वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७१
न्यायकन्दली
गृहस्थस्य धर्मसाधनम् । भूतेभ्यो बलिप्रदानं भूतयज्ञः । अतिथिपूजनं मनुष्ययज्ञः । होमो
देवयज्ञः । श्राद्धं पितृयज्ञः । ब्रह्मयज्ञो वेदपाठः । एकाग्निविधानेन पाकयज्ञ-
संस्थानामिति । अनुष्ठानम् । एकाग्निरिति औपासनिकः । तस्य विधानं विवाहकाले
परिग्रहः । तेन पाकयज्ञसंस्थानां पाकयज्ञविशेषाणामष्टकापार्वणीचैत्र्याश्वयुज्यादीनां
नित्यानामवश्यकरणीयानां सति सामर्थ्येऽनुष्ठानम् । अग्न्याधेयादीनामिति । अनुष्ठानं
धर्मसाधनम्, अग्न्याधेयशब्देनाग्न्याधानस्याभिधानम्, यद् ब्राह्मणेन वसन्ते क्रियते ।
हविर्यज्ञसंस्था हविर्यज्ञविशेषा दर्शपूर्णमासचातुर्मास्याग्रायणादिका इष्टयः कथ्यन्ते ।
अग्निष्टोमादीति अग्निष्टोमोक्थ्यषोडशीवाजपेयातिरात्राप्तोर्यामाः सप्तसोमयज्ञविशेषाः
सोमयज्ञसंस्था उच्यन्ते । ऋत्वन्तरेष्विति । ऋतुकालादन्यकालेषु ब्रह्मचर्यं व्रतरूपेण स्त्री-
सेवापरिवर्जनं धर्मसाधनम् । अपत्योत्पादनमपि धर्मसाधनम्, पुत्रेण लोकाञ्जयतीति श्रुतेः ।
दूसरों से प्रतिग्रह न लेकर बारी-बारी से प्रत्येक आँगन में भिक्षा माँगने को
'यायावरवृत्ति' कहते हैं। इन दोनों वृत्तियों से ही उपार्जित धन के द्वारा सायङ्काल,
प्रातःकाल और अपराह्नकाल में पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान गृहस्थों के लिए धर्म
का साधन है । काकादि प्राणियों के लिए बलि देने को 'भूतयज्ञ' कहते हैं ।
अतिथियों की पूजा को ही 'मनुष्ययज्ञ' कहते हैं। होम ही 'देवयज्ञ' है । श्राद्ध को
'पितृयज्ञ' कहते हैं । वेदों का पाठ ही 'ब्रह्मयज्ञ' है । 'एकाग्निविधानेन
पाकयज्ञसंस्थानाम्' अर्थात् इनके अनुष्ठान भी गृहस्थों के धर्म के साधन हैं ।
'एकाग्नि' शब्द से औपासनिक अग्नि को समझना चाहिए, जिसका ग्रहण विवाह
के समय किया जाता है । उस अग्नि के द्वारा 'पाकयज्ञसंस्था' के होमों का अर्थात्
अष्टका, पार्वणी, चैत्र्य एवं आश्वयुज्य प्रभृति नित्यकर्मों का अर्थात् अवश्य-
करणीय कर्मों का सामर्थ्य रहने पर जो अनुष्ठान (वे भी धर्म के साधन हैं),
'अग्न्याधेयादीनाम्' अर्थात् अग्न्याधेयादि के अनुष्ठान भी गृहस्थों के धर्म के
साधन हैं । 'अग्न्याधेय' शब्द से अग्नि का आधान समझना चाहिए, जो वसन्त के
समय ब्राह्मणों के द्वारा अनुष्ठित होता है । 'हविर्यज्ञसंस्था' शब्द से विशेष प्रकार
के दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रायण प्रभृति इष्टियाँ कही जाती हैं । 'अग्नि
ष्टोमादीति' अग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम ये
विशेष प्रकार के सात सोमयज्ञ ही 'सोमयज्ञसंस्था' कहलाते हैं । 'ऋत्वन्तरेषु' स्त्री
के ऋतुकाल से भिन्न समय में व्रतरूप से 'ब्रह्मचर्य' का अर्थात् स्त्रीसङ्ग का त्याग
भी धर्म का साधन है । पुत्र को उत्पन्न करना भी धर्म का साधन है; क्योंकि
'पुत्रेण लोकान् जयति' यह श्रुति है ।
६७२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
प्रशस्तपादभाष्यम्
ब्रह्मचारिणो गृहस्थस्य वा ग्रामान्निर्गतस्य वनवासो वल्कलाजिनकेशश्मश्रु-
नखरोमधारणं च, वन्यहुतातिथिशेषभोजनानि वानप्रस्थस्य ।
त्रयाणामन्यतमस्य श्रद्धावतः सर्वभूतेभ्यो नित्यमभयं दत्त्वा, संन्यस्य स्वानि
कर्माणि, यमनियमेष्वप्रमत्तस्य षट्पदार्थप्रसंख्यानाद् योगप्रसाधनं प्रव्रजितस्येति ।
दृष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्यैतानि साधनानि भावप्रसादं चापेक्ष्यात्ममनसोः संयोगाद्
धर्मोत्पत्तिरिति ।
ग्रामों को छोड़कर वनों में रहना, वल्कल, अजिन, केश, दाढ़ी-मूँछ,
नख और रोम इन सबों को धारण करना (कभी त्याग न करना) एवं वनों
के कन्द-मूल फलों एवं होम से और अतिथियों से अवशिष्ट अन्नों का
भोजन करना, ब्रह्मचर्याश्रम और गृहस्थाश्रम दोनों में से किसी भी आश्रम
से वानप्रस्थ लिए हुए सभी जनों के लिए विशेष धर्म के साधन हैं ।
ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थाश्रम इन तीनों में से किसी
भी आश्रम से कोई भी श्रद्धाशील पुरुष (जब) सभी प्राणियों को सदा
के लिए अपनी ओर से अभय देकर अपने (और) सभी कर्मों से छूट
जाते हैं, फिर भी यमनियमादि का बिना प्रमाद के पालन करते रहते
हैं, (वे ही) परिव्राजक (कहलाते हैं) उनके लिए (इस शास्त्र में वर्णित)
षट् पदार्थों के तत्त्वज्ञान के द्वारा योग का अनुष्ठान ही विशेष धर्म का
साधन है । धर्म के ये साधन (लाभ-पूजादि) दृष्ट प्रयोजनों के बिना
अनुष्ठित होने के बाद विशुद्ध अभिप्राय की सहायता से आत्मा और
मन के संयोग के द्वारा धर्म को उत्पन्न करते हैं ।
न्यायकन्दली
वानप्रस्थस्य धर्मसाधनं कथयति-ब्रह्मचारिणो गृहस्थस्य वेति । "यदहरे-
वास्य श्रद्धा भवति तदहरेवार्यं प्रव्रजेत्" इति श्रवणात् सति श्रद्धोपनये ब्रह्म-
चारिणो वनवासो भवति । गृहस्थस्य वा तस्य वानप्रस्थव्रतमाचरतो वल्क-
लाजिनकेशश्मश्रुनखरोमधारणम्, वन्यस्य फलमूलस्य भोजनं हुतशेषभोजनम्,
'ब्रह्मचारिणो गृहस्थस्य वा' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा वानप्रस्थाश्रमियों के
धर्म के साधन कहे गये हैं । 'यदहरेवास्य श्रद्धा भवति तदहरेवार्यं प्रव्रजेत्'
ऐसी श्रुति है, तदनुसार उपयुक्त श्रद्धा के उत्पन्न होने पर ब्रह्मचर्याश्रम से भी
सीधे वानप्रस्थाश्रम में जा सकता है, इसी अभिप्राय से 'ब्रह्मचारिणः' ऐसा
कहा गया है । 'गृहस्थस्य वा' अर्थात् यदि गृहस्थ वानप्रस्थाश्रमी हो जाय
तो 'वल्कलाजिनकेशश्मश्रुनखरोमधारणम्' अर्थात् वल्कल और अजिन का
परिधान एवं केश और दाढ़ी-मूंछों का रखना ये सभी गृहस्थ-वानप्रस्थाश्रमियों
के धर्म के समान हैं । एवं 'वन्य' जो फल-मूल उसका भोजन, होम से बचे हुए
हवि का भोजन एवं अतिथि को देकर उससे बचे हुए अन्न का भोजन (वान-
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६७३
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६७३
न्यायकन्दली
अतिथिशेषभोजनं च धर्मसाधनम्। यः प्राजापत्यामिष्टिं निरूप्य सर्वस्वं दक्षिणां दत्वात्मन्यग्निं
समाधाय पुत्रे भार्या निक्षिप्य प्रव्रजितः, न तस्य होमो न तस्यातिथिपरिग्रहः। यस्तु सह
पत्न्या सहैवाग्निना वनं प्रस्थितः, तस्य हुतशेषभोजनमतिथिशेषभोजनं च धर्मसाधनम्।
यतिधर्मं निरूपयति-त्रयाणामिति। यत्याश्रमपरिग्रहेऽपि नियमो नास्ति, श्रद्धोपगमे
सति ब्रह्मचार्येव यतिर्भवति, गृहस्थो वा भवति, वानप्रस्थो वेत्यनेनाभिप्रायेणोक्तं
त्रयाणामन्यतमस्येति । श्रद्धावतः चित्तप्रसादवतः सर्वभूतेभ्यो नित्यमभयं दत्त्वा भूतानि
मया न जातु हिंसितव्यानीति अद्रोहसङ्कल्पं गृहीत्वा, स्वानि कर्माणि काम्यानि संन्यस्य
परित्यज्य यमनियमेष्वप्रमत्तस्य। अहिंसा-सत्यादयो यमाः। यथाह भगवान् पतञ्जलिः-
"अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः" इति। तपःशौचादयस्तु नियमाः। यथाह स एव
भगवान्-"शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः" इति । न्यायभाष्यकारस्तु
प्रत्याश्रमं विशिष्टं धर्मसाधननियममाह। तेष्वप्रमत्तस्य ताननतिक्रमतः। षट्पदार्थ-
प्रस्थियों के) धर्म के साधन हैं। जो गृहस्थ प्राजापत्य नाम की इष्टि करके अपने
सर्वस्व को दक्षिणा रूप में देकर एवं पत्नी का भार पुत्र को सौंप कर वानप्रस्थ
