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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५५
Page 1269Permalink
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५५
अपनी श्रेष्ठताके लिये विवाद करते हुए वागादि प्राणोंका ब्रह्माके पास जाना और ब्रह्माद्वारा उसका निर्णय करनेके लिये एक कसौटी बताना
ते हेमे प्राणा अहँश्रेयसे विवदमाना ब्रह्म जग्मुस्तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति तद्धोवाच यस्मिन् व उत्क्रान्त इदँ शरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ इति ॥ ७ ॥
वे ये प्राण 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रकार विवाद करते हुए ब्रह्माके पास गये। उससे बोले 'हममें कौन वसिष्ठ है?' उसने कहा, 'तुममेंसे जिसके उत्क्रमण करनेपर (शरीरसे अलग हो जानेपर) यह शरीर अपनेको अधिक पापी मानता है, वही तुममें वसिष्ठ है ॥ ७ ॥
| ते हेमे प्राणा वागादयोऽहं श्रेयसेऽहं श्रेयानित्येतरस्मै प्रयोजनाय विवदमाना विरुद्धं वदमाना ब्रह्म जग्मुर्ब्रह्म गतवन्तो ब्रह्मशब्दवाच्यं प्रजापतिं गत्वा च तद् ब्रह्म होचुरुक्तवन्तः—को नोऽस्माकं मध्ये वसिष्ठः; कोऽस्माकं मध्ये वसति च वासयति च ?<br><br>तद् ब्रह्म तैः पृष्टं सद्धोवाचोक्तवद् यस्मिन् वो युष्माकं मध्य उत्क्रान्ते निर्गते शरीरादिदं शरीरं पूर्वस्मादतिशयेन पापीयः पापतरं मन्यते लोकः—शरीरं हि नामा- | वे ये वागादि प्राण 'अहं श्रेयसे'—'मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रयोजनके लिये आपसमें विवाद करते हुए—एक दूसरेके विरुद्ध बोलते हुए ब्रह्माके पास गये। अर्थात् ब्रह्मशब्दवाच्य प्रजापतिके पास गये; उन्होंने जाकर उस ब्रह्मासे कहा—'हममें कौन वसिष्ठ है; हममेंसे कौन बसता और बसाता है?'<br><br>उनसे पूछे जानेपर वह ब्रह्मा बोला, 'तुममेंसे जिसके उत्क्रमण करनेपर—शरीरसे निकल जानेपर इस शरीरको लोग पहलेकी अपेक्षा अत्यन्त पापीय—अधिक पापमय (अपवित्र) मानते हैं—यों तो अनेकों अपवित्र वस्तुओंका संघात |