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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

१३५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

Page 1370Permalink
१३५४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

| मर्थः पुंगवस्तदीयं मांसम् ।<br><br>ऋषभस्ततोऽप्यधिकवयास्तदीय-<br><br>मार्षभं मांसम् ॥ १८ ॥ | उसीका गूदा यहां अभीष्ट है। पूर्वोक्त सांडसे भी अधिक अवस्था वाले बैलको ऋषभ कहते हैं, उसके समान शक्तिशाली ओषधिशेषका नाम भी ऋषभ※ है। उसीके गूदे- को यहाँ 'आर्षभ' समझना चाहिये ॥ १ ॥ |


ओषधिका पर्याय माना गया है—'ऋषभ ओषधौ च'। प्रसिद्ध अंग्रेज विद्वान् सर मोनियर विलियम्सने अपने बृहत् संस्कृत-अंग्रेजीकोषमें इसे 'सोम' नामक पौधेका पर्याय माना है।

※ 'ऋषभ' नामक ओषधिका आयुर्वेदके अत्यन्त प्राचीन एवं प्रामाणिक ग्रन्थ 'सुश्रुत-संहिता' के 'सूत्रस्थान' नामक प्रथम खण्डके ३८ वें अध्यायमें (जो द्रव्यसंग्रहणीयाध्याय भी कहलाता है) सैंतीस द्रव्यगणोंके अन्तर्गत उल्लेख हुआ है। 'भावप्रकाश' नामक प्रसिद्ध संग्रह ग्रन्थमें उसका वर्णन इस रूपमें आया है—

जीवकर्षभकौ ज्ञेयौ हिमाद्रिशिखरोद्भवौ ।
रसोतकन्दवत् कन्दौ निःसारौ सूक्ष्मपत्रकौ ॥
................... ऋषभो वृषशृङ्गवत् ।
.............................................॥
ऋषभो वृषभो वीरो विषाणी ब्राह्म इत्यपि ।
जीवकर्षभकौ बल्यौ शीतौ शुक्रकफप्रदौ ।
मधुरौ पित्तदाहघ्नौ काशवातक्षयावहौ ॥

जीवक और ऋषभक, (ऋषभ) नामकी ओषधियाँ हिमालयके शिखरपर उत्पन्न होती हैं। उनकी जड़ लहसुनके सदृश होती है। दोनोंमें ही गूदा नहीं होता, केवल त्वचा होती है; दोनोंमें छोटी-छोटी पत्तियाँ होती हैं। इनमेंसे ऋषभ बैलके सींगकी आकृतिका होता है। इसके दूसरे नाम हैं—वृषभ, वीर, विषाणी, ब्राह्म आदि। जीवक और ऋषभ दोनों ही बलकारक, शीत, वीर्य और कफ बढ़ानेवाले, मधुर, पित्त और दाहका शमन करनेवाले तथा खाँसी एवं वातरोगका नाश करनेवाले हैं।

ऋषभकी प्रसिद्ध अष्टवर्ग नामक ओषधियोंमें गणना है। भावप्रकाशकार लिखते हैं—

जीवकर्षभकौ मेदे काकोल्यौ ऋद्धिवृद्धिके ।
अष्टवर्गोऽष्टभिर्द्रव्यैः कथितश्चरकादिभिः ॥