
यस्य यस्य हि यो भावस्तेन तेन समाचरेत् ।
अनुप्रविश्य मेधावी क्षिप्रमात्मवशं नयेत् ॥ ७४ ॥
जिस जिसका जो जो भाव है; उस उस भावसे उसको सेवन करै,
बुद्धिमान् उसमें प्रवेश कर शीघ्र अपने वशमे करै ॥ ७४ ॥
भर्तुश्चित्तानुवर्तित्वं सुवृत्तं चानुजीविनाम् ।
राक्षसाश्चापि गृह्यन्ते नित्यं छन्दानुवर्तिभिः ॥ ७५ ॥

तद्दानस्य शंसा अमन्त्रतन्त्रं वशीकरणम् ॥ ७६ ॥ " '

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स्वामीके चित्तके अनुसार वर्तना अनुजीवियोंका सुशील है, निरन्तर
उनके आशयके अनुसार चलनेवाले मनुष्य राक्षसोंकोभी वश करतेहै ॥७५॥
सरुषि नृपे स्तुतिवचनं तदभिमते प्रेम तद्विषि द्वेषः ।
तद्दानस्य शंसा अमन्त्रतन्त्रं वशीकरणम् ॥ ७६ ॥ " '
राजाके क्रोधकरनेमें स्तुतिके वचन, उनके इष्टमें प्रेम, उनके द्वेषवालेसे द्वेष,
उनके दानकी प्रशंसा, बिना मन्त्रके वशीकरण तन्त्र है ॥ ७६ ॥ "
करटक आह-
करटक बोला-
"यद्येवमभिमतं तर्हि शिवास्ते पन्थानः सन्तु । यथा-
भिलषितम् अनुष्ठीयताम्" । सोऽपि प्रणम्य पिङ्गलका-
भिमुखं प्रतस्थे । अथ आगच्छन्तं दमनकमालोक्य पिङ्गलको
द्वाःस्थमब्रवीत्-" अपसार्यतां वेत्रलता । अयमस्माकं चि-
रन्तनो मन्त्रिपुत्रो दमनकोऽव्याहतप्रवेशः । तत्प्रवेश्यतां द्वि-
तीयमण्डलभागी" इति । स आह-"यथा अवादीत् भवान्"
इति । अथोपसृत्य दमनको निर्दिष्टे आसने पिङ्गलकं प्रणम्य
प्राप्तानुज्ञ उपविष्टः । स तु तस्य नखकुलिशालंकृतं दक्षिण-
पाणिमुपरि दत्त्वा मानपुरःसरमुवाच-"अपि शिवं भवतः ?
कस्माच्चिरात् दृष्टोऽसि ?" । दमनक आह-"न किञ्चिदेव-
पादानामस्माभिः प्रयोजनम् । परं भवतां प्राप्तकालं वक्तव्यं
यत उत्तममध्यमाधमैः सर्वैरपि राज्ञां प्रयोजनम् ।
"जो यह विचारहै तो आपके मार्ग मगलकारी हों । यथेच्छ अनुष्ठान
करो"। वहभी प्रणामकर पिंगलकके सन्मुख चला । तब आते हुए दमनकको
देखकर पिंगलक द्वारपालसे बोला-"वेत्रलता ( दड ) अलगकरो, यह
हमारा प्राचीन मन्त्रीपुत्र बेरोकटोक प्रवेशवालाहै सो आनेदो दूसरे मण्डल
( आसन ) का अधिकारी है"। वह बोला-"जो कुछ आप आज्ञा देते हैं"।
तब जाकर दमनक दिये हुए आसनमें पिंगलकको प्रणाम करके बैठा । वह तो
उसके नखरूपी वज्रसे अलंकृत दक्षिण हाथको ऊपर रखकर सन्मानसे बोला-
"आपको मगल है ? क्यों बहुत दिनोंमें दीखे ?"दमनक बोला-"श्रीमान्के चर-

