सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८३
न्यायकन्दली
अथैको धर्मः सपक्षविपक्षयोर्दर्शनाद् धर्मिणि सन्देहं कुर्वन् सन्दिग्धो हेत्वाभासः
स्यात्, एवमेकस्मिन् धर्मिणि द्वयोर्हेत्वोस्तुल्यबलयोर्विरुद्धार्थप्रसाधकयोः सन्निपाते सति
संशयदर्शनादयं विरुद्धद्वयसन्निपातोऽन्यः सन्दिग्धो हेत्वाभास इति केश्चिदुक्तम्, तद्
दूषयितुमुपन्यस्यति-एकस्मिंश्चेति । तस्योदाहरणमाह-यथा मूर्त्तत्यामूर्त्तत्वं प्रति मनसः
क्रियावत्त्वात्स्पर्शवत्त्वयोरिति । मूर्त्तं मनः क्रियावत्त्वाच्छरावादिवत्, अमूर्त्तं मनोऽस्पर्शा-
वत्त्वादाकाशादिवदिति विरुद्धार्थप्रसाधकयोः क्रियावत्त्वास्पर्शवत्त्वयोर्हेत्वोः सन्निपाते
मूर्त्तत्वामूर्त्तत्वं प्रति संशयः, न ह्यत्रोभयोरपि साधकत्वम्, वस्तुनो द्वयात्मकत्वासम्भवात् ।
नापि परस्परविरोधादुभयोरप्यसाधकत्वम्, मूर्त्तामूर्त्तव्यतिरेकेण प्रकारान्तराभावात् । न
किसी सम्प्रदाय के लोग कहते हैं कि जिस प्रकार सपक्ष और विपक्ष दोनों में
यदि एक ही धर्म (हेतु) देखा जाय तो वह धर्मी (पक्ष) में साध्य के सन्देह को
उत्पन्न करने के कारण 'सन्दिग्ध' नाम का हेत्वाभास होगा, उसी प्रकार परस्पर
विरुद्ध दो साध्यों के साधक एवं समान बल के दो हेतु यदि एक धर्मी में देखे
जाँय तो भी उस धर्मी में उक्त दोनों विरुद्ध साध्यों का संशय होगा । अतः यह 'विरुद्ध-
द्वयसन्निपात'मूलक एक अलग ही 'सन्दिग्ध' नाम का हेत्वाभास है । इस पक्ष का
खण्डन करने का ही उपक्रम 'एकस्मिंश्च' इत्यादि सन्दर्भ से किया गया है । इसी
(विशेष प्रकार के) सन्दिग्ध का उदाहरण 'यथा मूर्त्तत्यामूर्त्तत्वं प्रति मनसः क्रियावत्त्वा-
स्पर्शवत्त्वयोः' इस वाक्य के द्वारा प्रदर्शित हुआ है । अभिप्राय यह है कि 'जिस
प्रकार घट शरावादि क्रिया से युक्त होने के कारण मूर्त्त है, उसी प्रकार मन भी मूर्त्त
है; क्योंकि वह भी क्रियाशील है' एवं 'जिस प्रकार आकाश स्पर्श से रहित होने के
कारण मूर्त्त नहीं है, उसी प्रकार मन भी स्पर्श से विहीन होने के कारण अमूर्त्त है'
इस रीति से मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्वरूप दो विरुद्ध साध्य को सिद्ध करनेवाले
क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व रूप दोनों हेतुओं का एक ही मनरूप धर्मी में यदि
सम्मिलन होता है, तो मनरूप धर्मी में यह संशय होता है कि 'मन मूर्त्त है ? अथवा
अमूर्त्त ?' चूँकि एक वस्तु एक ही प्रकार की हो सकती है, परस्पर विरोधी दो
प्रकार की नहीं (सुतरां मन मूर्त्त ही होगा या अमूर्त्त ही), अतः वे दोनों हेतु मन-
रूप अपने एक ही पक्ष में अपने-अपने साध्य (अर्थात् मूर्त्तत्व एवं अमूर्त्तत्व के)
निश्चय का उत्पादन नहीं कर सकते । यह कहना भी सम्भव नहीं है कि (प्र.) चूँकि
मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व दोनों परस्पर विरोधी हैं, अतः मनरूप एक ही धर्मी में उक्त
दोनों साध्यों के साधन करने का सामर्थ्य उन दोनों हेतुओं में से किसी में भी नहीं
है । (उ.) क्योंकि मन को मूर्त्त या अमूर्त्त इन दोनों से भिन्न किसी तीसरे प्रकार का
होना सम्भव नहीं है (अतः उन दोनों में से एक हेतु मन में अपने साध्य का साधक
पुस्तक के इस सन्दर्भ में जो 'अयं सपक्षविपक्षयोर्व्यापको विपक्षैकदेशवृत्तिरनैकान्तिकः' यह
पाठ है' उसमें 'विपक्षयोः' यह प्रमाद से लिखा गया जान पड़ता है ।

५८४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-
प्रशस्तपादभाष्यम्
क्रियावत्त्वास्पर्शवत्त्वयोरिति । नन्वयमसाधारण एवाचाक्षुषत्वप्रत्यक्ष-
त्ववत् संहतयोरन्यतरपक्षासम्भवात् । ततश्चानध्यवसित इति
जैसे कि मन में मूर्तत्व के साधक क्रियावत्त्व और अमूर्तत्व के साधक
