पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( १७८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १७८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
जो राजा चित्रविचित्र कथाके आस्वादवाले धनुष न चढानेवाले भृत्योंसे
रमण करते हैं ( राजकाज नहीं करते हैं ) शत्रु उनकी लक्ष्मीसे रमण
करते हैं ॥ ४१६ ॥
तत् किं मूर्खोपदेशेन, केवलं दोषो न गुणः । उक्तञ्च-
सो मूर्खके उपदेशसे क्या केवल दोषही है गुण नहीं । कहाहै-
नानाम्यं नमते दारु नाश्मनि स्यात्क्षुरक्रिया ।
सूचीमुख विजानीहि नाशिष्यायोपदिश्यते ॥ ४१७ ॥
नहीं झुकने योग्य काष्ठ टेढा नहीं होता, पत्थरका क्षौरकर्म नहीं होता,
अशिष्यको उपदेश नदे इसमें सूचीमुखका दृष्टान्त है ॥ ४१७ ॥
दमनक आह-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत्-
दमनक बोला-“यह कैसे ? ” वह बोला-
कथा १७.
अस्ति कस्मिंश्चित् पर्वतैकदेशे वानरयूथम् । तच्च कदा-
चित् हेमन्तसमये अतिकठोरवातसंस्पर्शवेपमानकलेवरं
तुषारवर्षोद्धतप्रवर्षघनधारांनिपातसमाहतं न कथञ्चित् शा-
न्तिमगमत् । अथ केचित् वानरा वह्निकणसदृशानि
गुञ्जाफलानि अवचित्य वह्निवाञ्छया फूत्कुर्वन्तः समन्तात्
तस्थुः । अथ सूचीमुखो नाम पक्षी तेषां तं वृथायास
मवलोक्य प्रोवाच-‘‘ भोः ! सर्वे मूर्खाः यूयं, नैते
वह्निकणाः, गुञ्जाफलानि एतानि, तत् किं वृथा श्रमेण, न
एतस्मात् शीतरक्षा भविष्यति । तत् अन्विष्यतां कश्चित्
निर्वातो वनप्रदेशो गुहा वा गिरिकन्दरं वा । अद्यापि
साटोपा मेघा दृश्यन्ते” । अथ तेषामेकतमो वृद्धवानरः तमु-
वाच-‘‘भो मूर्ख ! किं तव अनेन व्यापारेण, तद्गम्यताम् ।
उक्तञ्च-
किसी पर्वतपर वानरोंका यूथ है वह एक समय हेमन्तसमयमें अति कठोर
पवनके लगनेसे कंपितशरीर शीत और वर्षासे उद्धत घनवर्षाके धारानिपातसे
भाषाटीकासमेतम् । ( १७९ )
समाहत हुआ किसी प्रकार शान्त न हुआ । तब कोई बानर अग्निकणकी समान
चोंटलियोंको इकट्ठाकर अग्निकी इच्छासे फूक मारते हुए चारों ओरसे स्थित
हुए । तब सूचीमुख नाम पक्षी उनके उस वृथा परिश्रमको देखकर बोला-
“भोः ! तुम सब मूर्ख हो । यह अग्निकण नहीं हैं, यह चोंटलीहैं क्यों वृथा
परिश्रम करतेहो । इससे शीत रक्षा न होगी, सो ढूढ़ो कोई पवनरहित वन-
स्थान गुहा वा पर्वतकदरं अबभी मडल बाधे हुए मेघ दीखते हैं” । तब उन-
मेसे एक बूढा बानर उससे बोला-“भो मूर्ख ! तुझे इससे क्या प्रयोजन है
चलाजा । कहाहै-
मुहुर्विघ्नितकर्माणं द्यूतकारं पराजितम् ।
नालापयेद्विवेको यदिच्छेत्सिद्धिमात्मनः ॥ ४१८ ॥
बारबार कर्ममें विघ्न पानेवाला, जुआ खेलनेवाला, पराजित इनसे यदि अपने
मगलकी इच्छा हो तो वार्ता न करे ॥ ४१८ ॥
तथाच-
तैसेही-
आखेटकं वृथा क्लेशं मूर्ख व्यसनसंस्थितम् ।
आलापयति यो मूढः स गच्छति पराभवम् ॥ ४१९ ॥”
शिकारी, वृथा क्लेशकारी, मूर्ख, दुर्व्यसनमें स्थितसे जो वार्ता करता है वह
पराभवको प्राप्त होता है ॥ ४१९ ॥”
सोऽपि तमनादृत्य भूयोऽपि वानराननवरतमाह-
“भोः ! किं वृथा क्लेशेन” अथ यावद्सौ न कथंचित्
प्रलपन्विरमति तावदेकेन वानरेण व्यर्थश्रमत्वात्
कुपितेन पक्षाभ्यां गृहीत्वा शिलायामास्फालित उपर-
तश्चातोऽहं ब्रवीमि, “नानाम्यं नमते दारु” इत्यादि।
वह भी उसको अनादर कर बारबार बानरोसे वही वचन कहने लगा-
“भो ! वृथाक्लेशसे क्या है”। सो जब यह किसी प्रकार प्रलापसे न शान्त
हुआ तब एक वृथा श्रमसे क्रुद्ध हुए बानरने उसके पख पकड कर शिलापर पट-
ककर मार दिया, इससे मैं कहता हूँ “अनमित काष्ठ नहीं नमता इत्यादि” ।