( २६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

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( २६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
णोंका यद्यपि हमसे कुछ प्रयोजन नहीं है परन्तु आपसे समयपर वचन कहना
उचितही है.कारण कि,उत्तम,मध्यम,अधम सभीसे राजाओंका प्रयोजन होता है ।
उक्तञ्च-
कहाभी है-
दन्तस्य निष्कोषणकेन नित्यं कर्णस्य कण्डूयनकेन वापि ।
तृणेन कार्य्यं भवतीश्वराणां किमंग वाग्घस्तवता नरेण७७
दांतोंके कुरेदनेसे वा नित्य कर्णोंके खजानेसे तृणसे भी राजोंका कार्य
होताहै हे अङ्ग ! वाणी और हाथवाले मनुष्यसे कार्य होता है सदा तो
कहनाही क्या है ॥ ७७ ॥
तथा वयं देवपादानामान्वयागता भृत्या आपत्स्वपि पृष्ठ-
गामिनो यद्यपि स्वमधिकारं न लभामहे तथापि देवपादा-
नामेतत् युक्तं न भवति ।
इसी प्रकारसे हम स्वामीके चरणोंके कुलक्रमसे प्राप्त हुये भृत्य आपदोंमेंभी
पीछे चलनेवाले हैं यद्यपि अपने अधिकारको प्राप्त नहीं हैं तोभी श्रीमान्‌के
चरणोंको यह योग्य नहीं है ।
उक्तञ्च-
कहाभी है-
स्थानेष्वेव नियोक्तव्या भृत्याश्चाभरणानि च ।
न हि चूडामणिः पादे प्रभवामीति बध्यते ॥ ७८ ॥
भृत्य और गहने स्थानमें नियुक्त करने चाहिये । मैं प्रभुहूं ऐसा मानकर
चूडामणि (शिरका भूषण) चरणपर कोई धारण नहीं करता है ॥ ७८ ॥
यतः-
कारण-
अनभिज्ञो गुणानां यो न भृत्यैरनुगम्यते ।
धनाढ्योऽपि कुलीनोऽपि क्रमायातोऽपि भूपतिः ॥ ७९ ॥
जो गुणोंसे अनभिज्ञ है; भृत्य उसको साथ नहीं देते, चाहें वह धनाढ्य
कुलीन और क्रमायात राजा हो ॥ ७९ ॥

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[Header] भाषाटीकासमेतम् । (२७)

उक्तञ्च-
कहा है कि-
असमैः समीयमानः समैश्च परिहीयमाणसत्कारः ।
धुरि यो न युज्यमानस्त्रिभिर्थपतिं त्यजति भृत्यः ॥८०॥
जो भृत्य असमान भृत्योंसे समानताको प्राप्त किया जाय तुल्य भृत्योंसे दूर
सत्कारवाला किया जाय तथा कार्यभारमें नियुक्त न किया जाय इन तीन कार-
णोंसे भृत्य राजाको त्यागन करदेता है ॥ ८० ॥
यच्च अविवेकितया राजा भृत्यानुत्तमपदयोग्यान् हीना
धमस्थाने नियोजयति न ते तत्रैव तिष्ठन्ति न भूपतेर्दोषो
न तेषाम् । उक्तञ्च-
और जो अज्ञानतासे उत्तम पदके योग्य भृत्योंको हीन अधम स्थानमें नियुक्त
करता है, न वे वहा रहते हैं न राजाका दोष है न उनका । कहाभी है-
कनकभूषणसंग्रहणोचितो यदि मणिखपुणि प्रतिबध्यते ।
न स विरोति न चापि स शोभते भवति योजयितुर्वचनी-
यता ॥ ८१ ॥
सुवर्णके गहनेमे लगाने योग्य मणि यदि निकृष्ट धातुमे लगाई जाय, वह मणि
न रोती है, न शोभित होती है किन्तु वैसे नियुक्त करनेवालेकी निन्दा होतीं है
कि, लगानेवालेको योग्यायोग्यका ज्ञान नहीं है ॥ ८१ ॥
यच्च स्वामी एवं वदति "चिराद्दृश्यते" तदपि श्रूयताम् ।
सव्यदक्षिणयोर्यत्र विशेषो नास्ति हस्तयोः ।
कस्तत्र क्षणमप्यार्यो विद्यमानगतिर्वसेत् ॥ ८२ ॥
और जो स्वामी यह कहते हैं कि, "बहुत कालमें देखा" सोभी सुनो जिस
स्थानमे दहिने वाये हाथका विशेष नहीं है, वहा सब स्थानमे जानेवाला कौन
बुद्धिमान् क्षणमात्रभी स्थिति करेगा ॥ ८२ ॥
काचे मणिर्मणौ काचो येषां बुद्धिविंकल्प्यते ।
न तेषां सन्निधौ भृत्यो नाममात्रोऽपि तिष्ठति ॥ ८३ ॥
जिनकी बुद्धि काचमे मणि मणिमें काचका विकल्प करती है उनके निकट
भृत्यजन नाममात्रकोभी स्थित नहीं होते ॥ ८३ ॥

