पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( ७८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ७८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
नाशसमुद्भूतशोकरहितः पुनरपि स्वकीयं मथायतनं जगाम ।
अतोऽहं ब्रवीमि- "जम्बूको हुडुयुद्धेन" इति ।
सो इसका नासिकाच्छेद तो इसके कर्मसेही होगयाहै । अब राजनियह कर्ण-
च्छेद करना" । ऐसा होनेपर देवशर्माभी अपने धननाशके शोकसे रहित हो अपने
मठमें आया, इससे मैं कहताहूं- "जम्बुक हुडुयुद्धसे" इत्यादि ।
करटक आह- "एवंविधे व्यतिकरे किं कर्त्तव्यमावयोः" ।
दमनकोऽब्रवीत्- "एवंविधेऽपि समये मम बुद्धिस्फुरणं भवि-
ष्यति, येन सञ्जीवकं प्रभोर्विश्लेषयिष्यामि । उक्तञ्च-
करटक बोला- "इस प्रकारकी अवस्थामें हम दोनोंको क्या करना चाहिय" ।
दमनक बोला- "इस प्रकारके समयमेंभी मेरी बुद्धि स्फुरित होगी, जिससे
संजीवकको प्रभुसे पृथक् करसकूंगा । कहाहै-
एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुरुक्तो धनुष्मता ।
बुद्धिर्बुद्धिमतः सृष्टा हन्ति राष्ट्रं सनायकम् ॥ २१५ ॥
धनुष्यधारीके धनुषसे निकला हुआ बाण किसी एकको मारे या न मारे लेकिन्
बुद्धिमानकी बुद्धिसे किया कृत्य राजा सहित राज्यको नष्ट करताहै ॥ २१५ ॥
तदहं मायाप्रपञ्चेन गुप्तमाश्रित्य तं स्फोटयिष्यामि" ।
करटक आह- "भद्र ! यदि कथमपि तव मायाप्रवेशं पिङ्ग-
लकः ज्ञास्यति सञ्जीवको वा तदा नूनं विघात एव" ।
सोऽब्रवीत्- "तात ! नैवं वद गूढबुद्धिभिरापत्काले विधुरे-
ऽपि दैवे बुद्धिः प्रयोक्तव्या नोद्यमस्त्याज्यः कदाचित् घुणा-
क्षरन्यायेन बुद्धेः साम्राज्यं भवति । उक्तञ्च-
सो मैं मायाप्रपंचसे गुप्त आश्रय कर इनमें फूट करूं" करटक बोला-
"भद्र ! यदि किसीप्रकार यह पिंगलक संजीवक तुम्हारी मायाका प्रवेश जान
जायं तो अवश्य नष्ट होना होगा" वह बोला- "तात ! ऐसा
मतकहो, महाबुद्धिमानोंको आपत्कालमें प्रारब्धके नष्ट होनेमेंभी बुद्धिका प्रयोग
करना उचितहै, उद्यमका त्याग करना अच्छा नहीं है, कदाचित् घुणाक्षरन्यायसे
बुद्धिद्वारा सुखसाम्राज्य प्राप्त होजाय । कहा भी है-
१ घुनके कुरेदनेसे जो अक्षर बनजाय ।
भाषाटीकासमेतम् । ( ७९ )
त्याज्यं न धैर्य्यं विधुरेऽपि दैवे
धैर्य्यात्कदाचित्स्थितिमाप्नुयात्सः ।
याते समुद्रेऽपि हि पोतभङ्गे
सांयात्रिको वाञ्छति कर्म्म एव ॥ २१६ ॥
दैवके बिगडनेमेभी धीरता त्यागन करनी नहीं चाहिये कारण कि, धैर्यसे
कदाचित् स्थितिकी प्राप्ति होजाय समुद्रमे जहाज डूबनेपरभी ' पोत वणिक् उद्यम
करनेकीही इच्छा करता है । ( अर्थान्तरन्यासः) ॥ २१६ ॥
तथाच-
और देखो-
उद्योगिनं सततमत्र समेति लक्ष्मी-
दैवं हि दैवमिति कापुरुषा वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
यत्ने कृते यदि न सिद्ध्यति कोऽत्र दोषः ॥ २१७ ॥
उद्योगी पुरुषको निरन्तर लक्ष्मी मिलती है, प्रारब्ध देता है यह कायर कहते
हैं, दैवको त्यागकर आत्मशक्तिसे पुरुषार्थ कर यत्न करनेपरभी यदि सिद्ध न हो
तो किसका दोष है ॥ २१७ ॥
तदेवं ज्ञात्वा सुगूढबुद्धिप्रभावेण यथा तौ द्वौ अपि न
ज्ञास्यतः तथा मिथो वियोजयिष्यामि । उक्तञ्च-
सो ऐसा जानकर अपनी बुद्धिके प्रभाव करके जैसे वह दोनों न जाने इस
प्रकार उनको वियुक्त कर दूंगा । कहाभी है-
सुगुप्तस्यापि दम्भस्य ब्रह्माप्यन्तं न गच्छति ।
कौलिको विष्णुरूपेण राजकन्यां निषेवते ॥ २१८ ॥”
सम्यक् प्रकारसे छिपाये दम्भके अन्तको तो ब्रह्माभी नहीं जानसकता, इसी
लिये एक कौलिक विष्णुके रूपसे राजकन्यासे रमताथा ॥ २१८ ॥”
करटक आह-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत्-
करटक बोला,-“यह कैसी कथा है ?” वह बोला-