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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १११५

Page 1129Permalink

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १११५


संस्कृत मूल (शाङ्करभाष्य)हिन्दी अनुवाद
वस्तुनि विद्वान् यत्नमातिष्ठति ।<br><br>‘अङ्के चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत् । इष्टस्यार्थस्य संप्राप्तौ को विद्वान् यत्नमाचरेत्॥’ “सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते” (४। ३३) इति गीतासु । इहापि चैतस्यैव परमानन्दस्य ब्रह्मवित्प्राप्यस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्तीत्युक्तम् । अतो ब्रह्मविदां न कर्मारम्भः ।<br><br>यस्मात् सर्वैषणाविनिवृत्तः स एष नेति नेत्यात्मानमात्मत्वेनोपगम्य तद्रूपेणैव वर्तते, तस्माद् एतमेवंविदं नेति नेत्यात्मभूतम्, उ ह एव एते वक्ष्यमाणे न तरतो न प्राप्नुतः—इति युक्तमेवेति वाक्यशेषः । के ते ? इत्युच्यते—‘अतोऽस्मान्निमित्तात् शरीरधारणादिहेतोः पापम्लिये समझदार व्यक्ति प्रयत्न भी नहीं करता। जैसा कि कहा है—<br>“यदि अपने पास ही शहद मिल जाय तो फिर पर्वतपर किसलिये जाय ? अपने अभीष्ट पदार्थके मिल जानेपर कौन समझदार उसके लिये प्रयास कर सकता है ?” तथा गीतामें कहा है—“हे पार्थ ! सारा-का सारा कर्म ज्ञानमें पूर्णतया समाप्त हो जाता है।” यहाँ भी यही कहा है कि ब्रह्मवेताके प्राप्त करने योग्य इसी परमानन्दके अंशके ही सहारे दूसरे समस्त भूत जीवित रहते हैं। अतः ब्रह्मवेत्ताओंके लिये कर्मके आरम्भकी आवश्यकता नहीं है।<br><br>क्योंकि सम्पूर्ण इच्छाओंसे निवृत्त होकर ‘वह यह आत्मा ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है’ इस प्रकारके आत्माको आत्मरूपसे जानकर तद्रूपसे ही विद्यमान रहता है, अतः इस प्रकार जाननेवाले इस ‘नेति-नेति’ आत्मस्वरूप हुए पुरुषको ये आगे बतलाये जानेवाले दोनों प्राप्त नहीं होते, सो उचित ही है—इस प्रकार ‘इति’ शब्दके आगे ‘युक्तमेव’ यह वाक्यशेष है। वे [प्राप्त न होनेवाले] दो क्या हैं, सो बतलाया जाता है—[पहली बात यह है कि] ‘अतः अर्थात् इस निमित्तसे यानी शरीरधारणादिके