पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( ५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
सञ्जीवकके साथ अनेक शास्त्रके अवगाहनसे बुद्धिकी प्रगल्भता अधिक
होनेके कारण थोडेही दिनोंमें उसने मूढमति पिंगलक इस प्रकार बुद्धिमान् कर
दिया कि, वनके धर्मोंसे पृथक् कर ग्राम्य धर्ममें लगादिया । बहुत कहनेसे क्या
प्रतिदिन संजीवक और पिंगलकही केवल एकान्तमें सम्मति करते, शेष सम्पूर्ण
मृगजन दूरस्थित रहते, करटक दमनकको भी प्रवेश न मिलता । और सिंहके
पराक्रम न करनेके कारण सम्पूर्ण मृग और वे दोनों शृगाल क्षुधारूप रोगसे
व्यथित हुए एक दिशामें आश्रित हो स्थितहुए । कहा है-
फलहीनं नृपं भृत्याः कुलीनमपि चोन्नतम् ।
सन्त्यज्यान्यत्र गच्छन्ति शुष्कं वृक्षमिवान्डजाः ॥ १६३ ॥
भृत्यजन फलहीन कुलीन और उन्नत राजाकोभी छोड़कर अन्यत्र चले
जाते हैं, जैसे शुष्क वृक्षको पक्षी ॥ १६३ ॥
तथाच-
तैसेही-
अपि सम्मानसंयुक्ताः कुलीना भक्तितत्पराः ।
वृत्तिभंगान्महीपालं त्यजन्त्येव हि सेवकाः ॥ १६४ ॥
सन्मानसेभी संयुक्त कुलीन भक्तिमे तत्पर सेवकभी आजीविका न मिलनेसे
स्वामीको त्याग देते हैं ॥ १६४ ॥
अन्यच्च-
औरभी-
कालातिक्रमणं वृत्तेर्यो न कुर्वीत भूपतिः ।
कदाचित्तं न मुञ्चन्ति भर्त्सिता अपि सेवकाः ॥ १६५ ॥
जो राजा मासिक देनेका कालातिक्रम नहीं करता है उसको धुड़कनेसेभी
सेवक कभी नहीं त्यागते हैं ॥ १६५ ॥
तथा न केवलं सेवका इत्थम्भूता यावत् समस्तमपि एत-
ज्जगत् परस्परं भक्षणार्थं सामादिभिरुपायैस्तिष्ठति । तद्यथा-
इस प्रकारसे सेवक सम्पूर्ण जगत्को परस्पर भक्षणके निमित्त सामादि उप-
योंसे स्थित रहते हैं । सो ऐसे कि-
भाषाटीकासमेतम् । ( ५७ )
देशानामुपरि क्ष्माभृदातुराणां चिकित्सकाः ।
वणिजो ग्राहकाणां च मूर्खाणामपि पण्डिताः ॥ १६६ ॥
देशोपर राजा, रोगियोंको वैद्य, ग्राहकोको वणिक्, मूर्खोंको पण्डित॥ १६६॥
प्रमादिनां तथा चौरा भिक्षुका गृहमेधिनाम् ।
गणिकाः कामिनाञ्चैव सर्वलोकस्य शिल्पिनः ॥ १६७ ॥
असावधानोको चोर, गृहस्थियोको फकीर, कामियोंको गणिका, और
सब लोकको शिल्पी ॥ १६७ ॥
सामादिसजितैः पाशैः प्रतीक्षन्ते दिवानिशम् ।
उपजीवन्ति शक्त्या हि जलजा जलदानिव ॥ १६८ ॥
साम दानादि द्वारा लगाये पाशोंसे रात दिन देखते रहते हैं जैसे व्रीहि
आदि मेघोंकी ( प्रतीक्षा करते हैं ) इस प्रकार सब उनकी शक्तिसे जीते हैं॥१६८
अथवा साध्विदमुच्यते-
अथवा यह अच्छा कहा है-
सर्पाणाञ्च खलानाञ्च परद्रव्यापहारिणाम् ।
अभिप्राया न सिध्यन्ति तेनेदं वर्त्तते जगत् ॥ १६९ ॥
