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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( ३७८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ३७८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

पर्वत गुहा जलानेसे जीतने योग्य करदी । सो अब परिवार सहित मिलकर
एक एक वनकी लकड़ी जलती हुई लेकर गुहाके द्वार मेरे घोंसलेमें
डालदो जिससे वे सब शत्रु कुम्भीपाक नरककी समान दुःखसे मरजायंगे” । यह
सुनकर प्रसन्न हो मेघवर्ण बोला,-"तात ! अपना वृत्तान्त तो कहो ? । बहुत
दिनोंमें आज देखा” । वह बोला--"वत्स यह कथनका समय नहीं है जो कदा-
चित् उस शत्रु का कोई प्रणिधी मेरा यहां आगमन कहदे । सो जानकर अन्धा
भी कहीं अन्य स्थानमें चलाजाय सो शीघ्रता करो । कहा है-
शीघ्रकृत्येषु कार्येषु विलम्बयति यो नरः ।
तत्कृत्यं देवतास्तस्य कोपाद्विघ्नन्त्यसंशयम् ॥ २३१ ॥
शीघ्रकरने योग्य कार्योंमें जो मनुष्य बिलम्ब करता है देवता उस कोपसे
उसके कृत्यको अवश्य नष्ट कर देते हैं ॥ २३१ ॥
तथाच-
और देखो-
यस्य यस्य हि कार्य्यस्य फलितस्य विशेषतः ।
क्षिप्रमक्रियमाणत्वं कालः पिबति तत्फलम् ॥ २३२ ॥
जिस जिस विशेष फलवाले कार्यको शीघ्र नहीं किया जाय तो विलम्बरूप
काल उसका फल पानकर जाता है ॥ २३२ ॥
तद्गुहायां आयातस्य ते हतशत्रोः सर्वं सविस्तारं
निर्व्याकुलतया कथयिष्यामि” । अथ असौ तद्वचनमाकर्ण्य
सपरिजन एकैकां ज्वलंतीं वनकाष्ठिकां चञ्च्वग्रेण गृहीत्वा
तद्गुहाद्वारं प्राप्य स्थिरजीविकुलाये प्राक्षिपत् । ततः सर्वे
ते दिवान्धा रक्ताक्षवाक्यानि स्मरन्तो द्वारस्य आवृतत्वात्
अनिःसरन्तो गुहामध्ये कुम्भीपाकन्यायमापन्ना मृताश्च ।
एवं शत्रून् निःशेषतां नीत्वा भूयोऽपि मेघवर्णः तदेव न्यग्रो-
धपादपदुर्गं जगाम । ततः सिंहासनस्थो भूत्वा सभामध्ये
प्रमुदितमनाः स्थिरजीविनमपृच्छत्-“तात ! कथं त्वया
शत्रुमध्ये गतेन एतावत् कालो नीतः ? तदत्र कौतुकम-
स्माकं वर्त्तते । तत् कथ्यताम् । यतः-

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भाषाटीकासमेतम् । ( ३७९ )

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सो गुहासे लौटनेपर शत्रु मारनेवाले आपसे सब वृत्तान्त विस्तारपूर्वक
व्याकुलतारहित होकर कहूँगा”। तब यह उसका वचन सुन परिजनसहित एक
एकजलती बनकी लकडी चोचमें ग्रहण कर उस गुहाके द्वारमें प्राप्त हो स्थिरजी
वीके घोंसलेमें डालते हुए । तब वे सब दिनके अन्धे रक्ताक्षके वचनोंको स्मरण
करते द्वार रुकनेसे न निकलनेके कारण गुहाके मध्यमें कुम्भीपाककी समान दग्ध
होकर मरगये । इस प्रकार शत्रुओंको निःशेष कर फिरभी मेघवर्ण उस न्यग्रोध
वृक्षरूपी दुर्गमे प्राप्त हुआ । तब सिंहासनपर स्थित हो सभाके मध्यमें प्रसन्न मन
हुआ स्थिरजीवीसे पूछने लगा-“तात ! किसप्रकार तुमने शत्रुओंके मध्यमें जाकर
इतना समय बिताया ? सो इसमें हमको कौतुक है । सो कहिये कारण-
वरमग्नौ प्रदीप्ते तु प्रपातः पुण्यकर्मणाम् ।
न चारिजनसंसर्गो मुहूर्त्तमपि सेवितः ॥ २३३ ॥”
पुण्यकर्मी पुरुष एक साथ अग्निमें गिरजाना अच्छा जानते हैं परन्तु शत्रुसंग
एक मुहूर्त मात्रभी अच्छा नहीं ॥ २३३ ”
तत आकर्ण्य स्थिरजीवी आह,-“भद्र ! आगामिफलवा-
ञ्छया कष्टमपि सेवको न जानाति । उक्तञ्च यतः-
यह सुन स्थिरजीवी बोला-“भद्र ! आनेवाले फलकी आकाक्षासे सेवक कष्टको
कुछ नहीं गिनता । कहा है-कारण कि,
उपनतभयैर्यो यो मार्गो हितार्थकरो भवे-
त्तस निपुणया बुद्ध्या सेव्यो महान्कृपणोऽपि वा ।
करिकरनिभौ ज्याघातांकौ महार्थविशारदौ
रचितवलयैः स्त्रीशृद्वद्धौ करौ हि किरीटिना ॥ २३४ ॥
भयके प्राप्त होनेमें जो जो मार्ग हितकारी होवे, चतुराई बुद्धिसे वह वह
मार्ग उत्कृष्ट वा अधमहो सेवन करना चाहिये, जिस कारणसे कि अर्जुनने
हाथीकी सूडकी समान ज्याघातके चिन्हवाली विपुल अर्थके साधनमें विख्यात
दोनों भुजा स्त्रीकी समान कपटनिर्मित कंकण पहरनेवाली कीर्थी (अज्ञात वास
विराटके यहा रहनेके समयकी कथा है हरिणीवृत्त है ) ॥ २३४ ॥
शक्तेनापि सदा नरेन्द्रविदुषा कालान्तरापेक्षिणा
वस्तव्यं खलु वाक्यवज्रविषमे क्षुद्रेऽपि पापे जने ।