अस्पर्शवत्त्व ये दोनों ही हेतु विद्यमान हैं, अतः संशय होता है कि मन
क्रियाशील होने के कारण मूर्त है या अस्पर्शयुक्त (द्रव्य) होने के कारण
(आकाशादि की तरह) अमूर्त्त है ? मन में उक्त सन्देह का कारण होने से
उक्त दोनों ही हेतु सन्दिग्ध नाम के हेत्वाभास हैं । (अवान्तर उत्तर- पक्ष)
जिस प्रकार अचाक्षुषत्व (चक्षु से गृहीत न होना) एवं प्रत्यक्षत्व (इन्द्रिय
से गृहीत होना) इन दोनों में से एक-एक गुण से भिन्न दूसरी जगह
पृथक् रूप से रहने पर भी मिलित होकर केवल गुण में ही रहने के
न्यायकन्दली
चान्यतरस्य हेतोर्विशेषोऽवगम्यते येनैकपक्षावधारणं स्यात् । अतः क्रियावत्त्वास्पर्श-
वत्त्वाभ्यां मनसि संशयो भवति, किं मूर्त्तं किं वामूर्त्तमिति । अयमेव च विरुद्धाव्यभि-
चारिणः प्रकरणसमाद् भेदो यदयं संशयं करोति, प्रकरणसमस्तु सन्दिग्धेऽर्थे प्रयुज्यमानः
संशयं न निवर्तयतीति ।
नन्वयमसाधारण एव, अचाक्षुषत्वप्रत्यक्षत्ववत् संहतयोरन्यतरपक्षा-
सम्भवादिति । क्रियावत्त्वास्पर्शवत्त्वे प्रत्येकं न तावत् संशयं जनयतः, निर्णय-
हेतुत्वात् । सन्निपातश्च तयोरयमसाधारण एव, संहतयोस्तयोर्मनोव्यतिरेकेणान्य-
अवश्य है) । इन दोनों हेतुओं में से किसी एक हेतु में 'विशेष' बल का भी
निश्चय नहीं है कि उन दोनों पक्षों में से किसी एक पक्ष का अवधारण हो जाय ।
अतः कथित क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व इन दोनों हेतुओं से मन में यह संशय
उत्पन्न होता है कि 'मन मूर्त है या अमूर्त' ? विरुद्धाव्यभिचारी (प्रस्तुत विलक्षण
सन्दिग्ध) हेत्वाभास में प्रकरणसम (सत्प्रतिपक्ष) हेत्वाभास से यही अन्तर है कि
विरुद्धाव्यभिचारी हेत्वाभास पक्ष में प्रकृत साध्य के संशय का उत्पादन करता है;
किन्तु प्रकरणसम उस साध्य में प्रवृत्त होता है जो सन्दिग्ध है, जिससे कि वह पक्ष
में साध्य के सन्देह को दूर नहीं कर पाता ।
'नन्वयमसाधारण एव, अचाक्षुषत्वप्रत्यक्षत्ववत् संहतयोरन्यतरपक्षासम्भवात्' इस
(पूर्वपक्ष भाष्य) का अभिप्राय है कि यह (विरुद्धाव्यभिचारी या सन्दिग्धविशेष)
असाधारण हेत्वाभास ही है; क्योंकि कथित क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व इन दोनों
में कोई एक हेतु संशय को उत्पन्न नहीं कर सकता; क्योंकि प्रत्येकशः वे दोनों
निश्चय के ही उत्पादक हैं । दोनों हेतुओं का सम्मिलन (जिससे संशय हो सकता
है) असाधारण ही है; क्योंकि क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व इन दोनों का सम्मिलन
तो केवल मनरूप पक्ष में ही सम्भव है, मन को छोड़कर उन दोनों का सम्मिलन

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८५
न्यायकन्दली
तरपक्षे सपक्षे विपक्षे यथाऽचाक्षुषत्वप्रत्यक्षत्वयोः प्रत्येकं गुणव्यभिचारेऽपि समुदायितयोर्गुण-
व्यतिरेकेणान्यत्रासम्भवः । यद्यपि विरुद्धव्यभिचारिधर्मद्वयोपनिपातोऽसाधारणो धर्मः, तथापि
संशयहेतुत्वमेव । व्यतिरेकिणो हि विपक्षादेवैकस्माद् व्यावृत्तिर्नियता, तेन पक्षे निर्णय-
हेतुत्वम् । असाधारणस्य तु व्यावृत्तिरनैकान्तिकी, विपक्षादिव सपक्षादपि तस्याः
सम्भवात् । तत्र यदि गन्धवत्त्वमनित्यव्यावृत्तत्यान्नित्यत्वं साधयति, नित्यादपि गगनाद्
व्यावृत्तेरनित्यत्वमपि साधयेत् ? न चास्त्युभयोः सिद्धिः, वस्तुनो द्वैरूप्याभावात् ।
नाप्युभयोरसिद्धिः, प्रकारान्तराभावात् । अतो गन्धवत्त्वात् पृथिव्यां संशयो भवति किमियं
नित्या ? किं वानित्या ? इति । यदाहुर्भट्टमिश्राः –
यत्रासाधारणो धर्मस्तदभावमुखेन तु ।
द्वयासत्त्वविरोधाच्च मतः संशयकारणम् ॥
किसी भी सपक्ष में या किसी भी विपक्ष में सम्भव नहीं है । जैसे कि अचाक्षुषत्व
