पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( ४२० ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ४२० ) पञ्चतन्त्रम् ।
स्वामी न होगा तो मैं अग्नि वा जलमें प्रवेश करजाऊंगी । कारण कि उसका
वियोग सहनेको मैं समर्थ नहीं हूं”। सो कृपाकर वहांको आओ । नहीं तो तुम्हें
स्त्रीहत्या होगी और भगवान् कामदेव तुमपर क्रोध करेंगे । कहा है-
स्त्रीमुद्रां मकरध्वजस्य जयिनीं सर्वार्थसम्पत्करीं
ये मूढाः प्रविहाय यान्ति कुधियो मिथ्याफलान्वेषिणः ।
ते तेनैव निहत्य निर्दयतरं नग्नीकृता मुण्डिताः
केचिद्रक्तपटीकृताश्च जटिलाः कापालिकाश्चापरे ॥ ३६॥”
जो दुर्बुद्धि पुरुष कामके जीतनेवाली ध्वजा सब अर्थ और सम्पत्ति करनेवा-
लीको छोड़कर मिथ्या फल तपश्चर्या आदि करते हैं । वे उस कामनेही निष्ठुर-
तासे उन्हें मारकर कोई नंगे, कोई मुंडित, कोई लालवस्त्रवाले, कोई जटाधारी,
कोई कपाली करदिये हैं ॥ ३६ ॥”
अथ असौ तद्वचनं श्रद्धेयतया श्रुत्वा भूयोऽपि तेन सह
प्रस्थितः । अथवा साधु इदमुच्यते-
तब यह उसके वचनको श्रद्धासे सुनकर फिर भी उसके संग गया, अथवा
अच्छा कहा है-
जानन्नपि नरो दैवात्प्रकरोति विगर्हितम् ।
कर्म किं कस्यचिल्लोके गर्हितं रोचते कथम् ॥ ३७ ॥
मनुष्य जानकरभी प्रारब्धसे निन्दित कर्म करता है नहीं तो संसारमें निन्दित
कर्म किसको अच्छा लगता है ॥ ३७ ॥
अत्रान्तरे सज्जितक्रमेण सिंहेन स लम्बकर्णो व्यापा-
दितः । ततस्तं हत्वा शृगालं रक्षकं निरूप्य स्वयं स्नानार्थं
नद्यां गतः । शृगालेनापि लौल्यौत्सुक्यात् तस्य कर्णहृदयं
भक्षितम् । अत्रान्तरे सिंहो यावत् स्नात्वा कृतदेवार्चनः
प्रतर्पितपितृगणः समायाति तावत् कर्णहृदयरहितो रासभः
तिष्ठति । तं दृष्ट्वा कोपपरीतात्मा सिंहः शृगालं आह-
“पाप ! किमिदमनुचितं कर्म समाचरितम् । यत् कर्णहृदय-
भक्षणेन अयमुच्छिष्टतां नीतः” । शृगालः सविनयमाह-
“स्वामिन् ! मा मा एवं वद । यत्कर्णहृदयरहितोऽयं रासभः
भाषाटीकासमेतम् । ( ४२१ )
आसीत् येन इह आगत्य त्वामवलोक्य भूयोऽपि आगतः” ।
अथ तद्वचनं श्रद्धेयं मत्वा सिंहः तेनैव सह संविभज्य निःश-
ङ्कितमनाः तं भक्षितवान् । अतोऽहं ब्रवीमि-
इसी समय तयार बैठे सिंहने लम्बकर्णको मारडाला तब उसे मार उसकी
रक्षामें शृगालको निरूपण करके स्वय स्नान करनेके निमित्त नदीको गया । शृगा-
लनेभी चपलता को और उत्कंठासे उसका कान और हृदय भक्षण किया, इसी
समय सिंहभी जबतक स्नान कर देवतार्चन करके पितृगणोंको तृप्त करके आया
तबतक कर्णहृदयसे रहित गर्दभको देखा । उसे देख क्रोधसे सिंह शृगालसे
बोला-“पापिष्ठ ! क्या यह तैने अनुचित कर्म किया जो कर्ण हृदयको भक्षण-
कर यह जूठा कर दिया” । शृगाल विनयपूर्वक बोला-“स्वामिन् ऐसा मत कहो !
यह गधा कर्ण और हृदयसे रहितही था, जिससे यहा आकरभी तुम्हें देखकर
फिरभी आया” । तब उसके वचनको सिंहने श्रद्धासे मानकर उसको विभाग कर
उसके साथ निःशक होकर भक्षण किया । इससे मैं कहता हू--
“आगतश्च गतश्चैव दृष्ट्वा सिंहपराक्रमम् ।
अकर्णहृदयो मूर्खो यो गत्वा पुनरागतः ॥ ३८ ॥”
“जो आकर और सिंहके पराक्रमको देखकर चला गया । परन्तु कर्ण और
हृदय रहित होनेके कारण वह मूर्ख फिर आया ॥ ३८ ॥”
तन्मूर्ख ! कपटं कृतं त्वया । परं युधिष्ठिरेणेव सत्यवच-
नेन विनाशितम् । अथवा साधु इदमुच्यते-
सो मूर्ख ! तैने कपट किया परन्तु युधिष्ठिरकी समान सत्य वचनसे नष्ट कर
दिया । अथवा यह अच्छा कहा है-
“स्वार्थमुत्सृज्य यो दम्भी सत्यं ब्रूते सुमन्दधीः ।
स स्वार्थाद् भ्रश्यते नूनं युधिष्ठिर इवापरः ॥ ३९ ॥”
“जो मूढमति पाखण्डी मनुष्य स्वार्थको छोडकर सत्य कहता है वह युधिष्ठि-
रकी समान अवश्य स्वार्थसे भ्रष्ट होता है ॥ ३९ ॥”
मकर आह-“कथमेतत् ?” स आह-
मकर बोला-“यह कैसी कथा है ?” वह बोला--