पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( १२८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १२८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
अकारणद्वेषपरो हि यो भवेत्
कथं नरस्तं परितोषयिष्यति ॥ ३०६ ॥
जो मनुष्य किसी कारणको अनुसरण करके कुपितहो वह तिस
कारणके नष्ट होनेपर निश्चय शांतिको प्राप्त होजाताहै और जो मनुष्य कारणके
बिना द्वेष करनेवालाहै उसको मनुष्य कैसे प्रसन्न करसकता है ? अर्थात् नहीं
करसकता ॥ ३०६ ॥
अहो ! साधु चेदमुच्यते ।
अहो ! यह सत्य कहाहै-
भक्तानामुपकारिणां परहितव्यापारयुक्तात्मनां
सेवासंव्यवहारतत्त्वविदुषां द्रोहच्युतानामपि ।
व्यापत्तिः स्खलितान्तरेषु नियता सिद्धिर्भवेद्वा न वा
तस्मादम्बुपतेरिवावनिप्तेः सेवा सदा शङ्किनी ॥ ३०७ ॥
उपकारी भक्त तथा पराये निमित्त व्यापार करनेवाले सेवा और व्यवहारके
तत्त्वजाननेवाले द्रोहसे रहित पुरुषोंकोभी अस्थिर स्वभाववाले स्वामियोंसे आपत्ति
होतीहीहै कि, सिद्धि हो या नहो इसकारण सागरकी समान राजाओंकी सेवा
सदा शंकासे व्याप्त हे ( जैसे समुद्रसे रत्नलाभ शंकास्पद है ) ॥ ३०७ ॥
तथाच-
औरभी-
भावस्निग्धैरुपकृतमपि द्वेष्यतां याति लोके
साक्षादन्यैरपकृतमपि प्रीतये चोपयाति ।
दुर्ग्राह्यत्वान्नृपतिमनसां नैकभावाश्रयाणां
सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ॥ ३०८ ॥
मनोहर भावसे उपकार कियाहुआभी लोकमे द्वेष्यताको प्राप्त होताहै और
साक्षात दूसरोंके अपकार करनेसेभी प्रीतिको प्राप्त होताहै एक भावसे न रह-
नेवाले राजाओंका मन दुर्ग्राह्य होनेसे सेवाका धर्म महाकठिन है अर्थात् योगि-
योंको भी अगम्यहै ॥ ३०८ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( १२९ )
तत्परिज्ञातं मया यत् प्रसादमसहमानैः समीपवर्त्तिभिः
एष पिङ्गलकः प्रकोपितः । तेनायं मम अदोषस्यापि एवं
वदति । उक्तञ्च-
सो यह मैने जान लिया कि, प्रसादको न सहनेवाले समीपवर्त्तियोने इस
पिंगलकको मेरे ऊपर क्रुद्ध कर दिया इस कारण यह मुझ अदोषीको भी ऐसा
कहताहै। कहाहै-
प्रभोः प्रसादमन्यस्य न सहन्तीह सेवकाः ।
सपत्न्य इव संक्रुद्धाः स्वपत्नयाः सुकृतैरपि ॥ ३०९ ॥
सेवक प्रभुकी प्रसन्नता होनेसे उसको ( मनुष्य ) नही सहसकते हैं अपने
आचरण किये भावसे सौत स्त्रिये जैसे किसी एकपर किये स्वामीके प्रसादको
नहीं सह सक्तीहैं ॥ ३०९ ॥
भवति चैवं यद्गुणवत्सु समीपवर्त्तिषु गुणहीनानां न प्रसा-
दो भवति । उक्तञ्च-
यह होताहीहै गुणवाले समीपवर्त्तियोमें गुणहीनॉपर प्रसाद नहीं होताहै। कहाहै-
गुणवत्तरपात्रेण छाद्यन्ते गुणिनां गुणाः ।
रात्रौ दीपशिखाकान्तिर्न भानावुदिते सति ॥ ३१० ॥”
अति गुणशालि जनोंसे गुणियोके गुण तिरस्कृत किये जाते हैं जैसा रात्रिमें
दीपकी शिखा मनोहर लगतीहै सूर्य उदयमे नहीं ॥ ३१० ॥”
दमनक आह-“भो मित्र ! यद्येवं तन्नास्ति ते भयं प्र-
कोपितोऽपि स दुर्जनैः तव वचनरचनया प्रसादं यास्यति” ।
स आह-“भो ! न युक्तमुक्तं भवता लघूनामपि दुर्जनानां
मध्ये वस्तुं न शक्यते उपायान्तरं विधाय ते नूनं घ्नन्ति ।
उक्तञ्च-
दमनक बोला-“भो मित्र ! जो ऐसाहै तो तुमको भय नहीं क्रोधित कराया
हुआ भी वह दुर्जनोंसे तुम्हारी बचनरचनासे प्रसन्न होजायगा” । वह बोला-
“यह तुमने युक्त न कहा लघुभी दुर्जनोंके मध्यमें नहीं रहाजाता उपायान्तर
विधानकर वे अवश्य मारतेहैं । कहाहै-
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