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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १३१

Page 137Permalink

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १३१

भात्येवं ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति य एवं वेद ॥ १६ ॥

फिर मनका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ यह चन्द्रमा हो गया। वह यह अतिक्रान्त चन्द्रमा मृत्युसे परे प्रकाशमान है। इसी प्रकार यह देवता उसका मृत्युसे अतिवहन करती है जो कि इसे इस प्रकार जानता है ॥ १६ ॥

| मनश्चन्द्रमा भाति। यथा पूर्व-यजमानं वागाद्यग्न्यादिभावेन मृत्युमत्यवहत्, एवमेनं वर्तमान-यजमानमपि ह वा एषा प्राण-देवता मृत्युमतिवहति वागाद्य-ग्न्यादिभावेन। एवं यो वागा-दिपञ्चकविशिष्टं प्राणं वेद। “तं यथा यथोपासते तदेव भवति” इति श्रुतेः ॥ १६ ॥ | मन चन्द्रमा होकर प्रकाशित होता है। जिस प्रकार प्राणने पूर्व यजमानको वागादिके अग्न्यादि-भावसे मृत्युसे अतिवहन किया था उसी प्रकार यह प्राणदेवता इस वर्तमान यजमानको भी वागादिके अग्न्यादिभावद्वारा मृत्युसे अतिक्रान्त कर देती है जो कि इस प्रकार प्राणको वागादि पञ्चदेवविशिष्ट जानता है, जैसा कि “उसकी जो जिस प्रकार उपासना करता है तद्रूप ही हो जाता है” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है ॥ १६ ॥ |


प्राणका अन्नाद्यागान

अथात्मनेऽन्नाद्यमागायद्यद्धि किञ्चान्नमध्यतेऽनेनैव तद्यत इह प्रतितिष्ठति ॥ १७ ॥

फिर उसने अपने लिये अन्नाद्यका आगान किया, क्योंकि जो भी कुछ अन्न खाया जाता है, वह प्राणके ही द्वारा खाया जाता है तथा उस अन्नसे प्राण प्रतिष्ठित होता है ॥ १७ ॥