(आँखों से न देखे जाने योग्य) और प्रत्यक्षत्व इन दोनों में से अलग-अलग प्रत्येक
का गुण में व्यभिचार (गुण से भिन्न पदार्थ में विद्यमानत्व) है (क्योंकि गुण से भिन्न
आकाशादि द्रव्य चक्षु से नहीं देखे जाते एवं गुण से भिन्न होने पर भी घटादि
द्रव्यों का प्रत्यक्ष होता है); किन्तु अचाक्षुषत्व और प्रत्यक्षत्व दोनों मिलकर केवल
गुण में ही हैं (क्योंकि गन्धादि गुणों का चक्षु से ग्रहण न होने पर भी प्रत्यक्ष होता
है) । यद्यपि विरुद्धव्यभिचारी दो धर्मों का एक आश्रय में रहना असाधारण धर्म
है, फिर भी वह संशय का ही उत्पादक है (निर्णय का नहीं) । (अन्वय) व्यतिरेकी
हेतु में केवल विपक्ष में न रहना (विपक्षव्यावृत्ति) ही केवल निश्चित है
(सपक्षव्यावृत्ति नहीं), अतः वह हेतु पक्ष में साध्य के निश्चय का उत्पादन कर सकता
है । असाधारण हेतु में सपक्ष या विपक्ष इन दोनों में से किसी एक की भी
व्यावृत्ति नियमित नहीं है; क्योंकि विपक्ष की तरह सपक्ष में भी उसका न रहना
निर्णीत ही है । अतः गन्धवत्त्वरूप असाधारण हेतु सभी अनित्यों में न रहने के
कारण पृथिवी में नित्यत्व का अगर साधन कर सकता है, तो फिर गगनादि नित्य
पदार्थों में न रहने के कारण पृथिवी में अनित्यत्व का भी वह साधन कर ही
सकता है; किन्तु एक ही पृथिवी व्यक्ति में नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों की सिद्धि
नहीं हो सकती; क्योंकि एक वस्तु एक ही प्रकार की हो सकती है, दो प्रकार की
नहीं । (वस्तुओं का किसी एक ही प्रकार का होना निश्चित होने के कारण ही)
नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों की असिद्धि भी नहीं कही जा सकती; क्योंकि
किसी एक वस्तु का नित्यत्व और अनित्यत्व से भिन्न कोई तीसरा प्रकार हो
ही नहीं सकता । अतः पृथिवी में गन्ध के रहने के कारण यह संशय होता है
कि 'यह नित्य है अथवा अनित्य' ? जैसा कि भट्टमिश्र (कुमारिलभट्ट) ने कहा

५८६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणेऽनुमाने हेत्वाभास
प्रशस्तपादभाष्यम्
वक्ष्यामः । ननु शास्त्रे तत्र तत्रोभयथा दर्शनं संशयकारणमपदिश्यत
कारण असाधारण होते हैं, इसी प्रकार क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व ये
दोनों स्वतन्त्र रूप से अलग-अलग मन से भिन्न वस्तुओं में रहते हुए भी
मिलित होकर केवल मनरूप पक्ष में ही हैं, अतः क्रियावत्त्व से युक्त
अस्पर्शवत्त्व असाधारण ही है, सन्दिग्ध नहीं । (सिद्धान्तपक्ष) हम आगे
कहेंगे कि कथित स्थिति में अचाक्षुषत्व विशिष्ट प्रत्यक्षत्व या क्रियावत्त्व-
विशिष्ट अस्पर्शवत्त्व 'अनध्यवसित' होगा, सन्दिग्ध नहीं ।
(पूर्वपक्ष) शास्त्र (वैशेषिक सूत्रों आ.२, आ.२, सू.१८ तथा १९) में
एक धर्मी में विरुद्ध दो धर्मों के ज्ञान को संशय का कारण कई स्थानों
में कहा गया है । अतः उक्त कथन शास्त्र के विरुद्ध है ।
न्यायकन्दली
यच्चाह न्यायवार्त्तिककारः - विभागजत्वं विभागजविभागासमवायिकारणकत्वं नर्ते
शब्दात् सम्भवतीति सर्वतो व्यावृत्तेः संशयहेतुरिति ।
अत्राह-ततश्चानध्यवसित इति वक्ष्याम इति । विरुद्धयोः सन्निपातोऽसाधा-
रणोऽसाधारणत्वाच्चानध्यवसितोऽयमिति वक्ष्यामः । किमुक्तं स्यात् ? असाधारणो
धर्मोऽध्यवसायं न करोतीति वक्ष्याम इत्यर्थः ।
है कि (गन्धवत्त्वादि) असाधारण धर्म भी (पृथिवी में नित्यत्व एवं अनित्यत्व के)
संशय का कारण है । (उसकी रीति यह है कि) उक्त असाधारण धर्म किसी सपक्ष
में एवं किसी भी विपक्ष में न रहने के कारण पृथिवी में नित्यत्व का अभाव
अनित्यत्व और अनित्यत्व का अभाव नित्यत्व इन दोनों का साधन कर सकता है;
क्योंकि दो विरुद्ध धर्मों की सत्ता एक धर्मी में सम्भव नहीं है, अतः पृथिव्यादि में
