पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( १०४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १०४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तस्य अग्रे स्थितः । अथ तं प्रज्वलितात्मा भासुरको
भर्त्सयन्नाह,-"रे शशकाधम ! एकतस्तावत् त्वं लघुः
प्राप्तोऽपरतः वेलातिक्रमेण, तदस्मादपराधात् त्वां नि-
पात्य प्रातः सकलान्यपि मृगकुलानि उच्छेदयिष्यामि" ।
अथ शशकः सविनयं प्रोवाच,-"स्वामिन् ! नापराधो
मम,न च सत्त्वानाम्, तत् श्रूयतां कारणम्" । सिंह आह-
“सत्वरं निवेदय यावत् मम दंष्ट्रान्तर्गतो न भवान् भवि-
ष्यति"इति । शशक आह-"स्वामिन्! समस्तमृगैरद्य जाति-
क्रमेण मम लघुतरस्य प्रस्तावं विज्ञाय ततोऽहं पञ्चशशकैः
समं प्रेषितः । ततश्च अहमागच्छन्नन्तराले महता केनचि-
दपरेण सिंहेन विवरान्निर्गत्य अभिहितः-"रे ! क प्रस्थिता
यूयम् ? अभीष्टदेवतां स्मरत" । ततो मयाभिहितम्-“वयं
स्वामिनो भासुरकसिंहस्य सकाशे आहारार्थं समयधर्मेण
गच्छामः" । ततः तेन अभिहितम्-"यद्येवं तर्हि मदीयमेत-
द्वनं मया सह समयधर्मेण समस्तैरपि श्वापदैर्वर्तितव्यम् ।
चौररूपी स भासुरकः । अथ यदि सोऽत्र राजा ततो विश्वा-
सस्थाने चतुरः शशकानत्र धृत्वा तमाह्वय द्रुततरमागच्छ,
येन यः कश्चिदावयोर्मध्यात् पराक्रमेण राजा भविष्यति स
सर्वानितान् भक्षयिष्यति" इति । ततोऽहं तेनादिष्टः स्वा-
मिसकाशमभ्यागतः, एतत् वेलाव्यतिक्रमकारणम् । तदत्र
स्वामी प्रमाणम्" । तच्छ्रुत्वा भासुरक आह-"भद्र ! यदि
एवं तत् सत्वरं दर्शय मे तं चौरसिंहम्, येन अहं मृगकोपं
तस्य उपरि क्षिप्त्वा स्वस्थो भवामि । उक्तञ्च-
तब उनके यह वचन सुनकर भासुरक बोला--"अहो तुमने सत्य कहा,
परन्तु यदि मेरे बैठेहुए नित्य एक जीव न आवेगा तो अवश्यही सबको खा
जाऊंगा' । तब वे ऐसाही करेंगे यह प्रतिज्ञा करके निरुद्वेग होकर उस वनमे
निर्भय फिरने लगे । प्रति दिन एक क्रमसे उनके पास जाता वृद्ध या वैराग्ययुक्त
वा शोकग्रस्त वा पुत्र कलत्रके नाशसे भीतहुआ उनके मध्यसे उनके भोजनके
भाषाटीकासमेतम् । ( १०५ )
निमित्त मध्यान्ह समय प्राप्त होता था । तब कभी जातिके क्रमसे खरगोशकी
वारी आई वह सब मृगोंसे प्रेरित हुआ इच्छा न करनेपरभी शनै २ जाता उसके
मारनेके उपायको चिन्ता करता हुआ समयको बिताकर व्याकुल हृदयसे जबतक
जाताहै, तबतक मार्गमें जाते हुए उसने कूपदेखा । जब कूपपर गया तब उसमे
अपनी परछाही देखकर उसने मनमे विचार किया कि, “यह एक उत्तम उपाय
है मैं भासुरकको क्रोधित कराकर इस कूपमें गिराऊंगा” तब यह कुछ दिनशेषरहे
भासुरकके समीप प्राप्तहुआ। सिहभी समयके बीतनेसे भूखसे शुष्ककंठ क्रोधमें भरा
जीभको चाटता हुआ विचारता था, “अहो प्रभात ही भोजनके निमित्त यह वन
निर्जीव कर दूंगा” इसप्रकार उसके विचारते वह खरगोश शनै २ जाय प्रणा-
मकर उसके आगे स्थित भया । तब प्रज्वलित आत्मा भासुरक उसे घुड़कता-
हुआ बोला-“रे नीच खरगोश ! एक तो तू लघु दूसरे समयको बिताकर आया
हे इस अपराधसे तुझको मारकर सबेरे सभी मृगोका नाश करूंगा” । तब
खरगोश विनयपूर्वक बोला-“स्वामिन् ! इसमें न मेरा अपराध न अन्यजीवोंका है
सो कारण सुनिये । सिह बोला,-“शीघ्र निवेदन कर जबतक तू मेरी डाढोंके
अन्तर्गत न होता है”। खरगोश बोला,-“स्वामिन् ! संपूर्ण मृगोंने आज जाति-
क्रमसे मेरा अति लघु कलेवर जानकर पाच खरगोशोंसहित मुझे आपके पास
भेजा । सो मैं आता हुआ मार्गमें एक अन्य सिंहने विवरसे निकल कर कहा,-
“रे तुम कहा जातेहो ? अपने इष्टदेवताका स्मरण करो” । तब मैने कहा-“हम
स्वामी भासुरकके पास उसके भोजनको प्रतिज्ञार्थमैसे जाते हैं” उसने कहा-“जो
ऐसा है तो यह वन मेरा है, मेरे साथ प्रतिज्ञासे सब जीवोको वर्तना चाहिये,
चोर है वह भासुरक । और जो वह यहाका राजा है तो विश्वासके निमित्त चार
खरगोशोंको यहा रखकर उसे बुलाकर बहुतशीघ्र आधा इससे हम दोनोंके बीचमें
जो कोई पराक्रमसे राजा होगा वही इन सबको खायगा” सो मैं उसकी
आज्ञासे स्वामीके पास आया हू यह समयके उल्लंघनका कारण है सो इसमे
स्वामीही प्रमाण हैं”। यह सुनकर भासुरक बोला,-“भद्र ! जो ऐसा है तो
शीघ्र मुझे उस चोर सिंहको दिखाओ जिससे मैं इन मृगोके कोपको उसके ऊपर
छोडकर स्वस्थ होऊ । कहा है-