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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( ३६४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ३६४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
अग्निपतनकी इच्छा करता है ?" । वह बोला-“मेरी तो तुम्हारे निमित्त मेघ-
वर्णने यह आपत्ति की । सो मैं उससे वैर निकालनेको उलूकत्वकी इच्छा
करता हूं" । यह सुन राजनीतिमें चतुर रक्ताक्ष बोला,-"भद्र ! तुम कुटिल
और बनावटी वचन कहनेमें चतुर हो । जो तू उलूक योनिमें प्राप्त हुआ भी
अपनी वायस योनिकोही बहुत मानेगा । इसमें यह आख्यान सुना जाता है-
सूर्य्यं भर्तारमुत्सृज्य पर्जन्यं मारुतं गिरिम् ।
स्वजातिं मूषिका प्राप्ता स्वजातिर्दुरतिक्रमा ॥ २०९ ॥”
मूषिका सूर्य मेघ वायु पर्वत भर्ताको छोड़ त्यागनेके अयोग्य अपनी जाति-
को प्राप्त हुई ( जातिक स्वभाव अतिक्रम नहीं हो सकता ) ॥ २०९ ॥ ”
मन्त्रिणः प्रोचुः,-“कथमेतत् ?” रक्ताक्षः कथयति-
मंत्री बोले-"यह कैसी कथा है ?" रक्ताक्ष कहने लगा-
कथा १२.
अस्ति विषमशिलातलस्खलिताम्बुनिर्घोषश्रवणसन्त्रस्त-
मत्स्यपरिवर्तनसञ्जनितश्वेतफेनशबलतरङ्गाया गङ्गायाः तटे
जपनियमतपःस्वाध्यायोपवासयोगक्रियानुष्ठानपरायणैः प-
रिपूतपरिमितजलजिघृक्षुभिः कन्दमूलफलशैवलाभ्यवहार-
कदर्थितशरीरैः वल्कलकृतकौपीनमात्रप्रच्छादनैः तपस्विभिः
आकीर्णमाश्रमपदम् । तत्र याज्ञवल्क्यो नाम कुलपतिः
आसीत् । तस्य जाह्नव्यां स्नात्वा उपस्प्रष्टुमारब्धस्य करतले
श्येनमुखात् परिभ्रष्टा मूषिका पतिता । तां दृष्ट्वा न्यग्रोधपत्रे-
ऽवस्थाप्य, पुनः स्नात्वा उपस्पृश्य च, प्रायश्चित्तादिक्रियां
कृत्वा च, मूषिकां तां स्वतपोबलेन कन्यकां कृत्वा समादाय
स्वाश्रमं आनिनाय । अनपत्याञ्च जायामाह,-“भद्रे ! गृह्य-
तामियं तव दुहितोत्पन्ना प्रयत्नेन संवर्द्धनीया"इतिततः तया
संवर्द्धिता लालिता पालिता च यावत् द्वादशवर्षा संजाता ।
अथ विवाहयोग्यां तां दृष्ट्वा भर्त्तारमेव जाया उवाच,-“भो
भर्त्तः ! किमिदं न अवबुध्यसे यथा अस्याः स्वदुहितुर्विवाह-
समयातिक्रमो भवति” असौ आह- । " साधु उक्तम् ।
उक्तञ्च-

भाषाटीकासमेतम् । ( ३६५ )

ऊंचे नीचे शिलातलमें गिरनेके जलसे शब्दायमान, उसके श्रवणमात्रसे
व्याकुल मत्स्योंके कूदने आदिसे प्रगट श्वेतफेनसे मिश्रित तरंगवाली गंगाके
तटमें जप नियम तप स्वाध्याय व्रत योग क्रिया अनुष्ठानमें परायण विशुद्ध
अल्प जलोंके ग्रहणकी इच्छावाले कन्द मूल फल शैवल (सिवार) के भक्षण
से क्लेशित शरीरवाले वल्कल (वृक्षकी छाल) की बनाई कौपीन मात्रसे शरीर
ढकनेवाले तपस्वियोंसे युक्त आश्रम (तपोवन) स्थान है । वहां याज्ञवल्क्यनाम
कुलपति (तपस्वियोंके स्वामी) रहते थे । उनके गंगाजीमें स्नानकर आचमन
करनेको आरम्भ करते हुए हाथमें श्येनके मुखसे गिरी एक मूषिका आपडी ।
उसे देख वटपत्रमें रखकर फिर स्नान आचमन कर (अपवित्र स्पर्शसे उत्पन्न
हुई) प्रायश्चित्त क्रियाको कर, उस मूषिकाको अपने तपोबलसे कन्या बनाय
अपने आश्रममे लेआये । और सन्तान रहित अपनी स्त्रीसे बोले—"भद्रे ?
ग्रहण करो यह तुम्हारी पुत्री उत्पन्न हुई है यत्नसे इसे बढाओ " । तब उससे
बढाई लालन पालन की हुई वह जब बारह वर्षकी हुई तब विवाहके योग्य
उसको देखकर वह जाया स्वामीसे बोली—"भो स्वामिन् ! आप क्या नहीं
जानते ? कि यह इस कन्याके विवाहका समय बीतता है। यह (याज्ञवल्क्य)
बोले—"तुमने सत्य कहा । काहाभी है—
स्त्रियः पूर्वं सुरैर्भुक्ताः सोमगन्धर्ववह्निभिः ।
भुञ्जते मानुषाः पश्चात्तस्माद्दोषो न विद्यते ॥ २१० ॥
पहले स्त्रियें देवतोंसे भोगी जाती हैं, जो सोम गधर्व और अग्नि नामवाले
देवता हैं, पीछे मनुष्य भोगते हैं इस कारण दोष नहीं है ( १ ) ॥ २१० ॥
सोमस्तासां ददौ शौचं गन्धर्वाः शिक्षितां गिरम् ।
पावकः सर्वमेध्यत्वं तस्मान्निष्कल्मषाः स्त्रियः ॥ २११ ॥
चन्द्रमाने उनको भोगमें पवित्रता, गन्धर्वोंने शिक्षित वाणी और अग्निने
सर्वाङ्गमें उनको पवित्रता दीहै, इस कारण स्त्रियें पापरहित हैं ॥ २११ ॥
असम्प्राप्तरजा गौरी प्राप्ते रजसि रोहिणी ।
अव्यञ्जना भवेत्कन्या कुचहीना च नग्निका ॥ २१२ ॥
१ हमारा बनाया दयानन्द तिमिरभास्कर देखो ।