को ग्रहण करते हैं, उनके लिए होम और अतिथि की सेवा निर्दिष्ट नहीं है (अतः
उनके लिए ये दोनों धर्म के साधन नहीं हैं)। जो पत्नी और अग्नि को साथ
लेकर ही वानप्रस्थाश्रम को ग्रहण करते हैं, उनके लिए ही होम से बचे हुए हवि
का भोजन और अतिथि से बचे हुए अन्न का भोजन ये दोनों धर्म के साधन हैं।
'त्रयाणाम्' इत्यादि ग्रन्थ से यतियों (संन्यासियों) के धर्म का निरूपण करते हैं ।
संन्यासाश्रम ग्रहण करने का भी कोई नियम नहीं है (कि किस आश्रम से संन्यास
ग्रहण करे); क्योंकि उपयुक्त श्रद्धा के रहने पर ब्रह्मचारी, गृहस्थ ये दोनों ही
संन्यास ले सकते हैं । वानप्रस्थाश्रमी तो ले ही सकते हैं, इसी नियम को दृष्टि में
रखकर लिखा गया है कि 'त्रयाणामन्यतमस्य' । 'श्रद्धावतः' चित्त प्रसाद से युक्त
पुरुष के लिए 'सर्वभूतेभ्यो नित्यमभयं दत्त्वा' अर्थात् 'मुझसे किसी प्राणी की हिंसा
न हो' इस प्रकार से अद्रोह का संकल्प करके 'स्वानि कर्माणि' अर्थात् अपने काम्य
कर्मों को 'संन्यस्य' अर्थात् छोड़कर 'यमनियमेष्वप्रमत्तस्य' इनमें अहिंसा, सत्य
प्रभृति 'यम' कहलाते हैं। जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने कहा है कि-अहिंसा, सत्य,
अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (ये पाँच) 'यम' हैं। प्रकृत में 'नियम' शब्द से तपस्या,
शौच प्रभृति इष्ट हैं। जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने ही कहा है कि-शौच, सन्तोष,
तपस्या, स्वाध्याय और ईश्वर का प्रणिधान (ये पाँच) 'नियम' हैं । न्यायभाष्यकार
ने प्रत्येक आश्रम के लिए निर्दिष्ट धर्म के नियमित अनुष्ठान को ही नियम बतलाया
है । 'तेष्वप्रमत्तस्य' अर्थात् यम और नियम के विरुद्ध आचरण न करनेवाले
६७४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
न्यायकन्दली
प्रसंख्यानात् षष्णां पदार्थानां तत्त्वज्ञानाद् योगस्यात्मज्ञानोत्पादनसमर्थस्य समाधिविशेषस्य
प्रसाधनमुत्पादनं प्रव्रजितस्य धर्मसाधनम् । यथैतानि धर्मं साधयन्ति, तथा कथयति-दृष्टं
चेति । लाभपूजादिप्रयोजनमनुद्दिश्यानभिसन्धाय यदैतानि साधनानि क्रियन्ते, तदैतानि
साधनानि भावप्रसादं चाभिप्रायविशुद्धिं चापेक्ष्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्मोत्पत्तिरिति ।
प्रत्यहं दुःखैरभिहन्यमानस्य तत्त्वतो विज्ञातेषु दुःखनिदानेषु विषयेषु विरक्तस्यात्यन्तिकं
दुःखवियोगमिच्छतः "आत्मख्यातिर्विप्लवा हानोपायः", "तस्याश्च समाधिविशेषो
निबन्धनम्" इति श्रुतवतः "संन्यस्य सर्वकाम्यकर्माणि समाधिमनुतिष्ठामः"
तत्प्रत्यनीकभूयिष्ठं ग्रामं परित्यज्य वनमाश्रितस्य यमनियमाभ्यां कृतात्मसंस्कारस्य
समाध्यभ्यासान्निवर्तको धर्मो जायते । तस्मादस्य प्रकृष्टः समाधिस्ततोऽन्यः प्रकृष्टतरो
धर्मः, तस्मादप्यन्यः प्रकृष्टतमः समाधिरित्यनेन क्रमेणान्ये जन्मनि स तादृशः समाधिविशेषः
पुरुषों के लिए ये आचरण धर्म के साधन हैं । 'षट्पदार्थप्रसंख्यानात्' द्रव्यादि छः
पदार्थों के तत्त्वज्ञान के द्वारा योग का अर्थात् आत्मज्ञान में पूर्ण क्षम विशेष प्रकार
के समाधि का जो उत्पादन वह 'प्रव्रजितों' के लिए धर्म का साधन है । 'दृष्टञ्च'
इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा यह उपपादन करते हैं कि ये साधन किस प्रकार धर्म का
सम्पादन करते हैं । अर्थात् 'दृष्ट' लाभ पूजादि प्रयोजनों का उद्देश्य न रखकर
जब यम-नियमादि साधनों का अनुष्ठान किया जाता है, उस समय ये साधन
'भावशुद्धि' अर्थात् अभिप्राय की विशुद्धि के साहाय्य से आत्मा और मन के
संयोग के द्वारा धर्म का उत्पादन करते हैं ।
जिस पुरुष का चित्त दुःखों से प्रतिदिन अभिहत होता रहता है, उसे यदि
दुःखों के कारणीभूत विषय यथार्थ रूप से ज्ञात हो जाते हैं, तो फिर उन विषयों
से उसे वैराग्य हो जाता है । ऐसा पुरुष दुःखों से सदा के लिए छूटने की इच्छा
करता है । (अन्वेषण करने पर) उसे यह ज्ञात होता है कि 'आत्मा का तत्त्वज्ञान
ही दुःख के आत्यन्तिक निवृत्ति का अव्यर्थ साधन है एवं वह तत्त्वज्ञान विशेष
प्रकार की 'समाधि' से ही प्राप्त हो सकता है । तो फिर सभी काम्य कर्मों का
त्याग कर 'मैं समाधि का ही अनुष्ठान करूँ' वह ऐसा संकल्प करता है । फिर
समाधि के अधिकतर विघ्नों से युक्त होने के कारण वह ग्राम को छोड़ देता है
और वन का आश्रय ले लेता है । ऐसा पुरुष यम और नियम से आत्मा को
सुसंस्कृत कर लेता है । ऐसी स्थिति में जब वह समाधि का अभ्यास करता है, तो
उससे (संसार को निवृत्त करनेवाले) निवर्तक धर्म की उत्पत्ति होती है । इस
निवर्तक धर्म के द्वारा पहले की समाधि से उत्कृष्ट समाधि की उत्पत्ति होती है ।
इस उत्कृष्ट समाधि से उत्पन्न निवर्तक धर्म से उत्कृष्टतर निवर्तक धर्म की उत्पत्ति
होती है । इस उत्कृष्ट निवर्तक धर्म से उत्कृष्टतम समाधि की उत्पत्ति होती है, इस
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६७५
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६७५
न्यायकन्दली
परिणमति, यो द्वन्द्वैर्नाप्यभिभवितुं न शक्यते । दृष्टो हि कश्चिदभिमतं विषय-
मादरेणानुचिन्तयतस्तदेकाग्रीभूतचित्तस्य सन्निहितेषु प्रबलेष्वपि विषयेषु सम्बाधः, यथेषु-
कार इषौ लब्धलक्ष्याभ्यासो गच्छन्तमपि राजानं न बुद्धयते । तथा च भगवान् पतञ्जलिः -
'अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः' इति । एवं परिणते समाधावात्मस्वरूपसाक्षात्कारि-
विज्ञानमुदेति । यदाहुः कापिलाः -
एवं तत्त्वाभ्यासान्नास्मि न मे नाहमित्यपरिशेषम् ।
अविपर्ययाद् विशुद्धं केवलमुत्पद्यते ज्ञानम् ॥ इति ।
.अत आत्मज्ञानार्थिना यतिना योगसाधनमनुष्ठीयते । ज्ञानं ज्ञेयादि-
प्राप्तिमात्रफलम्, श्रौतात्मज्ञानेनाप्यात्मस्वरूपं प्राप्यते; किमस्य ध्यानाभ्यासात्
प्रत्यक्षीकरणेनेति चेत् ? न, परोक्षस्य प्रत्यक्षसाधने सामर्थ्याभावात् ।
स्वरूपतस्तावदात्मा न कर्त्ता, न भोक्ता, किन्तुदासीन एव । तत्र देहे-
प्रकार अन्तिम जन्म में वह समाधि इतनी उत्कृष्टता को प्राप्त कर लेती है कि वह
पुरुष (शीतोष्ण रूप) द्वन्द्व से भी अभिभूत नहीं होता । यह तो सांसारिक इष्ट
विषय को आदर के साथ चिन्तन करते हुए पुरुषों में भी देखा जाता है कि
अत्यन्त समीप के प्रबल विषयों को भी वे नहीं देख पाते हैं । जैसे कि तीर का
अभ्यास करता हुआ पुरुष आगे से जाते हुए राजा को भी नहीं देख पाता है ।
जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने कहा है कि 'अभ्यास और वैराग्य इन दोनों से
चित्तवृत्तिरूप योग निष्पन्न होता है ।' इस प्रकार जब समाधि का परिपाक हो
जाता है, तब उससे आत्मा का साक्षात्काररूप विज्ञान उदित होता है । जैसा कि
सांख्य शास्त्र के आचार्यों ने कहा है कि-
"इस तत्त्व के अभ्यास से 'ये विषय मेरे नहीं हैं, मैं इन विषयों से सम्बद्ध
नहीं हूँ' इस आकार का विपर्ययरहित केवल (प्राकृत विषयों से असम्बद्ध) आत्मा
का ज्ञान होता है ।" यही कारण है कि आत्मज्ञान की इच्छा से यति लोग योग
का अभ्यास करते हैं । (प्र.) ज्ञान का तो एकमात्र यही फल है कि उससे ज्ञेय
विषय की प्राप्ति हो । श्रुति के द्वारा जो आत्मा का ज्ञान होता है, उससे भी
