पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( ४३० ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ४३० ) पञ्चतन्त्रम् ।
सुखेन तिष्ठ" । अथ स ब्राह्मणो दैववशात् केनापि साधुना
कूपादुत्तारितः परिभ्रमन् तदेव नगरं आयातः । तया दुष्ट-
भार्य्यया दृष्टो राज्ञे निवेदितः । “ राजन् ! अयं मम भर्तुः
वैरी समायातः ” । राज्ञा अपि वधः आदिष्टः । सोऽब्रवीत्-
“देव ! अनया मम सक्तं किञ्चिद् गृहीतमास्ति यदि त्वं धर्म-
वत्सलः तद्दापय” । राजा अब्रवीत्-“भद्रे ! यत् त्वया अस्य
सक्तं किञ्चिद्गृहीतमास्ति तत् समर्पय” । सा प्राह-“देव !
मया न किञ्चित् गृहीतम्” । ब्राह्मण आह-“यन्मया त्रिवा-
चिकं स्वजीवितार्द्धं दत्तं तद्देहि” । अथ सा राजभयात् तत्र
एव त्रिवाचिकं एव जीवितमनेन दत्तमिति जल्पन्ती प्राणैः
विमुक्ता । ततः सविस्मयं राजा अब्रवीत्-“किमेतत्” इति।
ब्राह्मणेनापि पूर्ववृत्तान्तः सकलोऽपि तस्मै निवेदितः। अतोऽहं
ब्रवीमि-
किसी स्थानमें कोई ब्राह्मण था । उसको अपनी स्त्री प्राणोंसेभी अधिक
प्यारी थी । वह प्रतिदिन कुटुम्बके साथ क्लेश करती नहीं उपरामको प्राप्त
होती थी । वह ब्राह्मणभी क्लेशको न सहकर भार्याके प्रेमसे अपने कुटुम्बको छोड
ब्राह्मणीके संग बहुत दूर देशको चला गया । तब महाजंगलके मध्यमें ब्राह्मणीने
कहा-“आर्य्यपुत्र ! मुझे बडी प्यास लगी है । सो कहीं जलकी खोज करो” ।
तब यह उसके वचन कहनेपर जबतक जल लेकर आता है तबतक उसे मरा
देखता हुआ । अति प्यारके कारण दुःखसे जब विलाप करने लगा । तब
आकाशवाणी सुनाई दी । “हे ब्राह्मण ! यदि तू इसे अपने जीवनके आधे दिन
देगा तो यह ब्राह्मणी जिये”। यह सुन ब्राह्मणने पवित्र होकर तीन बार उच्चा-
रण कर अपने जीवनका अर्ध दिया । बोलनेके साथही वह ब्राह्मणी जी उठी ।
तब वे दोनों जल पान कर वनके फल भक्षण करते चलने लगे । तब क्रमसे
किसी नगरके देशमें पुष्पवाटिका में प्रवेश कर ब्राह्मणने अपनी भार्यासे कहा-
“भद्रे ! जबतक मैं भोजन ग्रहण कर आऊं । तबतक तुम यहीं रहो”। ऐसा कह
ब्राह्मण नगरके बीचमें गया । तब उस पुष्पवाटिका में एक लंगडा कुएकी सींडी
पर खेलता हुआ मनोहर वाणीसे गीत गा रहा था । उसको सुन कामबाणसे
भाषाटीकासमेतम् । (४३१)
अर्दित हो ब्राह्मणी उसके पास जाकर बोली,—"भद्र ! यदि मेरी इच्छा नहीं
करो तो मुझ आसक्तकी स्त्रीहत्या तुमको लगेगी"। लगडा बोला—"व्याधीसे
ग्रस्त मुझसे तू क्या करेगी ?” वह बोली इस कहनेसे क्या है । अवश्य तेरे संगमे
संगम करूंगी"। यह सुनकर उसने वैसाही किया, सुरतके अंतमें वह बोली—
"अबसे लेकर जीवन पर्यन्त अपना आत्मा मैंने तुम्हें दिया। ऐसा जानकर तुमभी
हमारे साथ आओ"। वह बोला—"ऐसाही हो" तब ब्राह्मण भोजन लिये आकर
उसके साथ खाने लगा। वह बोली—"यह लगडा भूखा है सो इसकोभी कुछ ग्रास
प्रदान करो"। वैसा करनेपर फिर ब्राह्मणीने कहा—"हे ब्राह्मण! तुम सहायहीन होकर
ग्रामान्तरको जाते हो। सो मेरा कोई बचनसहायक भी नहीं सो इस पंगुको लेचलें?"
वह बोला—"मैं स्वयं अपनेसे अपने लेजानेको तौ समर्थ हूही नहीं। फिर इस
पंगुको कैसे लेचलूगा ?” वह बोली—"गठरीके भीतर कर इसको मैं ले जाऊ-
गी"। तब उसके बनावटी वचनोंसे मोहित चित्त होकर उसने वह सब अंगी-
कार किया । वैसा करनेपर एक दिन कूपके समीप विश्राम करते हुए ब्राह्मणको
उस पंगुमें आसक्त चित्तवाली स्त्रीने कूपमें गिरा दिया । वहभी पंगुको ग्रहण
कर किसी नगरमें प्रविष्ट हुई। वहा करके चुराजानेकी खोज रक्षाके निमित्त
इधर उधर घूमते हुए राजपुरुषोंने उसके मस्तकपर वह गठरी देखी । और
बलसे छीनकर राजाके आगे लेगये। राजानेभी जब उसे खोला तौ उसमें
लंगडेको देखा । तब वह ब्राह्मणी विलाप करती हुई राजपुरुषोंके पीछे २ वहा
आई राजाने पूछा—"तेरा क्या वृत्तान्त है” वह बोली—"मेरा यह स्वामी रोग-
ग्रस्त गोतियोंसे उद्वेजित हुआ है मैंने स्नेहसे व्याकुल मनसे शिरपर धारण कर
आपके नगरमें प्राप्त किया है"। यह सुनकर राजा बोला—"ब्राह्मणि ! तू मेरी
बहन दो ग्राम ग्रहण कर भर्ताके संग भोगोंको भोगती सुखसे रह" । उधर
वह ब्राह्मण दैववशसे किसी साधुद्वारा कुएंसे निकाला हुआ, घूमता हुआ उसी
नगरमें आया । और दुष्ट उस भार्याने देखकर राजासे कहा—"राजन् ! यह मेरे
स्वामीका वैरी आया है" । राजाने उसके वधकी आज्ञा दी । वह बोला—"देव!
इसने मेरा सक्त ( सक्रान्त वस्तु ) कुछ ग्रहण कर लिया है । जो तुम धर्मवत्सल
हो तो दिलादो" । राजा बोला—"भद्रे ! जो तुमने इसका सक्त ( सक्रान्त )
कुछ लिया हो तो देना"। वह बोली—"देव! मैंने कुछ ग्रहण नहीं किया"। ब्राह्मण