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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( ३४६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ३४६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
स निनिन्द किलात्मानं न तु तं लुब्धकं पुनः ।
उवाच तर्पयिष्ये त्वां मुहूर्त्तं प्रतिपालय ॥ १७१ ॥
वह अपनी ही निन्दा करके न कि उस लुब्धककी इस प्रकार वह (कबूतर)
लुब्धकसे बोला एक मुहूर्ततक तू ठहर ॥ १७१ ॥
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
तमग्निं सम्परिक्रम्य प्रविवेश स्ववेश्मवत् ॥ १७२ ॥
ऐसा कह वह धर्मात्मा प्रसन्न मनसे उस अग्निकी परिक्रमाकर अपने घरकी
समान उसमें प्रवेश करगया ॥ १७२ ॥
ततस्तं लुब्धको दृष्ट्वा कृपया पीडितो भृशम् ।
कपोतमग्नौ पतितं वाक्यमेतदभाषत ॥ १७३ ॥
तब यह लुब्धक उसको देख कृपासे अत्यन्त पीडितहो अग्निमें गिरते कबूत-
रसे यह वचन बोला ॥ १७३ ॥
यः करोति नरः पापं न तस्यात्मा ध्रुवं प्रियः ।
आत्मना हि कृतं पापमात्मनैव हि भुज्यते १७४ ॥
जो मनुष्य पाप करता है अवश्यही उसको आत्मा प्रिय नहीं है आत्माके लिये
पापको आत्माही भोगता है ॥ १७४ ॥
सोऽहं पापमतिश्चैव पापकर्मरतः सदा ।
पतिष्यामि महाघोरे नरके नात्र संशयः ॥ १७५ ॥
वह मैं पापमति पापकर्ममें सदा रत महाघोर नरकमें पडूंगा इसमें कुछ सन्देह
नहीं ॥ १७५ ॥
नूनं मम नृशंसस्य प्रत्यादर्शः सुदर्शितः ।
प्रयच्छता स्वमांसानि कपोतेन महात्मना ॥ १७६ ॥
अवश्यही अपना मांस देते हुए इस महात्मा कपोतने मुझ निर्दयीको शिक्षा
दी है ॥ १७६ ॥
अद्य प्रभृति देहं स्वं सर्वभोगविवर्जितम् ।
तोयं स्वल्पं यथा ग्रीष्मे शोषयिष्याम्यहं पुनः ॥ १७७ ॥
आजसे सम्पूर्ण भोगरहित इस देहको गरमीमें थोडे जलकी समान सुखा
डालूंगा ॥ १७७ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (३४७)
शीतवातातपसहः कृशाङ्गो मलिनस्तथा ।
उपवासैर्बहुविधैश्चरिष्ये धर्ममुत्तमम् ॥ १७८ ॥
शीत वात गरमीका सहनेवाला कृश अंग मलीन मैं अनेक उपवास कर धर्म
करूंगा ॥ १७८ ॥
ततो यष्टिं शलाकाञ्च जालकं पञ्जरं तथा ।
बभञ्ज लुब्धकोपीमां कपोतीञ्च मुमोचह ॥ १७९ ॥
तब वह लुब्धक लकडी शलाका जाल पाँजरा तोडकर उस दीन कपोतीको
भी छोड देता हुआ ॥ १७९ ॥
लुब्धकेन ततो मुक्ता दृष्ट्वाग्नौ पतितं पतिम् ।
कपोती विललापार्त्ता शोकसन्तप्तमानसा ॥ १८० ॥
वह लुब्धकसे छोडी हुई कपोती अग्निमें पतिको गिरा देख शोक सन्ताप
मनसे व्याकुल हो विलाप करने लगी ॥ १८० ॥
न कार्यमद्य मे नाथ जीवितेन त्वया विना ।
दीनायाः पतिहीनायाः किं नार्य्या जीविते फलम्॥१८१॥
हे नाथ ! तुम्हारे बिना मुझे जीनेसे अब काम नहीं है दीन पतिहीन स्त्रीके
जीनेसे क्या फल है ? ॥ १८१ ॥
मनोदर्पस्त्वहङ्कारः कुलपूजा च बन्धुषु ।
दासभृत्यजनेष्वाज्ञा वैधव्येन प्रणश्यति ॥ १८२ ॥
मनका हर्ष, अहङ्कार, बन्धुओंमें कुल गौरव, दास तथा भृत्यजनोंमें आज्ञा
यह सब वैधव्य होनेमें नष्ट होजाता है ॥ १८२ ॥
एवं विलप्य बहुशः कृपणं भृशदुःखिता ।
पतिव्रता सुसन्दीप्तं तमेवाग्निं विवेश सा ॥ १८३ ॥
इस प्रकार बहुत विलाप कर दीन दुखी हो वह पतिव्रता उस प्रदीप्त अग्निमें
प्रवेश कर गई ॥ १८३ ॥
ततो दिव्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता ।
भर्त्तारं सा विमानस्थं ददर्श स्वं कपोतिका ॥ १८४ ॥
तब दिव्य वस्त्र पहरे दिव्य गहनोंसे भूषित वह कपोती विमानमें अपने स्वा-
मीको देखने लगी ॥ १८४ ॥