उसके विषय आत्मा के स्वरूप की प्राप्ति तो होगी ही, फिर ध्यान और अभ्यास
के द्वारा आत्मा को प्रत्यक्ष करने की क्या आवश्यकता है ? (उ.) यतः
प्रत्यक्षात्मक ज्ञान से ही सांसारिक विषयों का प्रत्यक्षरूप मिथ्याज्ञान निवृत्त हो
सकता है । श्रुति से उत्पन्न आत्मा का ज्ञान परोक्ष है, अतः आत्मा के प्रत्यक्ष की
आवश्यकता होती है; जिसके लिए ध्यान और अभ्यास की पूरी आवश्यकता है ।
आत्मा तो स्वयं उदासीन है, न वह कर्त्ता है, न भोक्ता । उसमें जब शरीर, इन्द्रिय
प्रभृति विषयों का सम्बन्ध होता है, तभी उसे 'अहं कर्त्ता, अहं भोक्ता' इत्यादि
ज्ञान होने लगते हैं, वे 'जो जहाँ नहीं है वहीं तद्विशेषणक' होने के कारण
मिथ्याज्ञान होते हैं । इस मिथ्याज्ञान से ही अनुकूल विषयों में राग और प्रतिकूल
विषयों में द्वेष उत्पन्न होता है । राग और द्वेष इन दोनों से ही क्रमशः प्रवृत्ति और
निवृत्ति उत्पन्न होती है ।
६७६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
न्यायकन्दली
न्द्रियसम्बन्ध्याद्युपाधिकृतोऽहं ममेति-कर्तृत्वभोक्तृत्वप्रत्ययो मिथ्याऽतस्मिंस्तदिति भावात् ।
एतत्कृतश्चानुकूलेषु रागः प्रतिकूलेषु द्वेषः, ताभ्यां प्रवृत्तिनिवृत्ती, ततो धर्माधर्मौ, ततश्च
संसारः । यथोक्तं सौगतैः -
आत्मनि सति परसंज्ञा स्वपरविभागात् परिग्रहद्वेषौ ।
अनयोः सम्प्रतिबद्धाः सर्वे भावाः प्रजायन्ते ॥
अनादिवासनावासित इति प्रबलो निसर्गबद्धः सर्वः सांव्यवहारिकः प्रत्यक्षेणैवैष
प्रत्ययः । श्रौतमात्मतत्त्वज्ञानं क्षणिकमनुपलब्धसंवादं परोक्षं च । न च दृढतरः प्रत्यक्षाव-
भासः परोक्षाभासेन शक्यते निषेद्धुम् । न हि शतशोऽपि प्रमाणान्तरावगते गुडस्य माधुर्ये
दुष्टेन्द्रियजः तिक्तप्रतिभासस्तत्कृतश्च दुःखावगमो निवर्तते, तस्मात् प्रत्यक्षज्ञानार्थं समाधि-
रुपासितव्यः । प्रचिते समाधौ तत्सामर्थ्यात् कर्तृत्वभोक्तृत्वपरिपन्थिन्यात्मतत्त्वे स्फुटीभूते
समाने विषये विद्याविद्ययोर्विरोधादहङ्कारममकारवासनानोच्छेदे सन्नपि प्रपञ्चो नात्मानं
स्पृशति । तथा च कापिलैरुक्तम्-
तेन निवृत्तप्रसवामर्थवशात् सप्तरूपविनिवृत्ताम् ।
प्रकृतिं पश्यति पुरुषः प्रेक्षकवदवस्थितः स्वस्थः ॥
विहित विषयों में प्रवृत्ति से धर्म और निषिद्ध विषयों में प्रवृत्ति से अधर्म एवं
विहित विषयों की निवृत्ति से अधर्म और निषिद्ध विषयों की निवृत्ति से धर्म की
उत्पत्ति होती है । धर्म और अधर्म इन्हीं दोनों से संसार की उत्पत्ति होती है ।
जैसा बौद्धों ने भी कहा है कि-
आत्मा को सत्ता मान लेने पर ही 'पर' इस नाम का व्यवहार होता है ।
'स्व' और 'पर' का जो यह व्यवहार है, उसी से राग और द्वेष उत्पन्न होता है ।
धर्माधर्मादि सभी भाव राग और द्वेष इन्हीं दोनों के साथ सम्बद्ध हैं ।
अनादि वासना से वासित होने के कारण ये सभी स्वाभाविक मिथ्याप्रत्यय
संवृति (अविद्या) से उत्पन्न होते हैं एवं वे प्रत्यक्षात्मक हैं । श्रुति से जो आत्मा
का क्षणिक ज्ञान होता है, उसका प्रमात्व निर्णीत नहीं है एवं वह परोक्ष भी
है । अतः उससे दृढ़तर एवं प्रत्यक्षात्मक मिथ्याज्ञान की निवृत्ति नहीं हो
सकती । जिस पुरुष की जिह्वा में दोष आ गया है, उसे यदि सैकड़ों प्रमाणों
से गुड़ की मधुरता को समझावें, उससे उसे जो गुड़ में तिक्तता का भान है
एवं इस भान से जो दुःख होता है, इन दोनों से वह छूट नहीं सकता । तस्मात्
आत्मा के प्रत्यक्ष के लिए समाधि की पूरी आवश्यकता है । इस प्रकार समाधि
की वृद्धि हो जाने पर, उसके सामर्थ्य से (बन्धन के प्रयोजक) कर्त्तृत्व
और भोक्तृत्व के विरोधी आत्मतत्त्व का स्फुट प्रतिभास होता है । तद्विषयक
मिथ्या-ज्ञान (अविद्या) और तद्विषयक यथार्थज्ञान (विद्या) ये दोनों परस्पर विरोधी
हैं, अतः आत्मविषयक तत्त्वज्ञानरूप विद्या की उत्पत्ति हो जाने पर आत्मा
के कर्त्तृत्व-भोक्तृत्वादि रूप से जितने भी मिथ्याज्ञान एवं तज्जनित वासनायें
रहती हैं, वे सभी नष्ट हो जाती हैं, जिससे प्रपञ्च की (किसी प्रकार की) सत्ता
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७७
प्रशस्तपादभाष्यम्
अधर्मोऽप्यात्मगुणः । कर्तुरहितप्रत्यवायहेतुरतीन्द्रियोऽ-
न्त्यदुःखसंविज्ञानविरोधी । तस्य तु साधनानि शास्त्रे प्रतिषिद्धानि
अधर्म भी आत्मा का ही गुण है । वह (अधर्माचरण करनेवाले) कर्त्ता
के दुःख और दुःख के साधनों का कारण है। वह अतीन्द्रिय है। एवं अन्तिम
दुःख और तत्त्वज्ञान इन दोनों से उसका नाश होता है । शास्त्रों में निषिद्ध
न्यायकन्दली
तेन तत्त्वज्ञानेन सता निवृत्तप्रसवां निवृत्तोपभोगजननसामर्थ्याज् ज्ञानधर्मवैराग्यैश्वर्याधर्मा-
ज्ञानावैराग्यानैश्वर्येभ्यः सप्तरूपेभ्यो विनिवृत्तां प्रकृतिं पुरुषः प्रेक्षकवदुदासीनः स्वस्थो
रजस्तमोवृत्तिकलुषतया बुद्ध्या असम्भिन्नः पश्यतीत्यर्थः । यद्यप्यनादिरियं मोहवासना
आदिमांश्च तत्त्वसाक्षात्कारः, तथाप्यनेन सा निरुद्ध्यते, तत्त्वावग्रहो हि धियां परमं
बलम् ।
अधर्मोऽप्यात्मगुणः । न केवलं धर्मोऽधर्मोऽप्यात्मगुणः । कर्तुरिति । कर्तुरहितं
दुःखसाधनम्, प्रत्यवायो दुःखम्, तयोरधर्मो हेतुः । अन्त्यदुःखसंविज्ञानेति ।
अन्त्यस्य दुःखस्य सम्यग् विज्ञानं तेन विनाश्यते । तस्य साधनानि
शास्त्रे प्रतिषिद्धानि धर्मसाधनविपरीतानि हिंसानृतस्तेयादीनि । हिंसा परा-
रहने पर भी आत्मा को वे छू नहीं सकते । जैसा सांख्यशास्त्र के आचार्यों ने 'तेन
निवृत्तप्रसवाम्' इत्यादि आर्या के द्वारा कहा है कि-'तेन' अर्थात् उस तत्त्वज्ञान से
'निवृत्तप्रसवाम्' उपभोग के सामर्थ्य से रहित प्रकृति 'अर्थवशात्' पुरुष के अपवर्ग
रूप प्रयोजन से वशीभूत होकर 'सप्तरूप विनिवृत्ति' को प्राप्त होती है, अर्थात्
ज्ञान, अज्ञान, धर्म, अधर्म, वैराग्य, अवैराग्य, ऐश्वर्य और अनैश्वर्य इन
अष्टविध भावों में से ज्ञान को छोड़कर सृष्टिजनक अज्ञानादि सातों प्रकार के
भावों से निवृत्त हो जाती है । इसी प्रकार की प्रकृति को 'पुरुष' प्रेक्षक की तरह
अर्थात् उदासीन की तरह 'स्वस्थ' होकर अर्थात् रजोगुण और तमोगुण की कलुषित
वृत्तियों से सर्वथा असम्बद्ध रहकर देखता है । यद्यपि यह ठीक-सा लगता है कि
मिथ्याज्ञानरूप मोहरूप वासना अनादि है और तत्त्वज्ञान उत्पत्तिशील है (अतः
वासना ही बलवती है), फिर भी सादि भी तत्त्वज्ञान से अनादि मिथ्याज्ञान का
नाश होता है; क्योंकि तत्त्व का ग्रहण करना ही ज्ञानों का सबसे बड़ा बल है ।
'अधर्मोऽप्यात्मगुणः' अर्थात् केवल धर्म ही आत्मा का गुण नहीं है, किन्तु अधर्म
भी आत्मा का गुण है (इसी अर्थ की अभिव्यक्ति प्रकृत वाक्य के 'अपि' शब्द
से हुई है) । 'कर्तुरिति' कर्त्ता का जो 'अहित' अर्थात् दुःख का साधन एवं
प्रत्यवाय अर्थात् दुःख, अधर्म इन दोनों का 'हेतु' है । 'अन्त्यदुःखसंविज्ञानेति'
अन्त्य अर्थात् अन्तिम दुःख और 'संविज्ञान' अर्थात् सम्यग्विज्ञान अर्थात्
तत्त्वज्ञान इन दोनों से अधर्म का विनाश होता है । 'तस्य तु साधनानि
शास्त्रे प्रतिषिद्धानि धर्मसाधनविपरीतानि हिंसानृतस्तेयादीनि' दूसरों के
६७८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
प्रशस्तपादभाष्यम्
धर्मसाधनविपरीतानि हिंसानृतस्तेयादीनि । विहिताकरणं प्रमादश्चैतानि दुष्टाभि-
सन्धिं चापेक्ष्यात्ममनसोः संयोगादधर्मस्योत्पत्तिः ।