गन्धवत्त्वादिरूप असाधारण धर्मों से नित्यत्वादि का संशय ही होता है ।
जैसा कि न्यायवार्त्तिककार (उद्योतकर) ने भी कहा है कि-विभागजत्व अर्थात्
विभागज विभागरूप असमवायिकारण से उत्पन्न होना शब्द से भिन्न किसी दूसरी
वस्तु में सम्भव नहीं है, अतः सपक्ष और विपक्ष इन दोनों में से किसी में भी न रहने
के कारण उक्त विभागजत्वरूप असाधारण धर्म शब्द में संशय का कारण है ।
इसी आक्षेप का समाधान 'ततश्चानध्यवसित इति वक्ष्यामः' इस वाक्य के द्वारा
किया गया है । (अर्थात्) चूँकि विरुद्ध दो धर्मों का एक आश्रय में समावेश ही असाधारण
है, अतः इसी असाधारण्यके कारण वह 'अनध्यवसित' नाम का हेत्वाभास है, यह

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५८७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५८७
प्रशस्तपादभाष्यम्
इति, न, संशयो विषयद्वैतदर्शनात् । संशयोत्पत्तौ विषयद्वैतदर्शनं
कारणम्, तुल्यबलत्वे च तयोः परस्परविरोधान्निर्णयानुत्पादकत्वं
(सिद्धान्त) नहीं, यहाँ कोई भी शास्त्रविरोध नहीं है; क्योंकि एक ही
विषय के दो विरुद्ध प्रकार के ज्ञान से संशय होता है, (एक धर्मी में दो
विरुद्ध धर्मों के ज्ञान से नहीं)। अर्थात् विषय के द्वैतदर्शन (दो प्रकारों से देखने)
से ही संशय की उत्पत्ति होती है। उन (क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व) दोनों
न्यायकन्दली
विरुद्धाव्यभिचारिणः संशयहेतुभावे प्रतिपादिते शास्त्रविरोधं
चोदयति- नन्विति । उभयथा दर्शनमिति । उभाभ्यां विरुद्धधर्माभ्यां सहैकस्य
धर्मिणो दर्शनं संशयकारणमिति शास्त्रे तत्र तत्र स्थाने कथितम् - 'दृष्टं च
दृष्टवद् दृष्ट्वा' संशयो भवति (वै.अ.२,आ.२, सू.१८) । अमूर्त्तत्वेन
सहात्मनि दृष्टमस्पर्शवत्त्वं यथा मनसि दृश्यते, तथा मूर्त्तत्वेन सह परमाणौ
दृष्टं क्रियावत्त्वमपि दृश्यते, अतोऽमूर्त्तत्वेन सह दृष्टमस्पर्शवत्त्वमिव मूर्त्तत्वेन सह
दृष्टं क्रियावत्त्वमपि दृष्ट्वा संशयो भवति किं मनो मूर्त्तम् ? किमुतामूर्त्तम् ? इति ।
'यथादृष्टमयथादृष्टमुभयथादृष्टत्वात् संशयः' (अ. २, आ. २, सू. १९) । यथा
हम आगे कहेंगे । (प्र.) इससे क्या अभिप्राय निकला ? (उ.) यही कि हम आगे
कहेंगे कि 'असाधारण धर्म' (हेतु) 'अध्यवसाय' (निश्चय) को उत्पन्न नहीं करता ।
'विरुद्धाव्यभिचारी' हेतु (असाधारण धर्म) संशय का कारण नहीं है । कथित
इस पक्ष के ऊपर 'ननु' इत्यादि ग्रन्थ से (वैशेषिक सूत्र रूप) शास्त्र के विरोध का
उद्भावन किया गया है । 'उभयथा दर्शनम्' इत्यादि सन्दर्भ का यह अभिप्राय है कि
'उभाभ्याम्' अर्थात् 'विरुद्ध दो धर्मों के साथ' एक धर्मी का ज्ञान संशय का
कारण है । यह जो शास्त्र (वैशेषिक सूत्र) में उन सब स्थानों में कहा गया है
उसका विरोध होगा ।
जैसे कि 'दृष्टं च दृष्टवत्' (वै.सू.अ.२, आ.२, सू.१८) इस सूत्र के द्वारा
कहा गया है कि 'दृष्ट्वा संशयो भवति' (अभिप्राय यह है कि) मन में अमूर्त्तत्व के
साथ आत्मा में रहनेवाला अस्पर्शवत्त्व भी है एवं परमाणु में मूर्त्तत्व के साथ
रहनेवाला क्रियावत्त्व भी मन में है, अतः यह संशय होता है कि 'मन मूर्त्त है या
अमूर्त्त' ? 'यथादृष्टमयथादृष्टमुभयथादृष्टत्वात् संशयः' (वै.सू.अ.२, आ.२, सू.१९)
के द्वारा यह प्रतिपादन किया गया है कि 'यथादृष्ट' और 'अयथादृष्ट' इन दोनों
प्रकार से ज्ञात धर्म के द्वारा संशय होता है । कहने का तात्पर्य है कि 'यथा' अर्थात्
जिस प्रकार मूर्त्तत्व की व्याप्ति से युक्त क्रियावत्त्व के साथ मन की उपलब्धि होती
है एवं 'अयथादृष्ट' अर्थात् उसी प्रकार इससे विरुद्ध अमूर्त्तत्व के साथ अवश्य
रहनेवाले क्रियावत्त्व के साथ भी मन की उपलब्धि होती है, अतः 'उभयथादृष्ट' अर्थात्

