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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

( २१० ) पञ्चतन्त्रम् ।

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( २१० ) पञ्चतन्त्रम् ।
जिससे जिस करके जब जैसा जो जितना जहां शुभ अशुभ अपना कर्म
किया है तिससे तिसकरके तब तैसा सो तितना तवतक तहाही कालकी प्रेर-
णासे प्राप्त होता है ॥ २० ॥
तत् प्राप्तं मया एतद्बन्धनं जिह्वालौल्यात् । साम्प्रतं त्वं
सत्वरं पाशविमोक्षं कुरु" । तदाकर्ण्य हिरण्यक आह-
सो यह मुझे बन्धन जिह्वाकी चंचलतासे प्राप्त हुआ है, इस कारण तू शीघ्र
पाश मोक्षण कर" । यह सुनकर हिरण्यक बोला-
“अध्यर्द्धायोजनशतादामिषं वीक्षते खगः ।
सोऽपि पार्श्वस्थितं दैवाद्बन्धनं न च पश्यति ॥ २१ ॥
आधे (अधिक) १५० सो योजनसे जो पक्षी मांसको देखता है वहभी
प्रारब्धसे निकट स्थित हुए बन्धको नहीं देखता है ॥ २१ ॥
तथाच-
तैसेही-
रविनिशाकरयोर्ग्रहपीडनं
गजभुजङ्गविहंगमबन्धनम् ।
मतिमतां च निरीक्ष्य दरिद्रता॑
विधिरहो बलवानिति मे मतिः ॥ २२ ॥
सूर्य चन्द्रभी ग्रहसे पीडित होते हैं, हाथी सर्प पक्षि बन्धनमें पडते हैं, तथा
बुद्धिमानोंको दरिद्र देखकर दैवही बलवान् है यह मेरी बुद्धि है ॥ २२ ॥
तथाच-
औरभी-
व्योमैकान्तविचारिणोऽपि विहगाः सम्प्राप्नुवन्त्यापदं
बध्यन्ते निपुणैरगाधसलिलान्मीनाः समुद्रादपि ।
दुर्णीतं किमिहास्ति किं च सुकृतं कः स्थानलाभे गुणः
कालः सर्वजनान्प्रसारितकरो गृह्णाति दूरादपि ॥ २३ ॥
एकान्त, आकाशमें विचरनेवाले पक्षीभी आपत्तिको प्राप्त होते हैं,
चतुर पुरुषोंद्वारा अगाध जलवाले समुद्रसे मछलीभी बांध ली जाती हैं । इस
संसारमें दुर्नेय क्या है ? सुकृत क्या है ? स्थान लाभमें भी क्या गुण है ? काल
हाथ फैलाये हुए दूरसे सबको ग्रहण करता है ॥ २३ ॥

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भाषाटीकासमेतम् । (२११)
एवमुक्त्वा चित्रग्रीवस्य पाशं छेत्तुमुद्यतं स तमाह-"भद्र
मा मैवं कुरु, प्रथमं मम भृत्यानां पाशच्छेदं कुरु तदनु
ममापि च"। तच्छ्रुत्वा कुपितो हिरण्यकः प्राह-'भो ! न
युक्तमुक्तं भवता यतः स्वामिनोऽनन्तरं भृत्याः"। स आह,-
"भद्र ! मा मैवं वद, मदाश्रयाः सर्वे एते वराकाः, अपरं स्व-
कुटुम्बं परित्यज्य समागताः । तत् कथमेतावन्मात्रमपि
सम्मानं न करोति । उक्तञ्च-
ऐसा कह चित्रग्रीवके पाश छेदन करनेको उद्यत हुए उससे बोला-"भद्र !
ऐसा मतकरो, पहले मेरे भृत्योंके पाश छेदन करो पीछे मेरे भी" यह सुन क्रोध
कर हिरण्यक बोला-"भो ! आपने युक्त नहीं कहा कारण कि, स्वामीके अन-
न्तर भृत्य होते हैं"। वह बोला-"भद्र ! ऐसा मत कहो यह सब क्षुद्र मेरे
वशमें हैं और यह अपना कुटुम्ब त्याग कर मेरे साथ आये हैं । सो कैसे इत-
नाभी इनका सन्मान न करूं। कहा है-
यः सम्मानं सदा धत्ते भृत्यानां क्षितिपोऽधिकम् ।
वित्ताभावेऽपि तं दृष्ट्वा ते त्यजन्ति न कर्हिचित् ॥ २४ ॥
जो राजा भृत्योंका सदा अधिक सन्मान करता है वे धनके अभावमें भी
उसको कभी त्यागन नहीं करते हैं ॥ २४ ॥
तथाच-
और देखो-
विश्वासः सम्पदां मूलं तेन यूथपतिर्गजः ।
सिंहो मृगाधिपत्येऽपि न मृगैः परिवार्यते ॥ २५ ॥
विश्वासही सम्पत्तियोंकी जड है इससेही हाथी यूथपति कहलाता है
सिंह मृगाधिपति होकरभी मृगोंसे परिवारित नहीं होता है ॥ २५ ॥
अपरं मम कदाचित् पाशच्छेदं कुर्वतस्ते दन्तभंगो भवति
अथवा दुरात्मा लुब्धकः समभ्येति । तत् नूनं मम नरकपात
एव । उक्तञ्च-
और फिर कदाचित् मेरे पाश छेदन करनेमें तेरे दात भग होजाय अथवा
यह दुरात्मा लुब्धकही आजाय तो अवश्य मेरा नरकमें पतन होगा । कहा है-