पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( ५१४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ५१४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
किञ्चित् शस्त्रं पश्यति तावत् कोपव्याकुलमनाः पूर्ववत् शयनं
गत्वा कुब्जं चरणाभ्यां संगृह्य सामर्थ्यात् स्वमस्तकोपरि
भ्रामयित्वा त्रिस्तनीं हृदये व्यताडयत् । अथ कुब्जप्रहारेण
तस्याः तृतीयः स्तन उरसि प्रविष्टः । तथा बलात् मस्तको-
परिभ्रामणेन कुब्जः प्राञ्जलतां गतः । अतोऽहं ब्रवीमि-
तब और दिन त्रिस्तनीने मन्थरकसे कहा,-"भो सुभग ! यदि यह अन्ध
किसी प्रकारसे मारा जाय तो हम दोनोंका समय सुखसे बीते, सो कहीं विषकी
खोज करो जो इसे देकर मैं सुखी हूं"। तब एक दिन कुबड़ेने घूमते हुए काला
मराहुआ साप पाया, उसको ग्रहण कर प्रसन्न हुआ घरमें आकर उससे बोला-
"भो सुभगे ! यह काला सांप लम्बा है, सो इसे टुकड़े कर अनेक सोंठभादि
मसालोंसे संस्कृत कर इस विकलनेत्रके निमित्त मच्छीका मांस बताकर प्रदान
करूं । इससे झटही यह नष्ट हो जायगा । कारण कि इसको मत्स्यका मांस
सदा प्रिय है"। ऐसा कह मन्थरक बाहर गया । वह भी दीप्त अग्निमें काले
सर्पके टुकड़े कर मट्ठामें डाल घरके व्यापारमें व्याकुल हुई उस विकलाक्षसे
नम्रतापूर्वक बोली,-"आर्य्यपुत्र ! यह तुम्हारा अभीष्ट मत्स्यमांस प्राप्त किया है।
जिसको तुम सदाही पूछा करते हो वे मत्स्य अग्निमें पकानेको स्थित हैं सो
जबतक मैं घरका कार्य करूं, तबतक तुम करछुली लेकर एक क्षणमात्रको उन्हें
चलाओ"। वह भी यह वचन सुन प्रसन्न मनसे जिह्वासे होठ चाटता हुआ
शीघ्र उठ करछुलीसे चलाने लगा । तब उसको मत्स्य मथतेमें विष गर्भसे उठा
धुवां नेत्रोंके नील पटलको लगता हुआ । तब यह अन्धा उसे बहुत उपकारक
मान विशेषकर नेत्रोंसे ( १ ) बाष्प ग्रहण करता भया । तब दृष्टिके प्राप्त होनेसे
जब देखने लगा, तब मट्ठेके बीचमें केवल काले सांपके टुकड़ेही देखे । तब
विचारने लगा,-"अहो यह क्या है ? इसने तो मुझे मत्स्यका मांस बतलाया
था और यह तो काले सांपके खण्ड हैं । सो इस त्रिस्तनीकी चेष्टाको भली
प्रकारसे जानूं ? क्या यह मेरे वधका उपाय है या कुब्जकके वा किसी अन्यका?"
ऐसा विचार कर अपने आकारको छिपाये हुए अन्धकी समान कर्म करने लगा
जैसे कि पहले । इसी समय कुब्जक आकर निश्शंकतासे आलिंगन चुम्बना-
दिसे त्रिस्तनीको सेवने लगा । वह भी अन्धा उसको देखकर जब कोई शस्त्र
१ भाफ ।
भाषाटीकासमेतम्। (५१५)
न पाता हुआ तबतक पूर्ववत् शयन स्थानमें जाकर कुबडेकी टांगे पकड साम-
र्ध्यसे अपने मस्तकपर घुमाकर त्रिस्तनीके हृदयमें प्रहार करता हुआ । तब
कुब्जके प्रहारसे उसका तीसरा स्तन हृदयमें प्रवेश कर गया और बलसे मस्तकके
ऊपर घुमानेसे कुबडा सीधा होगया । इससे मैं कहता हू-
अन्धकः कुब्जकश्चैव राजकन्या च त्रिस्तनी ।
त्रयोऽप्यन्यायतः सिद्धाः सन्मुखे कर्मणि स्थिते ॥१०१॥”
अन्धा, कुबडा और तीन स्तनवाली राजकन्या यह तीनों सम्मुख कर्मकी
स्थितिमें अन्यायसे सिद्ध हुए ॥ १०० ॥”
सुवर्णसिद्धिः आह,–“भोः सत्यमेतत्, दैवानुकूलतया
सर्वं कल्याणं सम्पद्यते । तथापि पुरुषेण सतां वचनं कार्य्यम् ।
न पुनः एवमेव वर्त्तते स त्वमिव विनश्यति ।
सुवर्णसिद्धि बोला,–“भो ! यह सत्य है, देवानुकूलतासे सब कार्यमें मंगल
होगा तो भी पुरुषको सत्पुरुषोके वचन करने चाहिये, न कि ऐसाही है यह
कहनेसे वह पुरुष तुम्हारी समान नष्ट होगा ।
तथाच-
और देखो-
एकोदराः पृथग्ग्रीवा अन्योऽन्यफलभक्षिणः ।
असंहता विनश्यन्ति भारण्डा इव पक्षिणः ॥ १०१ ॥”
एक उदर, पृथक् ग्रीवावाले परस्पर फलके भक्षण कर्ता मेल न करनेसे भारण्ड
पक्षीकी समान नष्ट होते हैं ॥ १०१ ॥”
चक्रधर आह,–“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत् ।
चक्र धर बोला,–“यह कैसे ?” वह बोला-
कथा १४.
कस्मिंश्चित् सरोवरे भारण्डनामा पक्षी एकोदरः पृथग्-
ग्रीवः प्रतिवसति स्म । तेन च समुद्रतीरे परिश्रमता किञ्चित्
फलम् अमृतकल्पं तरङ्गाक्षिप्तं सम्प्राप्तम् । सोऽपि भक्षयन्
इदमाह,–“अहो! बहूनि मया अमृतप्रायाणि समुद्रकल्लोला-
हृतानि फलानि भक्षितानि । परमपूर्वोऽस्य आस्वादः, तत