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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( ९४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ९४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

सर्पयुक्ते गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ।
यद्ग्रामान्ते वसेत्सर्पस्तस्य स्यात्प्राणसंशयः ॥ २३० ॥
कहा है कि, सर्पयुक्त घरमें निवास होवे तो मृत्युमें कोई संदेह नहीं
जिस ग्रामकी सीमामें सर्प रहता है उसका वहां प्राण संशय होता है ? इसमें
सन्देह नहीं ॥ २३० ॥
अस्माकमपि तत्र स्थितानां प्रतिदिनं प्राणसंशयः । "
स आह-“ न अत्र विषयं स्वल्पोऽपि विषादः कार्यः ।
नूनं स लुब्धो न उपायमन्तरेण वध्यः स्यात् ।
सो वहां रहनेसे हमको भी प्रतिदिन प्राणसंदेह रहता है” वह बोला- “इसमें
कुछभी दुःख मतकरो वह लुब्धक उपायके बिना न मरेगा ।
उपायेन जयो यादृग् रिपोस्तादृग् न हेतिभिः ।
उपायज्ञोऽल्पकायोऽपि न शूरैः परिभूयते ॥ २३१ ॥
जिस प्रकार शत्रु उपायसे दमन होता है इस प्रकार हथियारोंसे नहीं, उपा-
यका जाननेवाला छोटे शरीरवालाभी शूरोंसे तिरस्कृत नहीं होता ॥ २३१ ॥
तथाच-
और देखो-
भक्षयित्वा बहून्मत्स्यानुत्तमाधममध्यमान् ।
अतिलौल्याद्वकः कश्चिन्मृतः कर्कटकग्रहात् ॥ २३२ ॥
उत्तम मध्यम् अनेक मत्स्योंको खाकर अति चपलता करनेसे कोई
बक कैकड़ेसे पकड़े जानेके कारण मृतकहुआ ।
तावूचतुः-“कथमेतत् ? ” सोऽब्रवीत्-
वे दोनो बोले,-“यह कैसी कथा है ” ? वह (शृगाल) कहने लगा-
कथा ७.
अस्ति कस्मिंश्चित् वनप्रदेशे नानाजलचरसनाथं महत् सरः।
तत्र च कृताश्रयो बक एको वृद्धभावमुपागतो मत्स्यान् व्या-
पादयितुमसमर्थः । ततश्च क्षुत्क्षामकण्ठः सरस्तीरे उपविष्टो
मुक्ताफलप्रकरसदृशैः अश्रुप्रवाहैर्धरातलमभिषिञ्चन् रुरोद ।
एकः कुलीरको नानाजलचरसमेतः समेत्य तस्य दुःखेन

भाषाटीकासमेतम् । (९५)
दुःखितः सादरमिदमूचे,- "माम ! किमद्य त्वया न आहार-
वृत्तिः अनुष्ठीयते ? । केवलमश्रुपूर्णनेत्राभ्यां सनिःश्वासेन
स्थीयते"। स आह- "वत्स ! सत्यमुपलक्षितं भवता, मया
हि मत्स्यादनं प्रति परमवैराग्यतया साम्प्रतं प्रायोपवेशनं
कृतं, तेनाहं समीपगतानपि मत्स्यान् न भक्षयामि" । कुली-
रकः तच्छ्रुत्वा प्राह- "माम ! किं तद्वैराग्यकारणम् ?" । स
प्राह, - "वत्स ! अहम् अस्मिन् सरसि जातो वृद्धिं गतश्च ।
तत् मया एनत् श्रुतं यत् द्वादशवार्षिकी अनावृष्टिः सम्पद्यते
लग्ना"। कुलीरक आह, - "कस्मात् तच्छ्रुतम् ?" बक आह-
"दैवज्ञमुखात् । यतः शनैश्चरो हि रोहिणीशकटं भित्वा
भौमं शुक्रञ्च प्रयास्यति ।
किसी वनमें अनेक जञ्चरोंसे युक्त एक सरोवर है । वहापर रहनेवाला
एक बगला वृद्ध भावको प्राप्त हुआ मछलियोंके खानेको असमर्थ था, वहां
भूखसे शुष्ककंठ नदी क किनारे बैठा मोतियोंके समूहकी समान आसुओंके प्रवा-
हसे पृथिवीको भिजोता हुआ रोताथा । एक केंकडा अनेक जलचरोंके साथ उसके
दुःखसे दुःखी हुआ आदरसे यह बोला,- "मामा ! आज तुम अपने आहारकी
वृत्ति क्यों नहीं करते हो? केवल अश्रुपूर्ण नेत्रोंको किये स्वास लेरहे हो"। वह बोला,-
"वत्स! आपने सत्य देखा, मैने अब मछलियोके खानेमें परम वैराग्यता होनेसे मरने
का व्रत लिया है, इस समयमें समीपमे गई हुई मछलियोको भी नहीं खाताहू"कुली-
रक यह सुनकर बोला,- "म.मा ! तुम्हारे वैराग्यका कारण क्या है ?" वह बोला,-
मैं इस सरोवरमें उत्पन्न हुआ और यहीं वृद्धिको प्राप्त हुआहू। सो मैने यह सुना है
बारह वर्षकी अनावृष्टि होगी" । कुलीरक बोला- "किससे सुना ?" उस बकने
कहा- "ज्योतीषीके मुखसे सुना है कारण कि, शनैश्चर रोहिणीको भेदकरे मगल
शुक्रके निकट प्राप्त होगा ।
उक्तञ्च वराहमिहिरेण-
जैसा कि, वराहमिहिरने कहा है-
यदि भिन्ते सूर्य्यपुत्रो रोहिण्याः शकटमिह लोके ।
द्वादशवर्षाणि तदा न हि वर्षति वासवो भूमौ ॥ २३३ ॥