सर्प और पराये द्रव्य हरनेवाले दुष्टोंके अभिप्राय नहीं सिद्ध होते इसी कार-
णसे यह जगत् रक्षाको प्राप्त है ॥ १६९ ॥
अत्तुं वाञ्छति शाम्भवो गणपतेराखुं क्षुधार्त्तः फणी
तं च क्रौञ्चरिपोः शिखी गिरिसुतासिंहोऽपि नागाशनम् ।
इत्थं यत्र परिग्रहस्य घटना शम्भोरपि स्याद्गृहे
तत्रान्यस्य कथं न भावि जगतोयस्मात्स्वरूपं हितत् १७०॥
( देखो ) शिवजीका सर्प क्षुधित होकर गणेशजीके मूषकको खानेकी इच्छा
करता है, उसको कार्तिकेयका मोर और मोरको गिरिजाका वाहन सिंह खानेकी
इच्छा करता है, इसप्रकार शिवके घरमेभी परस्पर आक्रमणकी घटना है, तो
दूसरेके घरमे क्यो न होगी, कारण कि, परस्पर उपजीविकावाला जगत्का
स्वरूप ही है ॥ १७० ॥
ततः स्वामिप्रसादरहितौ क्षुत्क्षामकण्ठौ परस्परं करटक-
दमनकौ मन्त्रयेते । तत्र दमनको ब्रूते-"आर्य्य करटक !
आवां तावदप्रधानतां गतौ। एष पिंगलकः सञ्जीवकानुरक्तः
स्वव्यापारपराङ्मुखः सञ्जातः । सर्वोऽपि परिजनो गतः।
तत्किं क्रियते" । करटक आह--“यद्यपि त्वदीव्यवचनं न
करोति तथापि स्वामी स्वदोषनाशाय वाच्यः । उक्तञ्च--
सो स्वामीके प्रसादसे रहित भूखसे दुर्बल करटक और दमनक सम्मति करने
लगे । दमनक बोला--“आर्य्य करटक ! हम तो अब अप्रधानताको प्राप्तहुए और
यह पिंगलक संजीवकमें अनुरक्त होकर अपने कार्यसे विमुख हुआ । सब परिजन
चलेगये अब क्या करें” । करटक बोला--“यद्यपि आपके वचन नहीं मानता
तथापि अपने दोष नाशके लिये स्वामीसे कहना उचितहै । कहाहै कि--
अशृण्वन्नपि बोद्धव्यो मंत्रिभिः पृथिवीपतिः ।
यथा स्वदोषनाशाय विदुरेणाम्बिकासुतः ॥ १७१ ॥
मंत्रियोंको राजा न सुनतेहुएभी समझाना चाहिये जैसे विदुरने धृतराष्ट्र-
को अपने दोष नाश करनेके लिये समझाया था ॥ १७१ ॥
तथाच--
और देखो--
मदोन्मत्तस्य भूपस्य कुञ्जरस्य च गच्छतः ।
उन्मार्गं वाच्यतां यान्ति महामात्राः समीपगाः ॥ १७२ ॥
मदोन्मत्त राजा और हाथीके उन्मार्ग जानेमें उनके समीपी और महावत
वाच्यता ( निन्दा )को प्राप्त होते ह ॥ १७२ ॥
तत् त्वया एष शष्पभोजी स्वामिनः सकाशमानीतस्त-
त्स्वहस्तेन अङ्गाराः कर्षिताः”। दमनक आह--“सत्यमेतत ।
ममायं दोषो स्वामिनः । उक्तञ्च-
सो तैने यह घास खानेवाला स्वामीके निकट प्राप्त किया सो अपने हाथसे ही
तैने अंगारा खेंचा”दमनक बोला--“यह सत्य है इसमे मेरा दोषहै स्वामीका
नहीं । कहाहै--
जम्बूको हुडुयुद्धेन वयं चाषाढभूतिना ।
दूतिका परकार्य्येण त्रयो दोषाः स्वयंकृताः ॥ १७३ ॥”
हुडु ( जीवविशेष ) से जम्बूक और आषाढभूतिसे हम दूसरेके कार्यसे
दूती यह तीनों अपने दोषसे (दूषित हुए ) ॥ १७३ ॥'