सूत्रार्थो यदिहद्धाव्यभिचारिधर्मद्वयोपनिपातात् संशय इत्यभिप्रायः ।

५८८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-
न्यायकन्दली
येन धर्मेण मूर्त्तव्याव्यभिचारिणा क्रियावत्त्वेन समं 'दृष्टम्' मनस्तस्मात् 'अयथादृष्टम्'
अमूर्त्तव्याव्यभिचारिणा स्पर्शवत्त्वेन समं दृष्टम्, अतः 'उभयथादृष्टत्वात्' संशयः किं
क्रियावत्त्वान्मूर्त्तं मनः ? उतास्पर्शवत्त्वादमूर्त्तम् ? इति सूत्रार्थः । तेन विरुद्धाव्य-
भिचारिणः संशयहेतुत्वं निराकुर्वतः शास्त्रविरोधः ।
एतत् परिहरति-न संशयः, विषयद्वैतदर्शनादिति । यत् त्वयोक्तं शास्त्रविरोध
इति, तन्न, यस्मात् संशयो विषयद्वैतदर्शनाद् भवति । एतदेव विवृणोति-संशयोत्पत्तौ
विषयद्वैतदर्शनं कारणमिति । यादृशे धर्मिण्यूर्ध्वस्वभावे संशयो जायते, 'स्थाणुर्वा पुरुषो
वा' इति, तादृशस्य विषयस्य पूर्वं द्वैतदर्शनमुभयथादर्शनं स्थाणुत्वपुरुषत्वाभ्यां सह दर्शनं
संशयकारणम्, न त्वेकस्य धर्मिणो विरुद्धधर्मद्वयसन्निपातस्तस्य कारणम्, तस्मान्नायं
सूत्रार्थो यदिहद्धाव्यभिचारिधर्मद्वयोपनिपातात् संशय इत्यभिप्रायः ।
तथा च दृष्टं च दृष्टवद्दृष्ट्वेत्यस्यायमर्थः- पूर्वमेव 'दृष्टम्' पदार्थं
स्थाणुं वा पुरुषं वा, 'दृष्टवद्' दृष्टाभ्यां स्थाणुपुरुषान्तराभ्यां तुल्यं वर्तमानं
दृष्टम्, स्थाणुपुरुषान्तरसमानमिति यावत्, देशान्तरे कालान्तरे वा पुनर्द्दष्ट्वा
मन की उक्त दोनों प्रकार से उपलब्धि होने के कारण यह संशय होता है कि
'यतः मन क्रियाशील है, अतः मूर्त्त है' ? अथवा 'मन में स्पर्श नहीं है, अतः मन
अमूर्त्त है' ? यही उक्त दोनों वैशेषिक सूत्रों के अर्थ हैं । जो कोई
विरुद्धाव्यभिचारी (असाधारण) धर्म को संशय का कारण नहीं मानते, उन्हें उक्त
दोनों सूत्ररूप शास्त्रों के विरोध का सामना करना पड़ेगा ।
'न, विषयद्वैतदर्शनात्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा सिद्धान्ती इस विरोध का
परिहार करते हैं । अर्थात् आप (पूर्वपक्षी) ने जो यह कहा है कि 'शास्त्र-विरोध
है' सो नहीं है; क्योंकि उक्त दोनों सूत्रों से यही कहा गया है कि विषय दो प्रकार
से जानने के कारण 'विषयद्वैतदर्शन' से संशय उत्पन्न होता है । 'संशयो विषय-
द्वैतदर्शनाद् भवति' अपने इस वाक्य का ही 'संशयोत्पत्तौ विषयद्वैतदर्शनं कारणम्'
इस वाक्य के द्वारा विवरण देते हैं । अभिप्राय यह है कि 'स्थाणुर्वा पुरुषः' में
ऊँचाई वाले जिस धर्मी में 'स्थाणुर्वा पुरुषः' इस आकार का संशय होता है, उस
संशय के प्रति पहले 'विषय' का 'द्वैतदर्शन' अर्थात् 'उभयथा दर्शन' फलतः पुरुष
और स्थाणु दोनों में समान रूप से ऊँचाई का देखना ही कारण है । उस संशय के
प्रति एक धर्मी में विरुद्धाव्यभिचारी दो धर्मों का सम्मिलन कारण नहीं है । अतः
उक्त सूत्र का यह अभिप्राय नहीं है कि विरुद्धाव्यभिचारी दो धर्मों का एक धर्मी में
समावेश संशय का कारण है ।
तदनुसार 'दृष्टञ्च दृष्टवद् दृष्ट्वा' इस सूत्र का यह अभिप्राय है कि पूर्वकाल
मे 'दृष्ट' स्थाणु या पुरुष को ही 'दृष्टवत्' अर्थात् वर्तमानकाल में दूसरे स्थाणु या दूसरे
पुरुष के 'तुल्य' देखकर अर्थात् दूसरे काल या दूसरे देश में दूसरे पुरुष को दूसरे
स्थाणु के समान फिर से देखकर, किसी कारणवश उन दोनों के स्थाणुत्व और पुरुषत्व

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८९
न्यायकदली
कुतश्चिन्निमित्ताद्विशेषानुपलम्भे सति संशयो भवति । दृष्टं चेति चशब्देन पूर्वमदृष्टमपि
पदार्थं दृष्टवद् दृष्टाभ्यां स्थाणुपुरुषा्तराभ्यां समानं दृष्ट्वा संशय इत्यर्थः ।
सूत्रान्तरं च यथादृष्टमयथादृष्टमुभयथादृष्टमित्येकधर्मिविशेषानुस्मरणकृतं संशयं