अविदुषो रागद्वेषवतः प्रवर्त्तकाद् धर्मात् प्रकृष्टात् स्वल्पा-
धर्मसहिताद् ब्रह्मेन्द्रप्रजापतिपितृमनुष्यलोकेष्वाशयानुरूपैरिष्टशरीरे-
न्द्रियविषयसुखादिभिर्योगो भवति । तथा प्रकृष्टादधर्मात् स्वल्पधर्म-
एवं धर्म साधन के विरोधी हिंसा, असत्य प्रभृति इसके साधन हैं ।
शास्त्रों में अनुष्ठान के लिए निर्दिष्ट कामों को न करना एवं प्रमाद ये
दोनों भी अधर्म के हेतु हैं । (अधर्म के) ये सभी हेतु एवं कर्ता के दुष्ट
अभिप्राय इन सबों की सहायता से आत्मा और मन के संयोग के द्वारा
अधर्म की उत्पत्ति होती है ।
प्रवृत्तिजनक उत्कृष्ट धर्म के द्वारा थोड़े से अधर्म की सहायता से
ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक, प्रजापतिलोक, पितृलोक एवं मनुष्यलोक में उपयुक्त
भोग के अनुरूप इन्द्रिय, विषय एवं सुखादि के साथ तत्त्वज्ञान से रहित एवं
राग और द्वेष से युक्त पुरुष का सम्बन्ध होता है । इसी प्रकार थोड़े से
न्यायकन्दली
भिद्रोहः । अनृतं मिथ्यावचनम् । स्तेयमशास्त्रपूर्वं परस्वग्रहणम् । एवमादीनि
धर्मसाधनविपरीतानि शास्त्रे प्रतिषिद्धानि यानि, तान्यधर्मसाधनानि । विहिताकरणं
विहितस्यावश्यंकरणीयस्याकर्त्तव्यता । प्रमादोऽबुद्धिपूर्वकोऽतिक्रमः, एतदपि द्वयमधर्मसाध-
नम् । यथैतेभ्यो धर्मस्योत्पत्तिस्तद् दर्शयति-एतानीति । यत्र कामनापूर्वकमधर्मसाधनानुष्ठानं
तत्र दुष्टोऽभिसन्धिरधर्मकारणम् । अकामकृते तु प्रमादेनास्य हेतुत्वम् ।
साथ अभिद्रोह करना ही 'हिंसा' है । मिथ्याभाषण ही 'अनृत' शब्द का अर्थ है ।
शास्त्रों में कहे हुए उपायों से विपरीत उपायों के द्वारा दूसरे के धन का ग्रहण
करना ही 'स्तेय' है । धर्म के साधनों के विरुद्ध एवं शास्त्रों से निषिद्ध जो हिंसादि
उपाय हैं, वे ही अधर्म के साधन हैं । शास्त्रों के द्वारा अवश्य करने के लिए
निर्दिष्ट कर्मों का न करना ही 'विहिताकरण' है । अनजान में शास्त्रीय मर्यादा के
अतिक्रम को ही 'प्रमाद' कहते हैं । (विहिताकरण और प्रमाद) ये दोनों भी अधर्म
के साधन हैं । 'एतानि' इस वाक्य के द्वारा इन साधनों के द्वारा किस रीति से
अधर्म की उत्पत्ति होती है ? वह दिखलायी गयी हैं । जहाँ किसी कामना के
वशीभूत होकर अधर्म के साधनों का अनुष्ठान किया जाता है, वहाँ 'दुष्टाभि-
सन्धि' अधर्म का कारण है । जहाँ अधर्म के साधनों का अनुष्ठान अनजाने होता
है, वहाँ प्रमाद के द्वारा उन साधनों में हेतुता आती है ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७९
प्रशस्तपादभाष्यम्
सहितात् प्रेततिर्यग्योनिस्थानेष्वनिष्टशरीरेन्द्रियविषयदुःखादिभिर्योगो भवति। एवं
प्रवृत्तिलक्षणाद् धर्मादधर्मसहिताद् देवमनुष्यतिर्यङ्नारकेषु पुनः पुनः संसारबन्धो
भवति ।
धर्म से युक्त बड़े अधर्म से प्रेत, तिर्यग्योनि में भोग के उपयुक्त शरीर,
इन्द्रिय, विषय और दुःख के साथ (उक्त पुरुष का) सम्बन्ध होता है।
इसी प्रकार थोड़े से अधर्म से युक्त प्रवृत्तिस्वरूप धर्म के द्वारा देव,
तिर्यग्योनि एवं नारकीय शरीरों के सम्बन्ध से जीव को बार-बार संसार
रूप बन्धन मिलता है।
न्यायकन्दली
एवमधर्मस्य साधनमभिधाय सम्प्रति साध्यं कथयति-अविदुष इत्यादिना। यः
कर्त्ता भोक्तास्तीत्यात्मानमभिमन्यते, परमार्थतो दुःखसाधनं च बाह्याध्यात्मिकविषयं
सुखसाधनमित्यभिमन्यते सोऽविद्वान्। स च स्वोपभोगतृष्णापरिप्लुतः सुखसाधन-यारोपिते
विषये रज्यते, तद्विरोधिनि च द्विष्टो भवति। तस्य प्रवर्त्तकाद् धर्माद् देवो वा स्यां
गन्धर्वो वा स्यामिति पुनर्भवप्रार्थनया कृताद् धर्मात् प्रकृष्टात् फलातिशयहेतोराशयानुरूपैः
कर्मानुरूपैरिष्टशरीरादिभिः सम्बन्धो भवति, ब्रह्मेन्द्रादिस्थानेऽपि मात्रया
दुःखसम्भेदोऽस्ति । न चाधर्मादन्यद् दुःखसंभेदोऽस्ति। न चाधर्मादन्यद् दुःखस्य
कारणमतः स्वल्पाधर्मसहितादित्युक्तम् । यस्य प्रकृष्टो धर्मस्तस्य प्रकृष्टानि
शरीरादीनि भवन्ति, यस्य प्रकृष्टतरो धर्मः, तस्य प्रकृष्टतराणि भवन्ति,
उक्त सन्दर्भ के द्वारा अधर्म के साधनों को कहने के बाद 'अविदुष' इत्यादि
सन्दर्भ के द्वारा अधर्म से होनेवाले कार्यों का निरूपण करते हैं। 'अविद्वान्' उस
(मूढ़) पुरुष को कहते हैं, जो अपने को ही कर्त्ता और भोक्ता समझता है एवं
दुःखों के बाह्य एवं आन्तरिक साधनों को सुखों का साधन समझता है। वह
(अविद्वान् पुरुष) अपनी उपभोग की तृष्णा के वशीभूत होकर दुःख के जिन
साधनों को सुख का साधन समझता है, उन विषयों में अनुरक्त हो जाता है और
उसके विरोधी विषयों के साथ द्वेष रखने लगता है। 'प्रवर्त्तकाद्धर्मात्' अर्थात् 'मैं
देव हो जाऊँ, मैं गन्धर्व हो जाऊँ' इस प्रकार की हेतुभूत पुनर्जन्म की वासना से
किये गये प्रवर्त्तक एवं उत्कृष्ट फलों के हेतु उत्कृष्ट धर्म के द्वारा (कुछ अधर्म की
सहायता से) आशय के अनुरूप अर्थात् पहले किए हुए कर्म के अनुरूप अभीष्ट
शरीरादि के साथ वह जीव सम्बद्ध होता है। ब्रह्मा प्रभृति के शरीर धारण करने
पर भी थोड़ा-सा दुःख का सम्बन्ध रहता ही है। बिना अधर्म के दुःख का
अनुभव नहीं होता एवं अधर्म को छोड़कर दुःख का भी कोई दूसरा (असाधारण)
कारण नहीं है, अतः 'स्वल्पाधर्मसहितात्' यह वाक्य जोड़ा गया है। 'आश-
यानुरूपैः' यह वाक्य इस तारतम्य को समझाने के लिए लिखा गया है कि जिसका
धर्म उत्कृष्ट रहता है, उसे उत्कृष्ट शरीर मिलता है, जिसका धर्म उससे उत्कृष्टतर
६८० न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
प्रशस्तपादभाष्यम्
ज्ञानपूर्वकात्तु कृतादसङ्कल्पितफलाद् विशुद्धे कुले जातस्य
दुःखविगमोपायजिज्ञासोराचार्यमुपसङ्गम्योत्पन्नषट्पदार्थतत्त्वज्ञानस्याज्ञाननिवृत्तौ
विरक्तस्य रागद्वेषाद्यभावात् तज्जयोधर्माधर्मयोरनुत्पत्तौ
ज्ञानपूर्वक किये हुए निष्काम कर्मों के अनुष्ठान के द्वारा उत्पन्न धर्म से
जीव विशुद्ध कुल में जन्म लेता है । इससे पुरुष को दुःख की आत्यन्तिक
निवृत्ति के उपाय को जानने की इच्छा उत्पन्न होती है । इस जिज्ञासा से
प्रेरित होकर वह आचार्य के चरणों में बैठकर उनसे षट् पदार्थों के तत्त्व-
ज्ञान का लाभ करता है । जिससे अज्ञान निवृत्ति के द्वारा उसे वैराग्य
न्यायकन्दली
यस्य प्रकृष्टतमो धर्मस्तस्य प्रकृष्टतमानीति प्रतिपादयितुमाशयानुरूपैरित्युक्तम् । इष्टशब्दः
प्रत्येकं शरीरादिषु सम्बद्ध्यते, द्वन्द्धानन्तरं प्रयोगात् । तथा प्रकृष्टादधर्मात् प्रेतयोनीनां
तिर्यग्योनीनां च स्थानेष्वनिष्टैः शरीरादिभिर्योगो भवति । प्रेतादिस्थानेऽपि मनाक् सुख-
मस्ति, तच्च धर्मस्य कार्यम्, अतः स्वल्पधर्मसहितादित्युक्तम् । उपसंहरति-एवमिति ।
एवं धर्मात् संसारं प्रतिपाद्यापवर्गं प्रतिपादयति-ज्ञानपूर्वकात्त्विति । "स्वरूप-
तश्चाहमुदासीनो बाह्याध्यात्मिकाश्च विषयाः सर्व एवैते दुःखसाधनम्" इति यस्य
ज्ञानमभूत्, स दृष्टानुश्रविकविषयसुखवितृष्णः "एवमहं भूयासमिति मे भूयासुः"
होता है, उसे उस शरीर से भी अच्छा शरीर मिलता है एवं जिसका धर्म इन दोनों
प्रकार के धर्मों से उत्कृष्टतम रहता है, उसे तदनुरूप ही शरीर भी उत्कृष्टतम
मिलता है । प्रकृत वाक्य का 'इष्ट' शब्द द्वन्द्वसमास के अन्त में प्रयुक्त है, अतः
उसके पहले के ' शरीरादि' प्रत्येक शब्द के साथ उसका अन्वय है । इसी प्रकार
