पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( १२२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १२२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
जानकर लज्जासे नीचा मुखकर एकक्षण स्थित हो परस्पर बोले,-“भो ! इस
क्षुद्र शृगालने हमको ठगलिया, सो इसे मार डालो,” वह भी यह वचन सुन
भागनेकी इच्छा करता हुआ उस स्थानमें सिंहादिसे टुकडे किया हुआ मरगया।
इससे मैं कहता हूं “जिसने आभ्यन्तर त्याग दिये है इत्यादि”
तदाकर्ण्य पिंगलक आह-“भो दमनक ! कः प्रत्ययोऽत्र
विषये यत् स ममोपरि दुष्टबुद्धिः”। स आह,-“यदय ममाग्रे
तेन निश्चयः कृतो यत्प्रभाते पिंगलकं वधिष्यामि तदत्रैव
प्रत्ययः। प्रभातेऽवसरवेलायाम् आरक्तमुखनयनः स्फुरिताधरो
दिशोऽवलोकयन् अनुचितस्थानोपविष्टस्त्वां क्रूरदृष्ट्या वि-
लोकयिष्यति । एवं ज्ञात्वा यदुचितं तत्कर्त्तव्यम्” इति ।
कथयित्वा सञ्जीवकसकाशं गतः । तं प्रणम्य उपविष्टः,
सञ्जीवकोऽपि सोद्वेगाकारं मन्दगत्या समायान्तं तमुद्वीक्ष्य
सादरतरमुवाच,-“भो मित्र ! स्वागतम्, चिराद्दृष्टोऽसि,
अपि शिवं भवतः ? तत्कथय येनादेयमपि तुभ्यं गृहागताय
प्रयच्छामि । उक्तञ्च-
यह सुनकर पिंगलक बोला,-“भो दमनक ! इसमें क्या प्रमाण है कि, वह
मेरे ऊपर दुष्टबुद्धि है” वह बोला-“कि आजही मेरे आगे उसने निश्चय
किया है कि, प्रातःकाल पिंगलकको मारूंगा, यही इसमें प्रमाण है। प्रातःकाल
आपके पास आनेके समयमें लाल मुख नेत्र किये स्फुरायमान अधर इधर उधर
देखता अनुचित स्थानमे बैठा तुमको क्रूर दृष्टिसे देखेगा । ऐसा जानकर
जो उचित हो सो करो” यह कह संजीवकके निकट गया, उसको प्रणाम कर
बैठा । संजीवकभी उद्वेगके आकार मन्दगतिसे आते हुए उसको देख आदरसे
बोला,-“भो मित्र ! तुमको चिरकालमें देखा कुशल तो हो ? सो कहो जिससे
अदेय वस्तुभी तुम घरमें आये हुएके निमित्त प्रदान करूं। कहाहै-
ते धन्यास्ते विवेकज्ञास्ते सभ्या इह भूतले ।
आगच्छन्ति गृहे येषां कार्यार्थं सुहृदो जनाः ॥ २८५ ॥”
वे धन्य, वेही विवेकज्ञ, सभ्य इस भूतलमें है जिनके यहां कार्यार्थी सुहृद
जन नित्य आते हैं ॥ २८५ ॥”
भाषाटीकासमेतम् । ( १२३ )
दमनक आह-“भोः ! कथं शिवं सेवकजनस्य ।
दमनक बोला-“भो सेवक जनोंको कुशल कहां ।
सम्पत्तयः परायत्ताः सदा चित्तमनिर्वृतम् ।
स्वजीवितेऽप्यविश्वासस्तेषां ये राजसेवकाः ॥ २८६ ॥
सम्पत्ति पराये आधीन, चित्त अशान्त, अपने जीनेमेंभी उनको अविश्वास रहता
है जो राजसेवक हैं ॥ २८६ ॥
तथाच-
औरभी-
सेवया धनमिच्छाद्भिः सेवकैः पश्य यत्कृतम् ।
स्वातंत्र्यं यच्छरीरस्य मूढैस्तदपि हारितम् ॥ २८७ ॥
सेवासे धनकी इच्छा करनेवाले सेवकों ने जो किया है सो देखो कि शरीरकी
जो स्वतंत्रता थी सोभी मूर्खोंने नष्ट करदी ॥ २८७ ॥
तावज्जन्मातिदुःखाय ततो दुर्गन्तता सदा ।
तत्रापि सेवया वृत्तिरहो दुःखपरम्परा ॥ २८८ ॥
प्रथम तो जन्मही दु खके निमित्त फिर दरिद्रता फिर उसमें सेवावृत्ति अहो
दुःखकी परम्परा है ॥ २८८ ॥
जीवन्तोऽपि मृताः पञ्च श्रूयन्ते किल भारते ।
दरिद्रो व्याधितो मूर्खः प्रवासी नित्यसेवकः ॥ ४८९ ॥
महाभारतमें पाच जीते हुए मरे सुने गये है दरिद्र, रोगी, मूर्ख, प्रवासी और
नित्य सेवक ॥ २८९ ॥
नाश्नाति स्वेच्छयौत्सुक्याद्विनिद्रो न प्रबुध्यते ।
न निःशङ्कं वचो ब्रूते सेवकोऽप्यत्र जीवति ॥ २९० ॥
उत्कंठित रहनेसे स्वेच्छासे नहीं खाता (प्रभुके भयसे) विनिद्र होकर भी
नहीं जागता निश्शंक वचन नहीं बोलता क्या सेवकभी जीताहै ॥ २९० ॥
सेवा श्ववृत्तिराख्याता यैस्तैर्मिथ्या प्रजल्पितम् ।
स्वच्छन्दं चरति श्वात्र सेवकः परशासनात् ॥ २९१ ॥
जिन्होंने सेवा श्ववृत्ति (कुत्तेकी वृत्ति) कहीहै उन्होने मिथ्याजल्पना की है
कुत्ता स्वच्छन्द फिरता है और सेवकका फिरना आज्ञासे है ॥ २९१ ॥