दर्शयति । पूर्वदृष्टमेव पुरुषं 'यथादृष्टम्' येन येनावस्थाविशेषेण दृष्टं मुण्डं जटिलं वा,
तस्माद्यथादृष्टमन्येनान्येनावस्थाभेदेन दृष्टम्, कालान्तरे दृष्ट्वा, अवस्थाविशेषमपश्यतः
स्मरतश्चैवं तस्यैव प्राक्तनीमवस्थितामुभयीमवस्थां किमयमिदानीं मुण्डः किं वा जटिल
इति संशयः स्यादिति सूत्रार्थः ।
न तु विरुद्धाव्यभिचारी संशयहेतुः, प्रयोगाभावात् । यदि तावदाद्यस्य
हेतोर्यथोक्तलक्षणत्वमवगतं तदा तस्माद्योऽर्थोऽवधारितः स तथैवेति न द्वितीयस्य
प्रयोगः, प्रतिपत्तिबाधितत्वात् । अथायं यथोक्तलक्षणो न भवति, तदानी-
मयमेव दोषो वाच्यः, किं प्रत्यनुमानेन ? विरुद्धं प्रत्यनुमानं न व्यभिचरति,
नातिवर्तत इति विरुद्धाव्यभिचारी प्रथमो हेतुस्तस्यायमेव दोषो यद्विपरीतानु-
रूप असाधारण धर्म को न समझने के कारण संशय उत्पन्न होता है । 'दृष्टञ्च'
इस वाक्य के 'च' शब्द से भी यही अर्थ व्यक्त होता है कि जो पदार्थ (स्थाणु या
पुरुष में) पहले से ज्ञात नहीं है, अगर उसका भी दूसरे स्थाणु वा दूसरे पुरुष की
तरह ज्ञान होता है, तो उस ज्ञान के बाद भी संशय की उत्पत्ति होती है ।
'यथादृष्टमयथादृष्टमुभयथादृष्टम्' इस दूसरे सूत्र के द्वारा वह संशय दिखलाया
गया है कि जिसकी उत्पत्ति एक धर्मी में (अनेक धर्मों की) स्मृति से होती है ।
पहले देखा हुआ पुरुष ही अगर 'यथादृष्ट' हो, अर्थात् जिन-जिन विशेष
अवस्थाओं से-जटी अथवा मुण्डी प्रभृति अवस्थाओं से-युक्त होकर जो पूर्व में
देखा गया हो, वही पुरुष अगर उससे 'अयथादृष्ट' अर्थात् (उन पूर्वदृष्ट
अवस्थाओं से) दूसरी-दूसरी अवस्थाओं से युक्त रूप में दूसरे समय देखा जाता है
एवं (उसकी वर्त्तमान) विशेष प्रकार की अवस्था की उपलब्धि नहीं होती है एवं
पूर्व की जटी और मुण्डी दोनों अवस्थाओं का स्मरण होता है, तो इस स्थिति में
इसी संशय की उत्पत्ति होती है कि यह 'जटाधारी है मुण्डित-मस्तक' ?
('विरुद्धाव्यभिचारी' हेतु में संशय की कारणता सूत्रों से नहीं कही गयी है
इतनी ही नहीं वस्तुतः) विरुद्धाव्यभिचारी हेतु संशय का कारण हो ही
नहीं सकता; क्योंकि उसका प्रयोग ही सम्भव नहीं है । ('मूर्त्तं मनः स्पर्श-
वत्त्वात्', 'अमूर्त्तं मनः क्रियावत्त्वात्' इत्यादि स्थलों में) साध्य के ज्ञापकत्व के
प्रयोजक जितने जिन प्रकार के (सपक्षसत्त्वादि) धर्म हैं- पहले हेतु में उन सबों
का ज्ञान है, तो फिर इस हेतु से जो निश्चित होगा, वह उसी प्रकार का होगा ।
अतः (उस विरुद्ध साध्य के साधन के लिए) दूसरे हेतु का प्रयोग ही नहीं हो
सकेगा; क्योंकि वह प्रथम हेतुजनित प्रथम साध्य की अनुमिति (प्रतिपत्ति) से
बाधित है। ऐसी स्थिति में अगर प्रथम हेतु में साध्य ज्ञान के प्रयोजक (सपक्षसत्त्वादि)

५१० न्यायकन्दलीसहितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-
प्रशस्तपादभाष्यम्
स्यान्न तु संशयहेतुत्वम्, न च तयोस्तुल्यबलवत्त्वमस्ति, अन्यतरस्यानुमेयोद्दे-
शस्यागमबाधितत्वादयं तु विरुद्धभेद एव ।
के ज्ञान समान बल के हैं, इससे इतना ही होगा कि दोनों में से कोई
भी निश्चय का उत्पादन न कर सकेगा । इससे (निश्चय की इस
अनुत्पादकता) से उनमें संशय की कारणता नहीं आ सकती । वस्तुतः
मूर्तत्व का साधक क्रियावत्त्व और अमूर्तत्व का साधक स्पर्शवत्त्व ये
दोनों हेतु समान बल के हैं भी नहीं; क्योंकि इन दोनों में से एक
(अस्पर्शवत्त्व) का साध्य (अमूर्तत्त्व) मन में 'तद्भावादणु मनः' (अ.६।
आ.१ । सू.२३) इस वैशेषिक सूत्ररूप आगम से बाधित है । अतः
(जिसे पूर्वपक्षी दूसरे प्रकार का सन्दिग्ध हेत्वाभास कहते हैं) वह विरुद्ध
हेत्वाभास का ही एक प्रभेद है ।
न्यायकन्दली
मानसम्भवः । द्वितीयेन प्रतिपक्षे उपस्थाप्यमाने प्रथमस्य साध्यसाधकत्वाभावादिति चेत् ?