प्रकृष्ट अधर्म से प्रेत-तिर्यग् योनि के अनिष्ट शरीरादि के साथ आत्मा सम्बद्ध
होता है । प्रेतलोक प्रभृति में भी थोड़ा-सा सुख का सम्बन्ध है एवं सुख धर्म से ही
उत्पन्न होता है, अतः 'स्वल्पधर्मसहितात्' ऐसा लिखा गया है । 'एवम्' इत्यादि से
इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं ।
इस प्रकार धर्म से संसार की उत्पत्ति का वर्णन कर 'ज्ञानपूर्वकात्तु' इत्यादि
सन्दर्भ के द्वारा धर्म से मोक्ष की उत्पत्ति का वर्णन करते हैं । "मैं वस्तुतः अपने
यथार्थरूप में उदासीन हूँ एवं बाह्य और आभ्यन्तर जितने भी विषय हैं, वे सभी
दुःख के ही साधन हैं" इस प्रकार का ज्ञान जिस पुरुष को हो जाता है वह 'दृष्ट'
चन्दनवनितादि जनित सुखों से एवं 'आनुश्रविक' स्वर्गादि सुखों की तृष्णा से निवृत्त
भाषानुवादसहितम् ३८१
न्यायकन्दली
इति फलाकाङ्क्षया विना निवृत्तसाधनतया विहितमपरं चावश्यकरणीयं कर्म करोति ।
तस्मात् कर्मणो ज्ञानपूर्वकात् कृतादस्य विशुद्धे कुले जन्म भवति । अकुलीनस्य श्रद्धा न
भवति । न चाश्रद्दधानस्य जिज्ञासा सम्पद्यते । न चाजिज्ञासोस्तत्त्वज्ञानम् । तद्विकलस्य च
नास्ति मोक्षप्राप्तिः । अतो मोक्षानुगुणमसङ्कल्पितफलं कर्म विशुद्धे कुले जन्म ग्राहयति,
विशुद्धे कुले जातस्य प्रत्यहं दुःखैरभिहन्यमानस्य दुःखविगमोपाये जिज्ञासा सम्पद्यते "कुतो
नु खल्वयं मम दुःखोपरमः स्यात्" इति । स चैवमाविर्भूतजिज्ञास आचार्यमुपगच्छति,
तस्य चाचार्योपदेशात् षण्णां पदार्थानां श्रौतं तत्त्वज्ञानं जायते । तदनु श्रवणमनन-
निदिध्यासनादिक्रमेण प्रत्यक्षं भवति । उत्पन्नतत्त्वज्ञानस्याज्ञाननिवृत्तौ सवासनविपर्यय-
ज्ञाननिवृत्तौ विरक्तस्य विच्छिन्नरागद्वेषसंस्कारस्य रागद्वेषयोरभावात् तज्जयोर्धर्मा-
धर्मयोरनुत्पादः । क्लेशवासनोपनिबद्धा हि प्रवृत्तयस्तुषावनद्धा इव तण्डुलाः प्ररोहन्ति ।
क्षीणेषु क्लेशेषु निस्तुषा इव तण्डुलाः कार्यं न प्रतिसन्दधते । यथाह भगवान् पतञ्जलिः -
हो जाता है । फिर भी 'अहं भूयासम्', 'मे भूयासुः' (मैं बराबर रहूँ और मेरे इष्ट
विषय बराबर मुझे प्राप्त होते रहें) इस प्रकार की भावना बनी ही रहती है । फला-
काङ्क्षा की इस भावना से प्रेरित होकर वह नैमित्तिक कर्मों का अनुष्ठान करता
ही रहता है; क्योंकि उनको छोड़ने का कोई हेतु तब तक उपस्थित नहीं रहता ।
ये ही कर्म जब उक्त पुरुष के द्वारा ज्ञानपूर्वक किये जाते हैं, तो उस पुरुष को
विशुद्ध कुल में जन्म प्राप्त होता है; क्योंकि अकुलीन पुरुष में श्रद्धा उत्पन्न नहीं
होती एवं बिना श्रद्धा के जिज्ञासा नहीं होती । जिसे जिज्ञासा नहीं, उसे
तत्त्वज्ञान प्राप्त होना असम्भव है । बिना तत्त्वज्ञान के मोक्ष की प्राप्ति सम्भव
नहीं है । अतः निष्काम कर्म मोक्ष का सहायक है । तस्मात् वह पुरुष विशुद्ध
कुल में जन्म लेता है । विशुद्ध कुल में उत्पन्न वह पुरुष जब प्रतिदिन के
दुःख से पीड़ित होने लगता है, तो उसे दुःखनाश के कारणों के प्रसङ्ग में
यह जिज्ञासा उठती है कि 'किन साधनों से इन दुःखों की निवृत्ति होगी' ?
जब पुरुष में इस प्रकार की जिज्ञासा उठती है तो वह आचार्य के पास जाता है ।
आचार्य के उपदेश से उसे वेदवाक्योंके द्वारा आत्मतत्त्व का (परोक्ष) ज्ञान होता है ।
फिर श्रवण के बाद मनन और मनन के बाद निदिध्यासन, इस रीति से
उसे आत्मतत्त्व का साक्षात्कार होता है । प्रत्यक्षात्मक इस आत्मतत्त्वज्ञान के
उत्पन्न हो जाने पर संसार के निदानभूत विपर्यय (मिथ्याज्ञान) का जड़मूल से
विनाश हो जाता है । जिससे विषयों से वैराग्य उत्पन्न होता है । विरक्त पुरुष
के राग और द्वेष के संस्कार भी छूट जाते हैं । राग और द्वेष के छूट जाने पर
६८२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे मोक्ष-
प्रशस्तपादभाष्यम्
पूर्वसञ्चितयोश्चोपभोगान्निरोधे सन्तोषसुखं शरीरपरिच्छेदं चोत्पाद्य
रागादिनिवृत्तौ निवृत्तिलक्षणः केवलो धर्मः परमार्थदर्शनजं सुखं
कृत्वा निवर्त्तते । तदा निरोधाद् निर्बीजस्यात्मनः शरीरादि-
निवृत्तिः, पुनः शरीराद्यनुत्पत्तौ दग्धेन्धनानलवदुपशमो मोक्ष इति ।
होता है । विरक्त पुरुष में राग और द्वेष की सम्भावना न रहने के
कारण राग और द्वेष से होनेवाले धर्म और अधर्म की आगे उत्पत्ति
रुक जाती है । पहले से सञ्चित धर्म और अधर्म का उपभोग से नाश
हो जाने के बाद सन्तोषात्मक सुख एवं शरीरपरिच्छेद (शरीर के
प्रति घृणा) इन दोनों की उत्पत्ति होती है । इनसे रागादि की
निवृत्ति होती है । इसके बाद निवृत्तिजनक केवल (अधर्म से
सर्वथा असम्बद्ध) धर्म आत्मतत्त्वज्ञान की सहायता से (परम) सुख
को उत्पन्न कर स्वयं भी निवृत्त हो जाता है । निवृत्तिलक्षण उस
धर्म की निवृत्ति से उस समय आत्मा संसार के बीज (धर्माधर्मादि)
से रहित हो जाता है, अतः उसके उपभोग के पूर्व-आयतन
(वर्तमान शरीर) की निवृत्ति हो जाती है, एवं आगे शरीर की उत्पत्ति
रुक जाती है । लकड़ी के जल जाने के कारण अग्नि की निवृत्ति
की तरह उस समय शरीर का फिर से उत्पन्न न होना ही मोक्ष है ।
न्यायकन्दली
"सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः" इति । यथाह भगवानक्षपादः - "न
प्रवृत्तिः प्रतिसन्धानाय हीनक्लेशस्य" इति । पूर्वसञ्चितयोश्च धर्माधर्मयोर्निरोध
उपभोगात्, निवृत्तिफलहेतोश्च कर्मान्तरात् । सन्तोषसुखं शरीरपरिच्छेदं
चोत्पाद्य रागादिनिवृत्तौ निवृत्तिलक्षणः केवलो धर्मः परमार्थदर्शनजं सुखं
इन दोनों से उत्पन्न होनेवाले धर्म और अधर्म की उत्पत्ति भी रुक जाती है । जिस
प्रकार छिलके से युक्त धान से ही अङ्कुर उत्पन्न होता है, उसी प्रकार क्लेश और
वासना से युक्त प्रवृत्ति से ही जन्मरूप कार्य की उत्पत्ति होती है । प्रवृत्तियों से जब
वासना और क्लेश का सम्बन्ध छूट जाता है, तब उससे आगे जन्म का कार्य उसी
प्रकार रुक जाता है, जिस प्रकार छिलके के न रहने से धान के द्वारा अङ्कुर का
होना रुक जाता है । जैसा कि 'न प्रवृत्तिः प्रतिसन्धानाय हीनक्लेशस्य' इस सूत्र के
द्वारा भगवान् अक्षपाद ने भी कहा है ।
पूर्वसञ्चितों का अर्थात् पूर्वसञ्चित धर्म और अधर्म का 'निरोध' उपभोग से
होता है । संसारनिवृत्तिरूप फल के कारणीभूत (निवृत्तिरूप) धर्म का विनाश
दूसरे धर्म से होता है । 'सन्तोषसुखम्' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त 'निवृत्ति' शब्द
भाषानुवादसहितम् ६८३
न्यायकन्दली
कृत्वा निवर्त्तते । निवत्र्त्यते संसारोऽनेयेति निवृत्तिः, निवृत्तिर्लक्षणं यस्यासौ निवृत्तिलक्षणो
निवृत्तिस्वभावो धर्मो रागादिनिवृत्तौ भूतायां केवलो व्यवस्थितः सन्तोषसुखं
शरीरपरिच्छेदं चोत्पाद्य परमार्थदर्शनजमात्मदर्शनजं सुखं करोति, तत्कृत्वा निवर्त्तते ।
आभिमानिककार्यविनिरोधात् तदा निर्बीजस्यात्मनः शरीरादिनिवृत्तौ पुनः शरीराद्यनुत्पत्तौ
दग्धेन्धनानलवदुपशमो मोक्षः । यदा परमार्थदर्शनं कृत्वा निवृत्तो धर्मः, तदा
निर्बीजस्यात्मनः शरीरादिबीजधर्माधर्मरहितस्यात्मन उत्पन्नानां शरीरादीनां कर्मक्षयान्निवृत्तौ
भूतायामनागतानां कारणाभावादनुत्पत्तौ यथा दग्धेन्धनस्यानलस्योपशमः पुनरनुत्पादः, एवं
पुनः शरीरानुत्पादो मोक्षः ।
इदं निरूप्यते । किं ज्ञानमात्रान्मुक्तिः ? उत ज्ञानकर्मसमुच्चयात् ?
