सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( १७४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( १७४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
भीतर स्थित है सर्प जिसमें ऐसे घरकी समान, हिंसक जीवोंसे व्याप्त वनकी
समान, ग्राह ( नाकों ) से युक्त मनोहर छायावाले कमल खिले सरोवरकी समान,
अनेक दुष्टजन असत्य वचनोंमे रत असाधुओंसे पूर्ण राजाओंका घर सागरकी
समान भीत हुए श्रेष्ठ पुरुषोंसे दुःखसे जाया जाता है ॥४०६॥
एवं पठन् दमनकोक्ताकारं पिङ्गलकं दृष्ट्वा प्रचकितः संवृ-
तशरीरो दूरतरं प्रणामकृतिं विनापि उपविष्टः पिङ्गलकोऽपि
तथाविधं तं विलोक्य दमनकवाक्यं श्रद्दधानः कोपात्
तस्योपरि पपात । अथ सञ्जीवकः खरनखरविदारितपृष्ठः
शृंगाभ्यां तदुदरमुल्लिख्य कथमपि तस्मादपेतः । शृंगाभ्यां
हन्तुमिच्छन् युद्धायावस्थितः । अथ द्वौ अपि तौ पुष्पितप-
लाशप्रतिभौ परस्परवधकांक्षिणौ दृष्ट्वा करटको दमनकमाह-
"भो मूढमते ! अनयोर्विरोधं वितन्वता त्वया साधु न
कृतम् । न च त्वं नीतितत्त्वं वेत्सि । नीतिविद्भिरुक्तञ्च,-
इस प्रकार पढता हुआ दमनकके कहे आकारकी समान पिंगलकको देखकर
चकित और रक्षित शरीरसे बिनाही प्रणाम किये दूर बैठगया । पिंगलकभी इस
प्रकार उसको देख दमनकका वाक्य सत्य मानकर कोपसे उसके ऊपर टूट पडा
तब संजीवक उसके तीक्ष्ण नखोंसे विदीर्ण पीठवाला; सींगोंसे उसके उदरमें
प्रहार कर किसी प्रकार उससे अलग हुआ; सींगोंसे मारनेकी इच्छा कर -युद्धके
निमित्त स्थित हुआ, तब दोनोंही वह फूले ढाककी समान हुए परस्पर वधकी
आकांक्षासे दोनोंको देख करटक दमनकसे बोला,—"भो मूढमते ! इन दोनोंको
विरोध करते हुए तैने अच्छा नहीं किया तू नीतिका तत्व नहीं जानता । नीति-
जाननेवालोंने कहाहै-
कार्याण्युत्तमदण्डसाहसफलान्यन्याससाध्यानि ये
प्रीत्या संशमयन्ति नीतिकुशलाः सार्द्धैव ते मन्त्रिणः ।
निःसारल्पफलानि ये त्वविधिना वाञ्छन्ति दण्डोद्यमै-
स्तेषां दुर्णयचेष्टितैर्नरपतेरारोप्यते श्रीस्तुलाम् ॥ ४०७ ॥
जो कार्य्य उत्तम दंड साहसके फलवाले और कष्टसाध्य हैं नीतिकुशल मंत्री
वे कार्य्य प्रीति और साम उपायसेही निर्वाहिन करते हैं और जो अन्याय तथा

भाषाटीकासमेतम् । (१७५)

युद्धके उद्योगसे अल्प फलकी वाञ्छा करते हैं उन दुर्नीति चेष्टावाले राजोंकी
लक्ष्मी सन्देहमें आरोपण की जाती है ॥ ४०७ ॥
तद्यदि स्वाम्यभिघातो भविष्यति तत् किं त्वदीयमन्त्रबु-
द्वया क्रियते । अथ सञ्जीवको न बध्यते तथापि अभव्यं यतः
प्राणसन्देहात् तस्य च वधः, तन्मूढ ! कथं त्वं मन्त्रिप्दम-
भिलषसि सामसिद्धिं न वेत्सि, तद्वृथा मनोरथोऽयं ते
दण्डरुचेः । उक्तञ्च-
सो यदि स्वामीका नाश होगा तो क्या तेरी मंत्रबुद्धिसे किया जाय । और
सञ्जीवक न मरे तो भी अशुभ होगा, जो कि, प्राणसन्देहसे उसका वध है सो
मूर्ख ! किसप्रकार तू मन्त्रीपदकी अभिलाषा करता है साम सिद्धिको नहीं जानता
सो दण्डरुचि करनेवाले तेरा यह मनोरथ वृथा है । कहा है-
सामादिदण्डपर्यन्तो नयः प्रोक्तः स्वयम्भुवा ।
तेषां दण्डस्तु पापीयांस्तं पश्चाद्विनियोजयेत् ॥ ४०८ ॥
सामसे लेकर दण्ड पर्य्यन्त ब्रह्माने नीति कही है उसमें दंड पापी है उसको
पीछे नियुक्त करना चाहिये ॥ ४०८ ॥
तथाच-
और देखो-
साम्नैव यत्र सिद्धिर्न तत्र दण्डो बुधेन विनियोज्यः ।
पित्तं यदि शर्करया शाम्यति कोऽर्थः पटोलेन ॥ ४०९ ॥
जहां साम उपायसेही सिद्धि होती है पंडितको वहां दंड प्रयुक्त नहीं करना
चाहिये, यदि मिश्री शर्करासेही पित्त शान्त होजाय तो पटोल देनेसे क्या
फायदा ॥ ४०९ ॥
तथाच-
और भी-
आदौ साम प्रयोक्तव्यं पुरुषेण विजानता ।
सामसाध्यानि कार्य्याणि विक्रियां यान्ति न काचित्४१०
ज्ञानी पुरुषोंको प्रथम साम उपाय प्रयोग करना चाहिये सामसे सिद्ध
हुए कार्य्य विकारको प्राप्त नहीं होते हैं ॥ ४१० ॥