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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( ४५८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ४५८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तमें जागकर (सेठ) स्वप्नको स्मरण करता चिन्ता युक्त बैठा,-“अहो यह स्वप्न
सत्य है, वा असत्य होगा सो नहीं जानाजाता । अथवा अवश्यही मिथ्या होगा,
कारण कि प्रतिदिन मैं धनकीही चिन्ता करता हूं। कहा है-
व्याधितेन सशोकेन चिन्ताग्रस्तेन जन्तुना ।
कामार्तेनाथ मत्तेन दृष्टः स्वप्नो निरर्थकः ॥ ११ ॥
व्याधियुक्त शोकवान् चिन्तासे ग्रस्त कामार्त और मत्त प्राणीका देखा हुआ
स्वप्न निरर्थक होता है ॥ ११ ॥
एतस्मिन् अन्तरे तस्य भार्य्यया कश्चित् नापितः पाद-
प्रक्षालनाय आहूतः । अत्रान्तरे च यथानिर्दिष्टः क्षपणकः
सहसा प्रादुर्बभूव । अथ स तमालोक्य प्रहृष्टमना यथा आस-
न्नकाष्ठदण्डे न तं शिरसि अताडयत् । सोऽपि सुवर्णमयो भूत्वा
तत्क्षणात् भूमौ निपतितः । अथ स श्रेष्ठी निभृतं स्वगृहमध्यं
कृत्वा नापितं सन्तोष्य प्रोवाच,-“तदेतत् धनं वस्त्राणि च
मया दत्तानि गृहाण । भद्र ! पुनः कस्यचित् न आख्येयो
वृत्तान्तः,” नापितोऽपि स्वगृहं गत्वा व्यचिन्तयत्,-“नून-
मेते सर्वेऽपि नग्नकाः शिरसि दण्डहताः काञ्चनमया भवन्ति।
तदहमपि प्रातः प्रभूतानाहूय लगुडैः शिरसि हन्मि, येन
प्रभूतं हाटकं मे भवति” । एवं चिन्तयतो महता कष्टेन निशा
अतिचक्राम । अथ प्रभाते अभ्युत्थाय बृहल्लगुडमेकं प्रगुणी-
कृत्य क्षपणकविहारं गत्वा जिनेन्द्रस्य प्रदक्षिणत्रयं विधाय
जानुभ्याम् अवनिं गत्वा वक्त्रद्वारन्यस्तोत्तरीयाञ्चलः तार-
स्वरेण इमं श्लोकम् अपठत-
इसी समय उसकी भार्या ने किसी नाईको पांव धोनेके निमित्त बुलाया ।
इसी समय कहेहुएके अनुसार वह संन्यासी प्रगट हुआ । वह उसे देखकर
प्रसन्न मनसे धोरे धरी हुई काष्ठकी लकडीसे उसके शिरमें ताडन करता भया ।
वह भी सुवर्णमय होकर उसी समय पृथिवीपर गिरा तब वह सेठ एकान्तमें उसे
अपने घरमें लेजाकर नाईको सन्तोषित कर बोला,-“यह धन और वस्त्र मेरे
दिये हुए ग्रहण कर । भद्र ! यह वृत्तान्त किसिसे न कहना” । नाई भी अपने

भाषाटीकासमेतम् । ( ४५९ )
घरमे जाकर विचारने लगा,- "अवश्यही यह सब बौद्ध सन्यासी शिरमे डण्डेसे
प्रहार करनेसे सोनेके होजाते हैं सो मैंभी बहुतोंको बुलाकर डण्डोंसे शिरमें
प्रहार करके मारू । जिससे मेरे यहा बहुत धन होजाय" । ऐसा विचार कर
बडे कष्टसे उसने रात बिताई प्रात.कालही उठकर एक बडे डण्डेको तयारकर
संन्यासियोंके विहारस्थलमें जाकर जिनेन्द्रकी तीन प्रदक्षिणा करके जंघाके बलसे
पृथ्वीमें बैठकर वक्रद्वार ( मुख ) में दुपट्टा लपेटे हुए ऊंचे स्वरसे इस श्लोकको
पढने लगा-
जयन्ति ते जिना येषां केवलज्ञानशालिनाम् ।
आजन्मनः स्मरोत्पत्तौ मानसेनोषरायितम् ॥ १२ ॥
केवल निरवच्छिन्न ज्ञानवाले जिनके चित्तमें जन्मसेही कामोत्पत्ति उषरवत्
रही है (नहीं हुई) वे क्षपणक सबसे उत्कृष्ट वर्तते हैं ॥ १२ ॥
अन्यच्च-
औरभी-
सा जिह्वा या जिनं स्तौति तच्चित्तं यज्जिने रतम् ।
तावेव च करौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ ॥ १३ ॥
वही जिह्वा है जो जिनकी स्तुति करती है, वही चित्त है जो जिनमें रत
है, वही श्लाघनीय हाथ हैं जो बौद्धकी पूजा करनेवाले हैं ॥ १३ ॥
तथा च-
और देखो-
ध्यानव्याजमुपेत्य चिन्तयसि कामुन्मील्य चक्षुः क्षणं
पश्यानंगशरातुरञ्जनमिमं त्रातापि नो रक्षसि ।
मिथ्याकारुणिकोऽसि निर्घृणतरस्त्वत्तः कुतोऽन्यः पुमान्
सेर्ष्यं मारवधूभिरित्यभिहितो बौद्धो जिनः पातु वः॥१४॥
हे माननीय ! ध्यानके बहानेसे किस कान्ताका स्मरण करता है, आख खोल-
कर कामबाणसे विद्ध इस जनको अवलोकन कर । त्राणमें समर्थ होकरभी हमारी
रक्षा क्यो नहीं करता ? । इस कारण तुम अलीक दयावाले हो, तुमसे अधिक
और निर्दयी पुरुष कौन होगा, ईर्ष्यापूर्वक कामदेवकी वधूसे इस प्रकार कहेहुए
बौद्ध जिन तुम्हारी रक्षा करै ॥ १४ ॥