ज्ञानकर्मसमुच्चयादिति वदामः । निवृत्तेतराभिलाषस्य काम्यकर्मभ्यो निवृ-
त्तस्यापि नित्यनैमित्तिककर्माधिकारो न निवर्त्तते, तानि ह्युपनीतं ब्राह्मण-
मात्रमधिकृत्य विहितानि । मुमुक्षुरपि ब्राह्मण एव, जातेरनुच्छेदात् । स यद्यधिका-
'निवर्त्त्यते संसारोऽनया' इस व्युत्पत्ति के द्वारा निष्पन्न है (जिसका अर्थ है कि
संसार की निवृत्ति जिससे हो) । इस प्रकार से निष्पन्न निवृत्ति शब्द के साथ
'लक्षण' शब्द का 'निवृत्तिर्लक्षणं यस्य असौ निवृत्तिलक्षणः' इस प्रकार का समास
है, अर्थात् निवृत्तिस्वभाव का जो धर्म वह रागादि की निवृत्ति होने पर 'केवल'
अर्थात् व्यवस्थित हो जाता है । वह (केवल धर्म) सन्तोषसुख और शरीरसञ्चालन
इन दोनों का उत्पादन कर 'परमार्थदर्शनजम्' अर्थात् आत्मज्ञानजनित सुख को
उत्पन्न कर स्वयं भी निवृत्त हो जाता है; क्योंकि आभिमानिक सभी कार्यों का वह
विरोधी है । 'तदा' इत्यादि सन्दर्भ से कहते हैं कि यह निवृत्तिस्वभाव का धर्म जब
आत्मज्ञानजनित धर्म को उत्पन्न कर स्वयं निवृत्त हो जाता है, 'तदा निर्बीजस्य'
अर्थात् तब शरीरादि के उत्पादन के बीज प्रवृत्तिलक्षण धर्माधर्मादि से रहित आत्मा
के शरीरादि का कर्मक्षय से नाश हो जाता है और कारणों के न रहने से आगे
होनेवाले शरीरादि की उत्पत्ति रुक जाती है । जिस प्रकार लकड़ी के जल जाने के
बाद अग्नि का भी नाश हो जाता है और पुनः उत्पत्ति भी नहीं होती है, उसी
प्रकार शरीर का पुनः उत्पन्न न होना ही 'मुक्ति' है ।
अब इस विषय का विचार करते हैं कि केवल ज्ञान से ही मुक्ति
होती है ? अथवा ज्ञान और कर्म दोनों मिलकर मोक्ष का सम्पादन करते
हैं ? हम लोग तो कहते हैं कि ज्ञान और कर्म दोनों मिलकर ही मोक्ष
का सम्पादन करते हैं; क्योंकि जिन्हें सांसारिक विषयों की अभिलाषा नहीं है,
वे यद्यपि काम्य कर्म से निवृत्त हो जाते हैं, फिर भी वे अपने नित्य और
नैमित्तिक कर्मों की अवश्यकर्तव्यता से मुक्त नहीं हो सकते; क्योंकि नित्य
और नैमित्तिक कर्मों का विधान उपनीत सभी ब्राह्मणों के लिए किया गया
है । मोक्ष के इच्छुक भी ब्राह्मण ही हैं; क्योंकि जाति का कभी नाश नहीं
६८४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे मोक्ष-
न्यायकन्दली
रित्वे सत्यवश्यकरणीयान्यतिक्रमेत् प्रत्यवायोऽस्य प्रत्यहमुपचीयेत, तदुपचयाच्च बद्धो न
मुच्यते । यथोक्तम्-
यानि काम्यानि कर्माणि प्रतिषिद्धानि यान्यपि ।
तानि बध्नन्त्यकुर्वन्तं नित्यनैमित्तिकान्यपि ॥ इति ।
विहिताकरणमभावः, न चाभावो भावस्य हेतुरपि, अतो नास्मात्
प्रत्यवायोत्पत्तिरिति चेत् ? न, विहिताकरणेऽन्यकरणात् प्रत्यवायस्य सम्भवात् । अभावस्य
हि स्वातन्त्र्येण हेतुत्वं नेष्यते, न तु भावोपसर्जनतया । न च शरीरी सन्ध्यादिकाले कायेन
वाचा मनसा वा किञ्चिन्न करोति, शरीरधारणादीनामपि करणात् । यथोक्तम्-
कर्मणां प्रागभावो यो विहिताकरणादिषु ।
न चानर्थकरत्वेन वस्तुत्यानापनीयते ॥
स्वकाले यदकुर्वंस्तत् करोत्यन्यदचेतनः ।
प्रत्यवायोऽस्य तेनैव नाभावेन स जन्यते ॥ इति ।
अभावेन केवलेन नासौ जन्यत इत्यर्थः । प्रतिषिद्धाचरणात् प्रत्यवायः,
होता । यदि अधिकार रहने पर भी अपने अवश्यकर्तव्य (नित्य-नैमित्तिक) कर्मों का
अनुष्ठान वे नहीं करते, फिर उनका प्रत्यवाय बढ़ता ही जाएगा । प्रत्यवाय की
इस वृद्धि के कारण बद्ध पुरुष कभी मुक्त नहीं होगा । जैसा आचार्यों ने कहा है
कि-
जितने भी काम्य, निषिद्ध, नित्य और नैमित्तिक कर्म हैं, सभी अनुष्ठान न
करनेवाले अधिकारी को संसार में बाँधते हैं ।
(प्र.) विहित कर्मों का न करना अभाव पदार्थ है, अभाव किसी का कारण
नहीं हो सकता, अतः विहित कर्मों के न करने से प्रत्यवाय की उत्पत्ति नहीं हो
सकती । (उ.) यह कोई बात नहीं है, जिस समय अधिकारी विहित कर्म का
अनुष्ठान नहीं करेगा, उस समय कोई दूसरा कर्म तो करेगा ही, इस दूसरे कर्म
(रूप भाव पदार्थ) से ही प्रत्यवाय की उत्पत्ति होगी । अभाव स्वतन्त्र होकर ही
किसी का कारण नहीं होता; किन्तु भाव पदार्थ रूप कारण का उपसर्जन तो होता
ही है । जितने भी शरीरी हैं, वे सन्ध्यावन्दनादि के समय (उसके न करने पर
भी) शरीर से, वचन से या मन से कोई न कोई काम अवश्य ही करते हैं;
क्योंकि शरीर को धारण करना भी तो कर्म ही है, जैसा कि आचार्यों ने कहा है-
विहित कर्म का न करना यतः कर्मों का प्राग्भाव है, अतः भाव पदार्थ न
होने के कारण वह प्रत्यवाय के उत्पादन से सर्वथा विरत नहीं हो सकता; क्योंकि
मूढ़ भी विहित कर्म के काल में उसे न करने पर भी अन्य कोई कर्म अवश्य ही
करता है, उस दूसरे कर्म से प्रत्यवाय की उत्पत्ति होती है, विहिताकरणरूप
प्रागभाव से ही नहीं ।
अर्थात् केवल उक्त प्रागभाव से प्रत्यवाय की उत्पत्ति नहीं होती है । (प्र.) निषिद्ध
कर्मों के आचरण से प्रत्यवाय होता है, शरीर धारणरूप कर्म तो निषिद्ध नहीं है,
भाषानुवादसहितम् ६८५
न्यायकन्दली
शरीरधारणादिकं च न प्रतिषिद्धम् । तत्कुर्वन्नपि यदि सन्ध्यया योगमभ्यस्यति को दोष
इति चेत् ? न, तत्काले विहितस्यावश्यकर्तव्यताविधेरर्थात् केवलस्य शरीरधारणादेः
करणं प्रतिषिद्धमिति । तदाचरतो भवत्येव प्रतिषिद्धाचरणनिमित्तः प्रत्यवायः । अथोच्यते ।
दीर्घकालादरनैरन्तर्यसेवितभावनावितविशदभावमात्मज्ञानमेव रागद्वेषौ मोहं च समूलकाषं
कर्षद्विहिताकरणनिमित्तं प्रत्यवायमपि कषतीति चेत् ? तदयुक्तम् । यत्र ह्यभ्यासः
प्रसीदति, तत्र तत्त्वग्रहो जातः संशयविपर्ययौ व्युदस्यति, न तस्य वस्त्वन्तरनिर्वहणे
सामर्थ्यं दृष्टपूर्वम् । यदि पुनरात्मज्ञानं कर्माणि निरुणद्धि उपारूढफलभोगमपि कर्म
निरुन्ध्यात्, ततः सुदूरं गता जीवन्मुक्तिः ? तत्त्वदर्शनानन्तरमेव विलीनाखिलकर्मणो
देहपातात् । अस्ति चायं परमार्थदृष्टिनिरुद्धाखिलाविद्योऽपि चित्रलिखितमिवाभासमात्रेण
सर्वं जगत् पश्यन्नेकत्राप्यनारूढाभिनिवेशः प्रारब्धफलं कर्मविशेषमुपभुञ्जानः कुलाल-
व्यापारविगमे चक्रभ्रान्तिवत् संस्कारवशादनुवर्तमानस्य देहपातमुदीक्षमाणः । तथा च श्रुतिः-
फिर विहिताकरण के समय शरीर धारण से प्रत्यवाय की उत्पत्ति क्यों कर
होगी ? शरीरधारण करते हुए यदि सन्ध्या-वन्दन के समय कोई योग का ही
अभ्यास करता है,तो उसे प्रत्यवाय क्यों होगा ? (प्र.) 'सन्ध्या-वन्दन अवश्य करें'
यह विधान है, इस विधान से ही इस प्रतिषेध का भी आक्षेप होता है कि उस
समय केवल-शरीर का धारण न करे (सन्ध्या-वन्दन से युक्त शरीर का ही धारण
करे), अतः उस समय केवल-शरीर का धारण प्रतिषिद्ध है । सुतराम् उससे
प्रत्यवाय होना उचित है । यदि यह कहें कि (प्र.) दीर्घकाल से आदरपूर्वक किये
गये अभ्यास के कारण आत्मा का विशद तत्त्वज्ञान जिस प्रकार राग, द्वेष, मोह
प्रभृति को मूल सहित विनष्ट कर देता है, उसी प्रकार वही आत्मतत्त्वज्ञान विहित
सन्ध्यावन्दनादि के न करने से होनेवाले प्रत्यवाय को भी विनष्ट कर देगा । (उ.)
तो उक्त कथन भी सङ्गत नहीं होगा; क्योंकि उपयुक्त अभ्यास केवल विषयों के
तत्त्व को ही पूर्ण रूप में समझ सकता है, जिससे उसमें जो संशय या विपर्यय
रहता है, उसका विनाश हो जाय । अभ्यासजनित तत्त्वग्रह में यह सामर्थ्य कहीं
उपलब्ध नहीं है कि किसी दूसरी वस्तु को भी वह उत्पन्न करे । यदि यह मान भी
लें कि आत्मज्ञान से कर्मों का नाश होता है, तो फिर उससे सारे प्रारब्ध कर्मों का
भी नाश हो जाएगा, जिससे जीवन्मुक्ति की बात ही छोड़ देनी पड़ेगी; क्योंकि
तत्त्वज्ञान के बाद ही प्रारब्धसहित सभी कर्मों का नाश हो जाएगा, जिससे कि
आत्मज्ञानवाले पुरुष के शरीर का भी नाश हो जाएगा; किन्तु ऐसे महापुरुषों की
सत्ता अवश्य है, जिनकी सभी अविद्यायें आत्मतत्त्वज्ञान से नष्ट हो चुकी हैं, जो
सम्पूर्ण विश्व को चित्रलिखित आभासमात्र की तरह देखते हैं, किसी भी एक
विषय में अभिनिवेश न रखकर, अपने प्रारब्ध को भोगते हुए संस्कार के कारण
कुम्हार के चाक के भ्रमण की तरह देहपात की प्रतीक्षा करते हैं । जैसा श्रुति
६८६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे मोक्ष-
न्यायकन्दली
"जीवन्नेव हि विद्वान् संहर्षायासाभ्यां विप्रमुच्यते" इति । तथा चाहुः कापिलाः -
सम्यग्ज्ञानाधिगमाद् धर्मादीनामकारणप्राप्तौ ।
तिष्ठति संस्कारवशाच्चक्रभ्रमवद् धृतशरीरः ॥ इति ।
धर्मादीनामकारणप्राप्ताविति तत्त्वज्ञानेनोच्छिन्नेषु सवासनक्लेशेषु धर्मादीनां सहकारि-
कारणप्राप्त्यभावे सतीत्यर्थः । अलब्धवृत्तीनि कर्माणि तत्त्वज्ञानाद् विलीयन्त इति चेत् ?