( २८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

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( २८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
परीक्षका यत्र न सन्ति देशे नार्घन्ति रत्नानि समुद्रजानि ।
आभीरदेशे किल चन्द्रकान्तं त्रिभिर्वराटैर्विपणन्ति गोपाः ८४
जिस देशमें परीक्षा करनेवाले नहीं हैं वहां समुद्रसे उत्पन्न हुए रत्नोंका मूल्य
नहीं होता ह आभीर देशमें चन्द्रकान्तमणिको गोप तीन कौडीसे खरीदते हैं ८४
लोहिताख्यस्य च मणेः पद्मरागस्य चान्तरम् ।
यत्र नास्ति कथं तत्र क्रियते रत्नविक्रयः ॥ ८५ ॥
लोहित मणि और पद्मरागमणिको अन्तर जहां नहीं है, वहां किस प्रकार
रत्नोंका विक्रय होसक्ता है ॥ ८५ ॥
निर्विशेषं यदा स्वामी समं भृत्येषु वर्तते ।
तत्रोद्यमसमर्थानामुत्साहः परिहीयते ॥ ८६ ॥
जब स्वामी सबभृत्योंमें एकसा विशेषतः रहित वर्तता है वहां उद्यममें सम-
र्थोंका उत्साह हीन हो जाताहै ॥ ८६ ॥
न विना पार्थिवो भृत्यैर्न भृत्याः पार्थिवं विना ।
तेषां च व्यवहारोऽयं परस्परनिबन्धनः ॥ ८७ ॥
भृत्योंके बिना राजा नहीं और न राजाके बिना भृत्य हैं, उनका यह व्यव-
हार पस्पर निबन्धवाला है ॥ ८७ ॥
भृत्यैर्विना स्वयं राजा लोकानुग्रहकारिभिः ।
मयूखैरिव दीप्तांशुस्तेजस्व्यापि न शोभते ॥ ८८ ॥
भृत्योंके बिना राजा ऐसे शोभित नहीं होता जिस प्रकार लोककी अनुग्रह-
करनेवाली किरणोंके बिना तेजस्वी सूर्य नहीं शोभित होता है ॥ ८८ ॥
अरैः सन्धाय्र्यते नाभिर्नाभौ चाराः प्रतिष्ठिताः ।
स्वामिसेवकयोरेवं वृत्तिचक्रं प्रवर्त्तते ॥ ८९ ॥
अरोंमें नाभि और नाभ (पुट्ठी) में अरे स्थित रहते हैं, इस प्रकारसे यह
स्वामी सेवकका आजीविका चक्र चलता है ॥ ८९ ॥
शिरसा विधृता नित्यं स्नेहेन परिपालिताः ।
केशा अपि विरज्यन्ते निःस्नेहाः किं न सेवकाः ॥ ९० ॥
नित्य शिरसे धारण किये स्नेहसे परिपालित तेलके बिना केशभी रूखे हो
जाते हैं, क्या सेवक न होंगे ॥ ९० ॥

