पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
(२२) पञ्चतन्त्रम् ।
(२२) पञ्चतन्त्रम् ।
सम्मतोऽहं विभोर्नित्यमिति मत्वा व्यतिक्रमेत् ।
कृच्छ्रेष्वपि न मर्यादां स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५९ ॥
मैं प्रभुका नित्य सम्मत हूं, ऐसे विचार कर जो कठिनतामें भी मर्यादाका
आक्रमण नहीं करता है वह राजाका प्रिय होता है ॥ ५९ ॥
द्वेषिद्वेषपरो नित्यमिष्टानामिष्टकर्मकृत् ।
यो नरो नरनाथस्य स भवेद्राजवल्लभः ॥ ६० ॥
जो राजाके द्वेषियोंसे नित्य द्रोह करता है, प्रियजनोंका नित्य प्रिय करता है,
वह राजाका प्रिय होता ॥ ६० ॥
प्रोक्तः प्रत्युत्तरं नाह विरुद्धं प्रभुणा च यः ।
न समीपे हसत्युच्चैः स भवेद्राजवल्लभः ॥ ६१ ॥
जो प्रभुके कहनेपर विरुद्ध उत्तर नहीं देता है समीपमें उच्च स्वरसे नहीं हँस-
ताहै, वह राजप्रिय होता है ॥ ६१ ॥
यो रणं शरणं तद्वन्मन्यते भयवर्जितः ।
प्रवासं स्वपुरावासं स भवेद्राजवल्लभः ॥ ६२ ॥
जो भयरहित हो, युद्धको गृहवत् मानता है, परदेशको अपने नगरकी समान
मानता है, वह राजवल्लभ होता है ॥ ६२ ॥
न कुर्यान्नरनाथस्य योषिद्भिः सह सङ्गतिम् ।
न निन्दां न विवादं च स भवेद्राजवल्लभः ॥ ६३ ॥”
राजाकी स्त्रियोंके साथ संगती न करे, तथा उनकी निन्दा और विवाद न
करै, वह राजाका प्रिय होताहै ॥ ६३ ॥”
करटक आह-“अथ भवान् तत्र गत्वा किं तावत् प्रथमं
वक्ष्यति तत् तावदुच्यताम् ?”
करटक बोला-“तो तुम प्रथम वहां जाकर क्या कहोगे, वह तो कहो ?”
दमनक आह-
दमनक बोला-
“उत्तरादुत्तरं वाक्यं वदतां सम्प्रजायते ।
सुवृष्टिगुणसम्पन्नाद्बीजाद्बीजमिवापरम् ॥ ६४ ॥
“कहनेसे वाक्य उत्तरोत्तर प्रवृत्त हो जाता है, जैसे सुवृष्टिके गुणसे बीजसे
बीज होताहै ॥ ६४ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( २३ )
अपायसन्दर्शनजां विपत्तिमुपायसन्दर्शनजाञ्च सिद्धिम् ।
मेधाविनो नीतिगुणप्रयुक्तां पुरःस्फुरन्तीमिव वर्णयन्ति ६५
'अपायसे प्राप्त होनेवाली विपत्ति, उपायके करनेसे सिद्धि बुद्धिमान् नीतिके
गुणसे प्रयुक्त की हुई आगे स्फुरायमान होते हुएकी समान वर्णन करते हैं ॥६५॥
एकेषां वाचि शुकवदन्येषां हृदि मूकवत् ।
हृदि वाचि तथान्येषां वल्गु वलगन्ति सूक्तयः ॥ ६६ ॥
किन्हींके वचन बोलनेमे तोतेकी समान मधुर और मनमे कपट, कोई 'हृदयमें
मूकवत् अर्थात् वाक्य तो सुननेमें कठोर और हृदय कपटशून्य, दूसरे पुरुषोंके
सुवचन हृदय और वचन दोनोंसेही सारताको प्रगट करते हैं ॥ ६६ ॥
न च अहमप्राप्तकालं वक्ष्ये । आकर्णितं मया नीतिसारं
पितुः पूर्वमुत्सङ्गं हि निषेवता ।
मैं असमयके वचनोंको न कहूंगा, पिताकी गोदीको सेवन करते हुए पहिले
मैने सुना है ।
अप्राप्तकालं वचनं बृहस्पतिरपि ब्रुवन् ।
लभते बह्ववज्ञानमपमानञ्च पुष्कलम् ॥ ६७ ॥”
अप्राप्त कालके वचनोंको बृहस्पतिभी कहें तो बहुत अवज्ञा और अपमानको
प्राप्त होते हैं ॥ ६७ ॥ ”
करटक आह-
करटक बोला-
“ दुराराध्या हि राजानः पर्वता इव सर्वदा ।
व्यालाकीर्णाः सुविषमाः कठिना दुष्टसेविताः ॥ ६८ ॥
“पर्वतकी समान राजा सदा दुराराध्य हैं, जैसे कि राजा और पर्वत सर्प
( हिंस्रजन ) श्वापद जीवोंसे युक्त दारुण और नीचे ऊंचे मागोंसे विषम होते हैं,
इसी प्रकार राजा दुष्ट सेवित होनेसे कठिन होते हैं ॥ ६८ ॥
तथाच-
और देखो-
भोगिनः कञ्चुकाविष्टाः कुटिलाः क्रूरचेष्टिताः ।
सुदुष्टा मन्त्रसाध्याश्च राजानः पन्नगा इव ॥ ६९ ॥