न, तेषामपि कर्मत्वादप्रारब्धफलकर्मवज् ज्ञानेन विनाशाभावात् । योऽपि 'क्षीयन्ते चास्य
कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे' इत्युपदेशः, तस्याप्ययमर्थः - ज्ञाने सति अनागतानि कर्माणि
न क्रियन्त इति । न पुनरयमस्यार्थः-उत्पन्नानि कर्माणि ज्ञानेन विनाश्यन्त इति । तथा
चागमान्तरम् 'नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि' इत्यादि । ज्ञानं यदि न क्षिणोति
कर्माणि ? अनेकजन्मसहस्रसञ्चितानां कर्मणां कुतः परिक्षयः ? भोगात् कर्मभिश्च । तदर्थं
कहती है कि "आत्मज्ञानी पुरुष शरीर को धारण करते हुए भी हर्ष और शोक
से विमुक्त रहते हैं" । इसी प्रसङ्ग में सांख्यदर्शन के आचार्य ने भी कहा है कि-
'सम्यग्ज्ञान (आत्मतत्त्व ज्ञान) की प्राप्ति से धर्मादि से संसार के उत्पादक
सहकारी (वासनादि) नष्ट हो जाते हैं, फिर भी संस्कार के कारण कुम्हार के
चाक के भ्रमण की तरह तत्त्वज्ञानी शरीर को धारण किये ही रहते हैं ।
उक्त आर्या में प्रयुक्त 'धर्मादीनामकारणप्राप्तौ' इस वाक्य का अर्थ है कि
'तत्त्वज्ञान से जब वासनासहित सभी क्लेशों का नाश हो जाता है, जब संस्कार के
कारणीभूत धर्मादि भावों के सहकारी नष्ट हो जाते हैं, उस समय' । (प्र.)
तत्त्वज्ञान के द्वारा प्रारब्ध से भिन्न सभी कर्मों का विनाश हो जाता है । (उ.) यह
भी ठीक नहीं है; क्योंकि प्रारब्ध कर्म की तरह वे भी कर्म ही हैं, अतः तत्त्वज्ञान
से उनका भी नाश नहीं हो सकता । 'क्षीयन्ते चास्य कर्माणि' इत्यादि वाक्य का
जो यह उपदेश है कि "आत्मतत्त्वज्ञान के हो जाने पर उसके सभी कर्म नष्ट
हो जाते हैं," उसका इतना ही अभिप्राय है कि ज्ञान हो जाने के बाद कर्म
की धारा रुक जाती है । फिर भविष्य में कर्म अनुष्ठित नहीं होते । उसका
यह अर्थ नहीं है कि जो कर्म उत्पन्न हो गये हैं, तत्त्वज्ञान से उनका भी विनाश
होता है । जैसा कि दूसरे आगम के द्वारा कहा गया है कि बिना भोग के कर्मों
का नाश नहीं होता है, चाहे सौ करोड़ कल्प ही क्यों न बीत जाय । (प्र.) ज्ञान
से यदि कर्मों का नाश नहीं होता है, तो फिर कई हजार वर्षों से सञ्चित कर्मों
का नाश किससे होता है ? (उ.) भोग से और नाशक दूसरे कर्मों से ही (उन
सञ्चित कर्मों का) नाश होता है । (प्र.) कर्मनाश के लिए विहित कर्मों से अनन्त
जन्मों से सञ्चित कर्मों का एक ही जन्म में विनाश किस प्रकार होगा ? (उ.)
ऐसी कोई बात नहीं है, कर्मक्षय के लिए काल का कोई नियम नहीं है । जिस
भाषानुवादसहितम् ६८७
न्यायकन्दली
चोदितेरनन्तानां कथमेकस्मिन् जन्मनि परिक्षय इति चेत् ? न, कालानियमात् । यथैव
तावत् प्रतिजन्म कर्माणि चीयन्ते, तथैव भोगात् क्षीयन्ते च । यानि त्यपरिक्षीणानि
तान्यात्मज्ञेनापूर्व सञ्चिन्चता च क्रमेणोपभोगात् कर्मभिश्च नाश्यन्ते । यथोक्तम्-
कुर्वन्नात्मस्वरूपज्ञो भोगात् कर्मपरिक्षयम् ।
युगकोटिसहस्रेण कश्चिदेको विमुच्यते ॥ इति।
तदेवं विहितमकुर्वतः प्रत्यवायोत्पत्तेस्तस्य च बन्धहेतुत्वादन्धतो विरामाभावात्, प्रत्य-
वायनिरोधार्थं मुक्तिमिच्छता योगाभ्यासाविरोधेन भिक्षाभोजनादिवद् यथाकालं विहितान्य-
नुष्ठेयानि, यावदस्यात्मतत्त्वं न स्फुटीभवति । स्फुटीकृतात्मतत्त्वस्यापि जीवन्मुक्तस्य
तावत्कर्माणि भवन्ति, यावद्यात्रानुवर्तते । आत्मैकप्रतिष्ठस्य त्याभ्यर्णमोक्षस्य परिक्षीणप्राय-
कर्मणस्तानी नश्यन्त्येव, बहिः संवित्तिविरहात् । परिणतसमाधिसामर्थ्यविशदीकृत-
मुपचितवैराग्यहितपरिपक्वपर्यन्तमापादितविषयाद्वैतमुन्मूलितनिखिलविपर्ययवासनमेकाग्री-
कृतान्तःकरणकारणमात्मतत्त्वज्ञानमेव केवलं तदानीं सञ्जायते, न बहिःसंवेदनम्,
प्रकार प्रत्येक जन्म में कर्म का सञ्चय होता है, उसी प्रकार भोग से उनका विनाश
भी होता रहता है । उनमें जितने कर्म भोग से बच जाते हैं, उन कर्मों को आगे
आत्मज्ञ पुरुष अपूर्व कर्मों का सञ्चय करते हुए ही भोग से और (प्रतिरोधक)
कर्म से क्रमशः नष्ट कर देते हैं । जैसा कहा गया है कि-
आत्मज्ञान से भोग के द्वारा कर्मों का नाश करते हुये हजारों कोटियुगों में
कोई एक पुरुष मुक्त होता है ।
इन सब कारणों से यह मानना पड़ता है कि यतः विहित कर्मों को न करने
से प्रत्यवाय होता है एवं प्रत्यवाय बन्ध का कारण है, इस प्रत्यवाय की निवृत्ति
विहित कर्मों के अनुष्ठान के बिना सम्भव नहीं है, अतः जिन्हें मुक्ति पाने की
अभिलाषा हो, उन्हें योगाभ्यास को क्षति पहुँचाये बिना विहित कर्मों का अनुष्ठान
तब तक करते रहना चाहिए, जब तक आत्मतत्त्व पूर्ण रूप से अवगत न हो
जाय । जैसे कि ज्ञान न हो जाने तक भिक्षा, भोजन प्रभृति कर्मों का अनुष्ठान
अन्त तक करना पड़ता है । आत्मा का परिस्फुट ज्ञान हो जाने पर भी यदि वे
जीवन्मुक्त हैं, तो जब तक यह शरीर है, तब तक नित्य-नैमित्तिक कर्मों का
अनुष्ठान उन्हें भी करना पड़ेगा । जिस महापुरुष को केवल आत्मा का ही ज्ञान
रह जाता है और इस कारण जो परममुक्ति के समीप पहुँच जाते हैं, उनसे कर्म
स्वयं छूट जाते हैं; क्योंकि उन्हें बाह्य विषयों का ज्ञान ही नहीं रह जाता । उन्हें
तो केवल आत्मा का ही विशिष्ट ज्ञान रह जाता है । परिणत समाधि के द्वारा
उत्पन्न होने के कारण जिस आत्मज्ञान में पूरी स्वच्छता आ गयी है, तीव्र वैराग्य
से जिसमें पूरी परिपक्वता आ गयी है । एवं जिस आत्मज्ञान में दूसरे सभी विषयों
का सम्बन्ध पूर्णतः समाप्त हो गया है । जिससे सभी विपर्ययरूप मिथ्या ज्ञान का
६८८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे मोक्ष-
न्यायकन्दली
बाह्येन्द्रियव्यापारोपरमात् । तत्र कः सम्भवः कर्मणाम् ? तथा च श्रुतिः-"न
शृणोतीत्याहुरेकीभवति न पश्यतीत्याहुरेकीभवतीत्यादि" । तदा चाकरणनिमित्तः
प्रत्यवायोऽपि नास्ति सन्ध्येयमुपस्थितेत्यादिकमजानतो ब्राह्मणोऽस्मीति प्रतीतिरहितस्य
कर्माधिकारपरिभ्रंशात् । यथोक्तम्-
ब्राह्मण्यानहंमानी कथं कर्माणि संसृजेत् ॥ इति ।
न चास्योपरतसमस्तव्यापारस्य काष्ठवदवस्थितस्यापि प्राणिहिंसापि सम्भवति । यत्
पुनरस्य दृष्टद्रष्टव्यस्य क्षीणक्षेतव्यस्य वशीकृतमनसो विषयावबोधस्मरणसङ्कल्पसुखदुःख-
बहिष्कृतस्य ब्रह्मलग्नसमाधेरपि शरीरं कियन्तञ्चित् (कालमनुवर्तते) तच्छरीरस्थितिमात्र-
हेतोरायुर्विपाकस्य कर्मग्रन्थेरनुच्छेदात् । यदा तु यावन्तं कालमायुर्विपाकेन कर्मणा शरीरं
धारयितव्यं तावत्कालप्राप्तिरभूत्, तदा स्वकार्यकरणात् कर्मसमुच्छेदे तत्कार्यस्य शरीरस्य
निवृत्तिः ।
विनाश हो गया है । जिस आत्मज्ञान की उत्पत्ति एकाग्र अन्तःकरण से होती है,
ऐसे आत्मज्ञानवाले पुरुष को केवल आत्मा का ही ज्ञान उस समय होता है । बाह्य
किसी विषय का भान उन्हें नहीं रह जाता; क्योंकि बाह्य विषयों के साथ उनकी
इन्द्रियों का सम्बन्ध ही नहीं रह जाता है । ऐसी स्थिति में उनसे कर्म सम्पादन की
कौन-सी आशा की जा सकती है ? इसी स्थिति को श्रुति ने 'न शृणोतीत्या-
हुरेकीभवति' इत्यादि वाक्यों से कहा है । उस समय उनसे विहित कर्मों का
अनुष्ठान न होने पर भी उन्हें प्रत्यवाय नहीं होता; क्योंकि जिन्हें कर्माधिकार का
सूचक 'अभी सन्ध्या उपस्थित हो गयी, मैं ब्राह्मण हूँ' इत्यादि ज्ञान नहीं है, उनका
कर्म करने का अधिकार भी छूट जाता है । जैसा कहा गया है कि-
'मैं ब्राह्मण हूँ' जिनको इस प्रकार का अहङ्कार नहीं है, वे ब्राह्मणोचित कर्म के
साथ कैसे सम्बद्ध हो सकते हैं ?