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भाषाटीकासमेतम्। (२९)
राजा तुष्टो हि भृत्यानामर्थमात्रं प्रयच्छति ।
ते तु सम्मानमात्रेण प्राणैरप्युपकुर्वते ॥ ९१ ॥
राजा प्रसन्न होकर भृत्योंको अर्थमात्र प्रदान करता है, और वे सन्मानमात्रसे
उसके निमित्त अपने प्राण लगादेते हैं ॥ ९१ ॥
एवं ज्ञात्वा नरेन्द्रेण भृत्याः कार्या विचक्षणाः ।
कुलीनाः शौर्यसंयुक्ताः शक्ता भक्ताः क्रमागताः ॥ ९२ ॥
यह विचारकर राजाओंको चतुर भृत्य करने चाहिये, जो कुलीन शूरतासे
संयुक्त समर्थ भक्त और कुलपरंपरासे आये हों ॥ ९२ ॥
यः कृत्वा सुकृतं राज्ञो दुष्करं हितमुत्तमम् ।
लज्जया वक्ति नो किञ्चित्तेन राजा सहायवान् ॥ ९३ ॥
जो राजाका दुःसाध्य उत्तम हित करके लज्जासे कुछ नहीं कहता है, उससे
ही राजा सहायवान् होता है ॥ ९३ ॥
यस्मिन् कृत्यं समावेश्य निर्विशङ्केन चेतसा ।
आस्यते सेवकः स स्यात्कलत्रमिव चापरम् ॥ ९४ ॥
जिसमें कार्यको निर्भय चित्तसे समर्पण करके राजा स्थित होताहै वह सेवक
राजाको अन्य कलत्रकी समान पोषणीय है ॥ ९४ ॥
योऽनाहूतः समभ्येति द्वारि तिष्ठति सर्वदा ।
पृष्टः सत्यं मितं ब्रूते स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९५ ॥
जो बिनाबुलाये समीपमें स्थित रहता है सदा द्वारेही स्थित रहता है और
पूछनेसे सत्य बोलता है वह राजाके भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९५ ॥
अनादिष्टोऽपि भूपस्य दृष्ट्वा हानिकरञ्च यः ॥
यतते तस्य नाशाय स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९६ ॥
और जो राजाकी आज्ञाके बिनाभी हानिकारक वार्ताको देख उसके नाश
करनेका यत्न करता है, वह राजाके भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९६ ॥
तांडितोऽपि दुरुक्तोऽपि दण्डितोऽपि महीभुजा ।
यो न चिन्तयते पापं स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९७ ॥
जो राजासे ताडित होकर कठोर कहा जाकर दण्ड दिया जाकर भी राजाका
अनिष्ट चिन्तन नहीं करताहै वह राजाका भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९७ ॥

( ३० ) पञ्चतन्त्रम् ।

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( ३० ) पञ्चतन्त्रम् ।
न गर्वं कुरुते माने नापमाने च तप्यते ।
स्वाकारं रक्षयेद्यस्तु स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९८ ॥
जो सन्मानमें गर्व नहीं करता, अपमानमें तापित नहीं होता है और जो
अपने मानापमानके भावको रक्षित करता है वह राजाका भृत्य होनेके योग्यहै ९८
न क्षुधा पीड्यते यस्तु निद्रया न कदाचन ।
न च शीतातपाद्यैश्च स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९९ ॥
कभीभी जो निद्रा और क्षुधा शीत आदिसे पीडित नहीं होता है वह राजा-
ओंके भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९९ ॥
श्रुत्वा सांग्रामिकीं वार्त्तां भविष्यां स्वामिनं प्रति ।
प्रसन्नास्यो भवेद्यस्तु स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ १०० ॥
जो आगे होनेवाली स्वामीकी संग्राम वार्ताको सुनकर प्रसन्नमुख होता है
वह राजाके भृत्य होनेके योग्य है ॥ १०० ॥
सीमावृद्धिं समायाति शुक्लपक्ष इवोडुराट् ।
नियोगसंस्थिते यस्मिन् स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ १०१ ॥
जिस भृत्यके नियुक्त होनेमें शुक्ल पक्षके चन्द्रमाकी समान राजाकी सीमा
वृद्धिको प्राप्त होती हे वही राजाओंका भृत्य होनेके योग्य है ॥ १०१ ॥
सीमा सङ्कोचमायाति वह्नौ चर्म इवाहितम् ।
स्थिते यस्मिन्स तु त्याज्यो भृत्यो राज्यं समीहता ॥ १०२ ॥
और जिसकी स्थितिमें अग्निमें चर्मकी समान सीमा संकोच भावको प्राप्त
होतीहै राज्यकी इच्छा करनेवाले राजा उस भृत्यको त्यागने करे ॥ १०२ ॥
तथा शृगालोऽयमिति मन्यमानेन ममोपरि स्वामिना यदि
अवज्ञा क्रियते तदपि अयुक्तम् । उक्तं च यतः-
और यह शृगाल है यदि ऐसा मानकर स्वामी मेरी अवज्ञा करें तो यहभी
अनुचित है । कारण कहा भी है-
कौशेयं कृमिजं सुवर्णमुपलाहूवाप गोरोमतः
पङ्कात्तामरसं शशाङ्क उदधेरिन्दीवरं गोमयात् ।
काष्ठादग्निरहेः फणादपि मणिर्गोपित्ततो रोचना
प्राकाश्यं स्वगुणोदयेन गुणिनो गच्छन्ति किं जन्मना १०३