पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( १६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
नदीके किनारे उत्पन्न हुए उस तृणका भी जन्म सफल है, जो जलमें
डूबनेसे घबड़ाये हुए मनुष्योका अवलम्बन होता है ॥ २९ ॥
तथाच-
और देखो-
स्तिमितोन्नतसञ्चारा जनसन्तापहारिणः ।
जायन्ते विरला लोके जलदा इव सज्जनाः ॥ ३० ॥
ऊँचे नीचे संचरण करनेवाले जनके सन्ताप हरनेवाले मेघकी समान कोई
सज्जन विरलेही होते हैं ॥ ३० ॥
निरतिशयं गरिमाणं तेन जनन्याः स्मरन्ति विद्वांसः ।
यत्कमपि वहति गर्भं महतामपि यो गुरुर्भवति ॥ ३१ ॥
विद्वान् लोग उसके जन्मसे माताकी अधिक भारत्ता स्मरण करते हैं कि, उसने
इसको किस प्रकार धारण किया है, जो बडे पुरुषोंको भी भारी होता है ॥ ३१॥
अप्रकटीकृतशक्तिः शक्तोऽपि जनस्तिरस्क्रियां लभते ।
निवसन्नन्तर्दारुणि लंघ्यो वह्निर्न तु ज्वलितः ॥ ३२ ॥”
शक्ति न प्रगट करनेवाला समर्थभी जनोंसे तिरस्कृत होजाता है, काठके भीतर
रहनेवाली अग्निको सब कोई उलंघन करता है, न जलती हुई को ॥ ३२ ॥
करटक आह-
करटक बोला-
“आवां तावदप्रधानौ तत्किमावयोरनेन व्यापारेण । उक्तञ्च-
“हम तो यहां अप्रधानहैं, सो हमे इस वार्तासे क्या प्रयोजनहै । कहा भी है-
अपृष्टोऽत्राप्रधानो यो ब्रूते राज्ञः पुरः कुधीः ।
न केवलमसंमानं लभते च विडम्बनम् ॥ ३३ ॥
बिना पूछे जो अप्रधान कुबुद्धि इस संसारमें राजाके आगे बोलता है, वह
केवल असम्मानकोही प्राप्त नहीं होता किन्तु अवमानताकोभी प्राप्त होता है ॥३३॥
तथाच-
और भी-
वचस्तत्र प्रयोक्तव्यं यत्रोक्तं लभते फलम् ।
स्थायीभवति चात्यन्तं रागः शुक्लपटे यथा ॥ ३४ ॥”
भाषाटीकासमेतम् । ( १७ )'
वचन वहां कहना चाहिये, जहां कुछ कहनेका फल हो जैसे कि, सफेद
वस्त्रपर रंग अत्यन्त स्थायी होता है ॥ ३४ ॥"
दमनक आह-"मा मा एवं वद ।
दमनक बोला-"ऐसे मत कहो ।
अप्रधानः प्रधानः स्यात्सेवते यदि पार्थिवम् ।
प्रधानोऽप्यप्रधानः स्याद्यदि सेवाविवर्जितः ॥ ३५ ॥
यदि राजाको सेवनकरे तो अप्रधानभी प्रधान होजाता है और सेवासे
वर्जित हो तो प्रधानभी अप्रधान होजाता है ॥ ३५ ॥
यत उक्तञ्च-
कारण कहाभी है-
आसन्नमेव नृपतिर्भजते मनुष्यं
विद्याविहीनमकुलीनमसंस्कृतं वा ।
प्रायेण भूमिपतयः प्रमदा लताश्च
यत्पार्श्वतो भवति तत्परिवेष्टयन्ति ॥ ३६ ॥
राजा निकटकेही मनुष्यको भजतेहैं, चाहे वह विद्याहीन, अकुलीन, सस्कार-
हीन हो, प्रायः राजा,स्त्री और वेल जो निकट होताहै उसीको वेष्टन करते हैं ३६
तथाच-
और भी-
कोपप्रसादवस्तूनि ये विचिन्वन्ति सेवकाः ।
आरोहन्ति शनैः पश्चाद्दुन्वन्तमपि पार्थिवम् ॥ ३७ ॥
जो सेवक क्रोध और प्रसन्नताके विषयको खोजते रहतेहैं, वे-क्रमसे विरक्त
राजाकोभी प्राप्त होते हैं ॥ ३७ ॥
विद्यावतां महेच्छानां शिल्पविक्रमशालिनाम् ।
सेवावृत्तिविदाञ्चैव नाश्रयः पार्थिवं विना ॥ ३८ ॥
विद्यायुक्त, कारीगर और विक्रमसे सम्पन्न, सेवावृत्तिके जाननेवाले महाश-
योंको राजाके विना अन्य आश्रय नहीं है ॥ ३८ ॥
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