इस प्रकार सभी कर्म छूट जाने के कारण जो काठ की तरह हो गये हैं, उनसे
किसी भी प्राणी की हिंसा सम्भव नहीं है । जिन्होंने जानने योग्य सभी विषयों को
जान लिया है, छोड़ने योग्य सभी विषयों को छोड़ दिया है । जिन्होंने मन को
वशीभूत कर विषयों के अनुभव, स्मरण, संकल्प, सुख एवं दुःख सभी से
छुटकारा पा लिया है, वे यदि ब्रह्म के ध्यान में समाधिस्थ भी हैं, तथापि उनकी
शरीर की अनुवृत्ति जो थोड़े समय के लिए भी चलती है, उसका कारण वह
कर्मग्रन्थिरूप विपाक है जो केवल शरीर स्थिति का ही कारण है । जितने समय
के आयु तक उक्त कर्मविपाक से शरीर की स्थिति आवश्यक है, वह समय जब
समाप्त हो जाता है, तब अपना कर्त्तव्य होने के कारण कर्म भी समाप्त हो
जाता है । कर्म की समाप्ति से शरीर की समाप्ति और शरीर की समाप्ति से
तत्त्वज्ञान की भी समाप्ति हो जाती है, जिससे आत्मा को कैवल्य प्राप्त होता है ।
भाषानुवादसहितम् ६८९
न्यायकन्दली
तन्निवृत्तौ तत्कार्यस्य तत्त्वज्ञानस्यापि विनाशादात्मा कैवल्यमापद्यते । तत्रात्मतत्त्व-
ज्ञानस्य विहितानां च कर्मणां बन्धहेतुकर्मप्रतिबन्धव्यापारदस्ति सम्भूयकारिता । शरीरादि-
विविक्तमात्मानं जानतश्च तदुपकारापकारावात्मन्यप्रतिसन्दधानस्याहङ्कारममकारयोरु- परमे
सत्युपकारिण्यपकारिणि च रागद्वेषयोरभावादुदासीनस्याप्रवृत्तावनागतयोः कुशलेतर-
कर्मणोरसञ्चयात्, सञ्चितयोश्चोपभोगेन कर्मभिश्च परिक्षयाद् विहिताकरणनिमित्तस्य
प्रत्यवायस्य च विहितानुष्ठानेनैव प्रतिबन्धात् । क्षीणे कर्मण्यैहिकस्य देहस्य निवृत्तौ
कारणान्तराभावादानुष्मिकस्य देहस्य पुनरुत्पत्त्यभावे सत्यात्मनः स्वरूपेणावस्थानम् ।
यथोक्तम्-
नित्यनैमित्तिकैरेव कुर्वाणो दुरितक्षयम् ।
ज्ञानं च विमलीकुर्वन्नभ्यासेन तु पाचयेत् ॥
अभ्यासात् पक्वविज्ञानः केवल्यं लभते नरः ॥ इति ।
तथा परैरप्ययं गृहीतो मार्गः-
कर्मणा सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानेनात्मविनिश्चयः ।
भवेद् विमुक्तिरभ्यासात् तयोरेव समुच्चयात् ॥ इति ।
इस प्रकार आत्मतत्त्वज्ञान और विहित कर्मों का अनुष्ठान ये दोनों मिलकर
(ज्ञानकर्मसमुच्चय) ही बन्ध के कारणीभूत कर्मों का प्रतिरोध करने की क्षमता
रखते हैं । जिस पुरुष को 'शरीरादि से आत्मा भिन्न है' इस प्रकार का ज्ञान और
शरीरादि में किये गये उपकार और अपकार को आत्मा का उपकार और
अपकार न समझने की बुद्धि है, उस पुरुष के अहङ्कार और ममकार का विलोप
हो जाता है । फिर उपकारी के प्रति राग और अपकारी के प्रति द्वेष ये दोनों भी
स्वतः निवृत्त हो जाते हैं । जिससे आत्मा की प्रवृत्ति रुक जाती है और वह
उदासीन हो जाता है । जिससे आगे पाप और पुण्य का प्रवाह रुक जाता है और
पहले किये गये (सञ्चित) पाप-पुण्य का भोग और दूसरे कर्मों से विनाश हो जाता
है । एवं विहित कर्मों के न करने से जो प्रत्यवाय होगा, उसका प्रतिरोध विहित
कर्मों के अनुष्ठान से ही हो जाएगा । इस प्रकार सभी कर्मों का विनाश हो जाने
पर इहलोक का शरीर तो नष्ट हो ही जायेगा और कारणों के न रहने पर
पारलौकिक शरीर भी उत्पन्न नहीं होगा । ऐसी स्थिति में आत्मा अपने स्वरूप में
स्थित हो जाएगा । जैसा कहा गया है कि-
नित्य और नैमित्तिक कर्म के अनुष्ठान से सभी पापों को नष्ट करते हुए ज्ञान
को स्वच्छ कर लेना चाहिए । इसके बाद अभ्यास के द्वारा उक्त स्वच्छ ज्ञान को
परिपक्व कर लेना चाहिए । इस प्रकार अभ्यास से परिपक्व ज्ञान वाले पुरुष को
ही कैवल्य प्राप्त होता है ।
अन्य सम्प्रदाय के लोगों ने भी इस मार्ग को अपनाया है, जैसा कि इस श्लोक
से स्पष्ट है-
कर्म से अन्तःकरण की शुद्धि होती है और ज्ञान से आत्मा का
(साक्षात्कारत्मक) विनिश्चय होता है । इस प्रकार ज्ञान और कर्म दोनों के ही
अभ्यास से मुक्ति प्राप्त होती है ।
६१० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे मोक्ष-
न्यायकन्दली
किं पुनरात्मनः स्वरूपं येनावस्थितिर्मुक्तिरुच्यते? आनन्दात्मतेति केचित् । तदयुक्तम् ।
विकल्पासहत्वात् । स किमानन्दो मुक्तावनुभूयते वा ? न वा ? यदि नानुभूयते ?
स्थितोऽप्यस्थितान्न विशिष्यते, अनुपभोग्यत्वात् । अनुभूयते चेत् ? अनुभवस्य कारणं
वाच्यम् । न च कायकरणाद्विगमे तदुत्पत्तिकारणतां पश्यामः । अन्तःकरणसंयोगः
कारणमिति चेत् ? न, धर्माधर्मोपगृहीतस्य हि मनसः सहायत्वात्, तदखिल-
शुभाशुभबीजनाशोपगतं नात्मानुकूल्येन वर्त्तते । योगजधर्मानुग्रहादात्मानमनुकूलयति चेत् ?
योगजोऽपि धर्मः कृतकत्वादवश्यं विनाशीति तत्क्षये मनसः कोऽनुग्रहीता ? अथ मतम्-
अचेतनस्यात्मनो मुक्तस्यापि पाषाणादविशेषः, सोऽपि हि न सुखायते न दुःखायते ।
मुक्तोऽपि यदि तथैव, कोऽनयोर्विशेषः ? तस्मादस्यात्मनः स्वाभाविकी चितिः, सा
यदेन्द्रियैर्बहिराकृष्यते, तदा बहिर्मुखीभवति । यदा त्विन्द्रियाण्युपरतानि भवन्ति, तदा
स्वात्मन्येवानन्दस्वभावे निमज्जति ।
आत्मा का वह कौन-सा स्वरूप है जिस स्वरूप से आत्मा की स्थिति मुक्ति
कहलाती है? (इस प्रश्न का उत्तर) कुछ लोग इस प्रकार देते हैं कि वह स्थिति
आत्मा की आनन्दस्वरूपता ही है; किन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि इस पक्ष
के सम्भावित कोई भी विकल्प युक्त नहीं ठहरते । (पहला विकल्प यह है कि)
मुक्तावस्था में इस आनन्द का अनुभव होता है? अथवा नहीं? यदि अनुभव नहीं
होता है, तो फिर उस आनन्द का रहना और न रहना दोनों बराबर हैं; क्योंकि
उस आनन्द का उपभोग नहीं किया जा सकता । यदि कहें कि उस आनन्द का अनु-
भव होता है? तो फिर उस अनुभव का कारण कौन है- यह कहना पड़ेगा । शरीर
एवं इन्द्रियादि के नष्ट हो जाने पर और किसी को उस अनुभव का कारण मानना
सम्भव नहीं है । (प्र.) अन्तःकरण (मन) का संयोग उसका कारण होगा ? (उ.) सो
भी सम्भव नहीं है; क्योंकि धर्म और अधर्म से प्रेरित मन ही अनुभव का सहायक
है । जिसके सभी धर्म और अधर्म नष्ट हो चुके हैं, उसके मन से आत्मा को दुःख
का अनुभव नहीं हो सकता । (प्र.) योगज धर्म के साहाय्य से वह मन आत्मा के
अनुकूल होता है (अर्थात् आत्मा के सुखानुभव का उत्पादन करता है) । (उ.) किन्तु
योगज धर्म भी तो उत्पत्तिशील ही है, अतः उसका भी अवश्य नाश होगा, फिर
उसके नष्ट हो जाने पर मन का सहायक कौन होगा? यदि यह कहें कि (प्र.) मुक्त
भी हो यदि उसमें चैतन्य न रहे, तो फिर पत्थर के समान ही होगा; क्योंकि पत्थर
में भी सुख-दुःख की चेतनायें नहीं होतीं । यदि मुक्त पुरुष को भी सुख और दुःख
की चेतनाओं से रहित मान लिया जाय, तो पत्थर और मुक्त आत्मा में क्या अन्तर
रहेगा? अतः यह मानना पड़ेगा कि आत्मा में एक स्वाभाविक चैतन्य होता है । वह
चैतन्य जब इन्द्रियों के द्वारा बाह्य विषयों की तरफ खींचा जाता है, तब वह चैतन्य
बहिर्मुख होता है (अर्थात् बाह्यविषयक ज्ञान में परिणत होता है) । जब इन्द्रियाँ