यदि द्वितीयवत् प्रथममप्यनुमानलक्षणोपपन्नम्, न प्रथमस्यासाधकत्वम् । तदसाधकत्वेऽन्यत्रा-
प्यनुमाने क आश्वासः ? वस्तुनो द्वैरूप्याभावादसाधकत्वमिति चेत् ? वस्तु द्विरूपं न
भवतीति केनैतदुक्तम् ? यथा हि प्रमाणमर्थं गमयति, तदेव हि तस्य तत्त्वम् ।
धर्मों का ज्ञान ही नहीं है, तो फिर उस धर्मविहीनता के प्रयोजक हेत्वाभास
का ही उद्भावन करना चाहिए, (उस हेतु को दूषित करने के लिए) प्रथमा-
नुमान (के विरोधी अनुमान) के प्रयोग से क्या प्रयोजन ? (प्र.) 'विरुद्धं
न व्यभिचरति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'विरुद्धव्यभिचारी' शब्द का यह अर्थ
है कि जो हेतु अपने विरोधी अनुमान की उत्पत्ति को न रोक सके, वही
हेतु 'विरुद्धव्यभिचारी' है । तदनुसार पूर्व में प्रयुक्त हेतु ही 'विरुद्धव्यभिचारी'
है । इस हेतु में यही 'दोष' है कि इसके रहते भी दूसरे हेतु से विपरीत अनुमिति
की उत्पत्ति होती है; क्योंकि द्वितीय (प्रति) हेतु के द्वारा जब विरोधी पक्ष
की उपस्थिति हो जाती है, तो अपने साध्य के साधन करने की क्षमता पहले
हेतु से जाती रहती है । (उ.) अगर दूसरे हेतु की तरह पहले हेतु में अनुमान
के उत्पादक (सपक्षसत्त्वादि) सभी लक्षण हैं, तो फिर पहला हेतु अपने साध्य
के साधन में अक्षम ही नहीं है; क्योंकि सपक्षसत्त्वादि रूपी बलों के रहते हुए
भी यदि प्रथम हेतु में साध्य के साधन का सामर्थ्य न माना जाय, तो और
अनुमान प्रमाणों में ही कैसे विश्वास किया जा सकेगा कि वह अपने साध्य
का साधन करेगा ही ? अगर यह कहें कि (प्र.) चूँकि कोई भी वस्तु (विरुद्ध)
दो प्रकार की नहीं हो सकती, अतः एक (पहले) हेतु को असाधक मान लेते
हैं । (उ.) यह किसने कहा कि एक वस्तु (विरुद्ध) दो प्रकार की नहीं हो
सकती ? प्रमाण से जिस प्रकार की वस्तु की सिद्धि होगी, वही प्रकार उस

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५९१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५९१
न्यायकदली
अथैकं वस्तुभयात्मकं न भवतीति सुदृढप्रमाणावसितोऽयमर्थो न शक्यतेऽन्यथा
कर्तुम्, तर्हि तयोस्तुल्यबलत्वं नास्त्येव, एकस्य यथार्थत्वादिति, कुतः संशयः ? यद्यपि
वस्तुवृत्त्या द्वयोर्यथार्थता नास्ति, तथाप्यन्यतरस्य विशेषानुपलम्भेन भवेत् तुल्यबलत्वाभि-
मान इति चेदस्त्वेवम्, तथापि तुल्यबलतयाद्योत्तरेणार्थं प्रतिबध्यते, तथाद्येनाप्युत्तरं
प्रतिबध्यत इति परस्परं स्वसाध्यसाधकत्वं न स्यात्, न तु संशयकर्तृत्वम्,
विशेषानुपलम्भमात्रेण विरुद्धोभयविशेषोपस्थापनाभावादित्याह-तुल्यबलत्वे चेति ।
ननु यद्वस्तु तन्मूर्त्तं भवत्यमूर्त्तं वा, न मूर्त्तामूर्त्ताभ्यां प्रकारान्तर-
मुपलभ्यम्, अतो मनसि मूर्त्तत्वामूर्त्तत्वयोरनुपलम्भेऽपि द्वयोरभावं द्वयोरपि
वस्तु का 'तत्त्व' होगा (यथार्थ रूप होगा) । अगर सुदृढ़ प्रमाण के द्वारा यह
निश्चित है कि वस्तु दो प्रकार की नहीं हो सकती, अतः उसका निराकरण नहीं
किया जा सकता, तो फिर दोनों हेतु समान बल के हैं ही नहीं; क्योंकि उनमें एक
यथार्थ (अनुमिति का साधक) है । अतः संशय किस प्रकार होगा ? (प्र.) यद्यपि
वस्तुस्थिति यही है कि (परस्पर विरोधी साध्यों के साधक) दोनों हेतु यथार्थ
(ज्ञान) के साधक नहीं हो सकते, फिर भी दोनों पक्षों में से किसी एक में (यथार्थ
के प्रयोजक) विशेष धर्म की उपलब्धि नहीं होती है, अतः दोनों हेतुओं में समान
बल होने का अभिमान होता है । (उ.) अगर दोनों हेतुओं को समान बल का
मान भी लें, तो भी जैसे कि पहला हेतु दूसरे हेतु को प्रतिरुद्ध करता है, वैसे ही
(उसी के समान बल होने के कारण) दूसरा हेतु भी पहले हेतु को प्रतिरुद्ध कर
