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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
६६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
Page 678Permalink
| ६६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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तब उन दोनोंने उठकर [एकान्तमें] विचार किया। उन्होंने जो कुछ कहा वह कर्म ही कहा, तथा जिसकी प्रशंसा की वह कर्मकी ही प्रशंसा की। वह यह कि पुरुष पुण्यकर्मसे पुण्यवान् होता है और पापकर्मसे पापी होता है, इसके पीछे जारत्कारव आर्तभाग चुप हो गया ॥ १३ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| यत्रास्य पुरुषस्यासम्यग्दर्शिनः शिरःपाण्यादिमतो मृतस्य वागग्निमप्येति, वातं प्राणोऽप्येति चक्षुरादित्यमप्येतीति सर्वत्र सम्बध्यते। मनश्चन्द्रम्, दिशः श्रोत्रम्, पृथिवीं शरीरम्, आकाशमात्मेति, अत्रात्मा अधिष्ठानं हृदयाकाशमुच्यते; स आकाशमप्येति; ओषधीरपियन्ति लोमानि; वनस्पतीनपियन्ति केशाः; अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयत इति पुनरादानलिङ्गम्। <br><br> सर्वत्र हि वागादिशब्देन देवताः परिगृह्यन्ते, न तु करणा- | जिस समय इस सम्यग्ज्ञानहीन शिर एवं हाथ आदि अवयवोंवाले मृत पुरुषकी वाक् अग्निमें लीन हो जाती है, प्राण वायुमें लीन हो जाता है और चक्षु आदित्यमें लीन हो जाता है—इस प्रकार 'अप्येति' इस क्रियापदका सर्वत्र सम्बन्ध है। इसी प्रकार मन चन्द्रमामें, श्रोत्र दिशामें, शरीर पृथिवीमें, आत्मा आकाशमें—'आत्मा' शब्दसे यहाँ उसका आश्रयभूत हृदयाकाश कहा गया है, वह आकाशमें लीन हो जाता है—लोम ओषधिमें लीन हो जाते हैं, केश वनस्पतिमें विलुप्त हो जाते हैं और लोहित तथा शुक्र जलमें स्थापित हो जाते हैं—'निधीयते' यह क्रियापद लोहित और शुक्रके पुनर्ग्रहणको सूचित करनेवाला है [क्योंकि जो वस्तु कहीं स्थापित होती या रक्खी जाती है, उसको पुनः ग्रहण किया जा सकता है]। <br><br> यहाँ वागादिशब्दोंसे सर्वत्र देवता ही ग्रहण किये जाते हैं, मोक्ष होनेसे |