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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

( ७० ) पञ्चतन्त्रम् ।

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( ७० ) पञ्चतन्त्रम् ।

वह बोली-"यदि ऐसा है बता किसप्रकारसे मै दृढ बंधनमें बँधी हुई वहां
जाऊं ? और यह पापात्मा मेरा पति समीपमें है"। नायन बोली-"सखी !
मदसे विह्वल हुआ यह सूर्य निकलनेपर जागेगा। सो मैं तुझे खोले देतीहूं,
मुझे अपने स्थानमें बाँधकर बहुत शीघ्र देवदत्तका मन मनाकर आ" वह
बोली-"ऐसाही हो" तब यह नायन उस अपनी सखीको बन्धनसे खोल उसके
स्थानमें यथापूर्व अपनी आत्माको बांधकर उसको देवदत्तके निकट संकेत स्थानमें
भेजती हुई। ऐसा होनेपर कौलिक कुछ काल उपरान्त उठकर कुछगतकोप और
मद उतरनेसे बोला-"हे कठोरवादिनि ! यदि आजसे लेकर तू घरसे न निकले
तो तुझे खोलदूं" नायनभी स्वरभेदके भयसे जबतक कुछ नहीं बोलती तबतक
वहभी वारंवार उससे यही कहने लगा और जब उसने कुछभी उत्तर नदिया तब
वह क्रोधकर तीक्ष्ण छुरी लेकर उसकी नाककाटता हुआ और बोला-"कुलटा !
ठहर फिर नै तुझको संतुष्ट करूंगा" यह कहकर सोगया। देवशर्माभी धनके नाशसे
क्षुधासे शुष्ककंठ हुआ निद्रा रहित होकर यह सब स्त्रीचरित्र देखता रहा था, और
वह कौलिकभार्या यथेच्छ देवदत्तके संग सुरतका सुख अनुभव कर कुछ काल
उपरान्त घर आकर उस नायनसे बोली-"कहो तुम्हारे कुशल है ? अयि !
तुम्हारी कुशल है ? मेरे जानेपर यह पापात्मा उठा तो नहीं" नायन बोली-
"नासिकाके बिना और सब शरीरमें कुशल है, सो शीघ्र मुझे बन्धनसे खोल
जबतक यह मुझे न देखे जिससे मैं अपने घर चली जाऊं" ऐसा करनेपर
फिरभी कौलिक उठकर बोला-"पुंश्चलि ! क्या अबभी नहीं, बोलती क्या
अब फिर कठिन दण्ड कर्णछेदनका तुझको करूं"। तब वह क्रोध और
आक्षेपके सहित यह बोली,-"धिक् धिक् महामूढ ! कौन मुझ महासतीको
धर्षण करनेका अथवा व्यंग ( शरीरछेदन ) करनेको समर्थ है। सो सब
लोकपाल सुनें-
आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च
द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च ।
अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये
धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ॥ १९३ ॥
सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अग्नि, स्वर्ग, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दिनरात, दोनों
संध्या और धर्म मनुष्यका वृत्त जानते हैं ॥ १९३ ॥

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भाषाटीकासमेतम् । ( ७१ )

तद्यदि मम सतीत्वमस्ति मनसापि परपुरुषो नाभिल-
षितः ततो देवा भूयोऽपि मे नासिकां तादृग्रूपामक्षतां
कुर्वन्तु । अथवा यदि मम चित्ते परपुरुषस्य भ्रान्तिरपि
भवति मां भस्मसान्नयन्तु” । एवमुक्त्वा भूयोऽपि तमाह—
“भो दुरात्मन् ! पश्य मे सतीत्वप्रभावेण तादृशी एव
नासिका संवृत्ता” । अथ असा उल्मुकमादाय यावत्पश्यति
तावत् तद्रूपां नासिकाञ्च भूतले रक्तप्रवाहञ्च महान्तमप-
श्यत् । अथ स विस्मितमनास्तां बन्धनाद्विमुच्य शय्यायामा-
रोप्य च चाटुशतैः पर्य्यतोषयत् । देवशर्मा अपि तं सर्ववृत्ता-
न्तमालोक्य विस्मितमना इदमाह—
सो यदि मेरा सतीत्व है और मनसेभी परपुरुषका अभिलाष नहीं
कियाहै तो देवता फिरभी मेरी नासिकाको उसी प्रकारकी अक्षत करदें । अथवा
यदि मेरे चित्तमें परपुरुषकी भ्रान्तिभी हो तो मुझको भस्म करदें”। यह कह फिर
उससे बोली,—“भो दुरात्मन् ! देख मेरे सतीत्वके प्रभावसे फिर वैसीही नासिका
होगई” तब यह दीपक लेकर देखनेलगा तो उसी प्रकारकी उसकी नासिका
और पृथ्वीमें रक्तप्रवाह बहुत देखता भया। तब यह विस्मितमन होकर उस बन्ध-
नसे खोल शय्यामें आरोपणकर सैकडों मनोहर वचनोंसे उसको सन्तुष्ट करता-
हुआ । देवशर्माभी इस सब वृत्तान्तको देखकर विस्मयको प्राप्त होकर यह बोला-
“शम्बरस्य च या माया या माघा नमुचेरपि ।
बलेः कुम्भीनसेश्चैव सर्वास्ता योषितो विदुः ॥ १९४ ॥
“जो शम्बरकी मायाहै, जो नमुचिकी मायाहै, बलि और कुम्भीनसकी जो
मायाहै वे सब माया स्त्रियें जानतीहैं ॥ १९४ ॥
हसन्तं प्रहसन्त्येता रुदन्तं प्ररुदन्त्यपि ।
अप्रियं प्रियवाक्यैश्च गृह्णन्ति कालयोगतः ॥ १९५ ॥
यह हँसते हुएके साथ हँसती, रोते हुएके साथ रोती, समय योगसे अनुरक्त
जनको प्रियवचनोंसे ग्रहण करती हैं ॥ १९५ ॥
उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च वेद बृहस्पतिः ।
स्त्रीबुद्ध्या न विशिष्येत तस्माद्रक्ष्याः कथं हि ताः ॥ १९६॥