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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( २३८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( २३८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

होगा इस कारण बिना धुलोंसे यह धुले बदलती है" यह सुनकर उसने वह
तिल त्याग दिये । इससे मै कहताहूं-
"नाकस्माच्छाण्डिली मातः विक्रीणाति तिलैस्तिलान् ।
लुञ्चितानितरैर्यैन हेतुरत्र भविष्यति ॥ ८७ ॥"
"हे मातः अकस्मात् ही यह शाण्डिली धुले तिलोंसे काले तिल नहीं ग्रहण
करती है इसमें कोई कारण होगा ॥ ८७ ॥”
एतदुक्त्वा स भूयोऽपि प्राह, - "अथ ज्ञायते तस्य क्रमण-
मार्गः" । ताम्रचूड आह, - "भगवन् ! ज्ञायते यत एकाकी न
समागच्छति। किन्तु असंख्ययूथपरिवृतः पश्यतो मे परिभ्रमन्
इतस्ततः सर्वजनेन सह आगच्छति याति च । अभ्यागत
आह, - "अस्ति किंचित् खनित्रकम् ?" स आह- "बाढमस्ति,
एषा सर्वलोहमयी स्वहस्तिका" । अभ्यागत आह, - "तर्हि
प्रत्यूषे त्वया मयासह स्थातव्यं येन द्वौ अपि जनचरणमलि-
नायां भूमौ तत्पदानुसारेण गच्छावः" । मया अपि तद्वचन-
माकर्ण्य चिन्तितम् । "अहो ! विनष्टोऽस्मि यतोऽस्य साभिप्रा-
यवचांसि श्रूयन्ते । नूनं यथा निधानं ज्ञातं तथा दुर्गमपि
अस्माकं ज्ञास्यति एतदभिप्रायादेव ज्ञायते । उक्तंच-
यह कह कर फिर वह बोला, - "उसके निकलनेका मार्ग जाना जाय" ।
ताम्रचूड बोला, - "भगवन् ! जाना जाता है कि वह इकल्ला नहीं आता है ।
किन्तु असंख्य यूथसे युक्त देखते हुए मेरे घूमता हुआ इधर उधर सब जनोंके साथ
आता जाता है"। अभ्यागत बोला, - "है कोई खोदनेका कुदाल ?" वह बोला, - "हां
है । यह सब लोहमयी खनित्र" । अभ्यागत बोला, - "तो सबेरे तुझे मेरे साथ
रहना चाहिये दोनोंही उसके जनचरणसे मलीन हुई भूमिमें उनके पदके अनुसरण
करचलें" । मैंनेभी उसके वचन सुनकर विचार किया । "अहो नष्ट हुआ कारण
कि इसके वचन अभिप्राय युक्त सुने जाते हैं । निश्चयही जैसे धन जान लिया
इसी प्रकार हमारे दुर्गकोभी जानेलेगा यह इसके अभिप्रायसे विदित होता
है । कहा है-

भाषाटीकासमेतम् । (२३९)
सकृदपि दृष्ट्वा पुरुषं विबुधा जानन्ति सारतां तस्य ।
हस्ततुल्यापि निपुणाः पलप्रमाणं विजानन्ति ॥ ८८ ॥
एक बारही पुरुषको देखकर पंडित उसकी सारता जानलेते हैं कुशल पुरुष
हाथकी तोलसेही पलके प्रमाणको जान लेते हैं ॥ ८८ ॥
वाञ्छैव सूचयति पूर्वतरं भविष्यं
पुंसां यदन्यतनुजं त्वशुभं शुभं वा ।
विज्ञायते शिशुरजातकलापचिह्नः
प्रत्युद्गतैरपसरन्सरसः कलापी ॥ ८९ ॥
चित्तकी इच्छाही पूर्व भविष्यको सूचित करती है जो पुरुषने दूसरे शरीरमें
शुभ या अशुभ किया है क्यों कि कलापका चिह्न बिना निकलेभी मोरका बच्चा
चालसे पहचान लिया जाता है ॥ ८९ ॥
ततोऽहं भयत्रस्तमनाः सपरिवारो दुर्गमार्गं परित्यज्य
अन्यमार्गेण गन्तुं प्रवृत्तः। सपरिजनेो यावदग्रतो गच्छा-
मि तावत् सम्मुखो बृहत्कायो मार्जारः समायाति ।
स च मूषकवृन्दमवलोक्य तन्मध्ये सहसा उत्पपात ।
अथ ते मूषका मां कुमार्गगामिनमवलोक्य गर्हयन्तो
हतशेषा रुधिरप्लावितवसुन्धराः तमेव दुर्गं प्रविष्टाः।
अथवा साधु इदमुच्यते-
तब मैं भयसे व्याकुल मन हुआ परिवारसहित दुर्ग मार्गको छोडकर और
मार्गमें जानेको प्रवृत्त हुआ और परिजन सहित जब आगे चला तब तो साम-
नेसे एक बडे शरीरवाला बिलाव आया । वह मूषकसमूहको देख एक साथ
उनपर टूट पडा । तब वे मूषक मुझ कुमार्गगामीको दोष देकर निन्दा करते
मरनेसे बचे रुधिरसे गीली वसुन्धराको करते उसी दुर्गमे प्रविष्ट हुए । अथवा
यह सत्य कहा है-
छित्त्वा पाशमपास्य कूटरचनां भङ्क्त्वा बलाद्वागुरां
पर्यन्ताग्निशिखाकलापजटिलान्निर्गत्य दूरं वनात् ।
व्याधानां शरगोचरादपि जवेनोत्पत्य धावन्मृगः
कूपान्तः पतितः करोतु विधुरे किं वा विधौ पौरुषम् ९०॥