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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( १७२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( १७२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
प्राणभयसे भागगया, चतुरकभी सहज २ उसका मांस खाता भया, इससे मैं
कहता हूं “परका पीडन करके इत्यादि” ।
अथ दमनके गते सञ्जीवकश्चिन्तयामास, “अहो !
किमेतन्मया कृतं यच्छष्पादोऽपि मांसाशिनस्तस्यानु-
गः संवृत्तः । अथवा साधु इदमुच्यते-
तब दमनकके जानेसे संजीवक विचारने लगा,-“अहो यह मैंने क्या किया,जो
मैं घास खानेवाला इस मांसभोजीका अनुगामी हुआ। अथवा यह सत्य कहा है कि-
अगम्यान्यः पुमान्याति असेव्यांश्च निषेवते ।
स मृत्युमुपगृह्णाति गर्भमश्वतरी यथा ॥ ४०१ ॥
जो पुरुष अगम्योंमें गमन करता है, असेव्योंको सेवन करता है, वह मृत्युको
प्राप्त होता है जैसे खच्चरी गर्भके धारण करनेसे ॥ ४०१ ॥
तत् किं करोमि, क्व गच्छामि, कथं मे शान्तिर्भवि-
ष्यति, अथवा तमेव पिङ्गलकं गच्छामि, कदाचिन्मां शरणा-
गतं रक्षति प्राणैर्न वियोजयति । यत उक्तञ्च-
सो मैं क्या करूं कहां जाऊं किस प्रकार मेरी शान्ति होगी अथवा उसी
पिंगलकके पास जाऊं कदाचित् मुझ शरण आये हुएको प्राणोंसे वियुक्त न करेगा
रक्षा करेगा। कहाहै-
धर्मार्थं यततामपीह विपदो दैवाद्यदि स्युः क्वचित्
तत्तासामुपशान्तये सुमतिभिः कार्यो विशेषान्नयः ।
लोके ख्यातिमुपागतात्र सकले लोकोक्तिरेषा यतो
दग्धानां किल वह्निना हितकरः सेकोऽपि तस्योद्भवः४०२॥
इस लोकमें धर्मार्थ यत्न करनेमें यदि दैवात् कुछ विपत्तिभी होजाय, तो
उसकी शान्तिके लिये सुमतियोंको विशेष नीति करनी चाहिये कारण कि, सब
लोकमें यह बात विख्यात है कि, जलेहुए स्थानपर अग्निका सेकही हित-
कारक होता है ॥ ४०२ ॥
तथाच-
ओरभी कहाहै-
लोकेऽथवा तनुभृतां निजकर्मपाकं
नित्यं समाश्रितवतां सुहितक्रियाणाम् ।

भाषाटीकासमेतम् । ( १७३ )
भावार्जितं शुभमथाप्यशुभं निकामं
यद्भावि तद्भवति नात्र विचारहेतुः ॥ ४०३ ॥
इस लोकमें शरीरधारियोंको अपने कर्मका विपाक होताही है जो कि,
नित्य अपने कर्तव्यसे अच्छी प्रकार कियाही है । तथा जो शुभ अशुभभावसे
अर्जन किया है और जो होनहार है वह होगाही इसमें विचारकी आव-
श्यकता नहीं ॥ ४०३ ॥
अपरं च, अन्यत्र गतस्यापि मे कस्यचित् दुष्टसत्त्वस्य
मांसाशिनः सकाशान्मृत्युर्भविष्यति,तद्वरं सिंहात् । उक्तञ्च-
और अन्यस्थानमें जाकरभी मेरी किसी मांसभक्षी दुष्ट जीवसे मृत्यु होगी
तो उससे तो सिंहके हाथसे मरना भला है । कहाहै-
महद्भिः स्पर्द्धमानस्य विपदेव गरीयसी ।
दन्तभङ्गोऽपि नागानां श्लाघ्यो गिरिविदारणे ॥ ४०४ ॥
बडे पुरुषोंसे स्पर्धा करनेसे विपत्तिभी अच्छी है पर्वतके विदीर्ण करनेमें
हाथियोंका दन्तभंगभी श्रेयस्कर है ॥ ४०४ ॥
तथाच-
तैसेही-
महतोऽपि क्षयं लब्ध्वा श्लाघ्यं नीचोऽपि गच्छति ।
दानार्थी मधुपो यद्वद्गजकर्णसमाहतः ॥ ४०५ ॥
नीच प्राणी बडे मनुष्योंसे क्षयको प्राप्तहोकर श्लाघ्यताको प्राप्त होता है
जैसे दानकी इच्छा करनेवाला हाथीके कर्णसे ताडित हुआ भौंरा ॥ ४०५ ॥
एवं निश्चित्य स स्खलितगतिर्मन्दं मन्दं गत्वा सिंहाश्रयं
पश्यन्नपठत, अहो साधु इदमुच्यते-
ऐसा निश्चय कर छिन्नगतिसे सजीवक मद मंद जाकर सिंहका आश्रय
देखता हुआ यह श्लोक पढने लगा । अहो यह सत्य कहाहै-
अन्तर्लीनभुजङ्गमं गृहमिव व्यालाकुलं वा वनं
ग्राहाकीर्णमिवाभिरामकमलच्छायासनाथं सरः ।
नानादुष्टजनैरसत्यवचनासक्तैरनार्यैर्वृतं
दुःखेन प्रतिगम्यते प्रचकितै राज्ञां गृहं वार्धिवत् ॥४०६॥