सकता है । इस प्रकार दोनों परस्पर एक-दूसरे से प्रतिरुद्ध होने के कारण केवल
अपने-अपने साध्य का साधन भर न कर सकेंगे । इससे यह सम्भव नहीं है कि
दोनों मिलकर संशय का उत्पादन करें; क्योंकि 'दोनों के विशेष (असाधारण) धर्म
उपलब्ध नहीं हैं' केवल इतने से ही दोनों हेतुओं से परस्पर विरुद्ध दो साध्यों की
उपस्थिति नहीं हो सकती । यही बात 'तुल्यबलत्वे च' इत्यादि भाष्य के द्वारा कही
गयी है । (प्र.) जो कोई भी वस्तु वह या तो मूर्त्त ही होगी या फिर अमूर्त्त ही
होगी; क्योंकि (परस्पर विरोधी) दो प्रकारों में से किसी एक ही प्रकार की होगी,
दोनों से भिन्न किसी तीसरे प्रकार की नहीं; (जैसे कि कोई भी वस्तु द्रव्य ही होगी
वा अद्रव्य ही, द्रव्य भी न हो, और अद्रव्य भी न हो ऐसे किसी तीसरे प्रकार की
वस्तु की उपलब्धि नहीं होती है), अतः मूर्त्त या अमूर्त्त इन दोनों को छोड़कर
वस्तुओं का कोई तीसरा प्रकार उपलब्ध नहीं है । अतः मन में मूर्त्तत्व और
अमूर्त्तत्व इन दोनों में से किसी एक के निश्चित न होने पर भी जिस पुरुष के मन
में मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व दोनों की सम्भावना या दोनों के अभाव की भी सम्भावना
नहीं है, उस पुरुष को मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व इन दोनों में से एक पक्ष का यह
संशय होता है कि 'मन मूर्त्त है या अमूर्त्त ?' (उ.) यह ठीक है कि उस पुरुष को
उक्त प्रकार का संशय होता है; किन्तु वह इस कारण नहीं होता कि मनरूप धर्मी में

५९२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-
न्यायकन्दली
भावमसम्भावयतो भवत्येवान्यतरपक्षे स संशयः । सत्यं भव्येय, न तु विरुद्धाव्यभि-
चारिधर्मद्वयसन्निपातात्, किन्तु वस्तुत्यात् । यन्मूर्त्तामूर्त्ताभ्यां दृष्टसाहचर्यं मनसि
प्रतीयमानं स्मृतिद्वारेण तयोरुपस्थापनं करोति ।
तुल्यबलत्वमभ्युपगम्य विरुद्धाव्यभिचारिणः संशयहेतुत्वं निरस्तम्, न त्वनयोस्तुल्य-
बलत्वमस्ति, अन्यतरस्यानुमेयोद्देशस्य 'अमूर्त्तं मनः' इत्यस्यागमेन 'तदभावादणु मनः'
(अ.७,आ..१,सू.२३) इति सूत्रेण बाधितत्वात् । अथेदं सूत्रमप्रमाणम् ? व्यापकमेव मनः,
तदा मनःसद्भावे न किञ्चित् प्रमाणमस्तीत्यमूर्त्तं मनः, अस्पर्शत्वादिति हेतुराश्रयासिद्धः । अथ
युगपज्ज्ञानानुत्पत्त्या सिद्धं मनस्तदा धर्मिग्राहकप्रमाणबाधितो युगपज्ज्ञानानुत्पत्तेर्मनसोऽणु-
विरुद्धाव्यभिचारी मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व रूप दोनों धर्मों का संनिवेश है । वह तो
इस वस्तुस्थिति के कारण होता है कि क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व रूप जो दोनों
धर्म मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व के साथ क्रमशः घटादि और आकाशादि में ज्ञात हो
चुके हैं, उन दोनों की जब मन में प्रतीति होती है, तो वे मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व इन
दोनों को मनरूप धर्मी में उपस्थित कर देते हैं ।
विरुद्धाव्यभिचारी दोनों हेतुओं को समान बल का मानकर उनमें संशय की
हेतुता का खण्डन किया गया है; किन्तु यथार्थ में वे दोनों समान बल के हैं ही
नहीं; क्योंकि उन दोनों में से पहला 'अनुमेयोद्देश' अर्थात् 'अमूर्त्तं मनः' यह
प्रतिज्ञावाक्य 'तदभावादणु मनः' इस सूत्ररूप आगमन से बाधित होने के कारण
'आगमविरोधी' है । अगर उक्त सूत्र को प्रमाण न मानें, तो फिर मन (आकाशादि
की तरह) व्यापक द्रव्य ही होगा, ऐसी स्थिति में मन की सत्ता में कोई प्रमाण न
रहने के कारण (अमूर्त्तं मनः, अस्पर्शवत्त्वात्) यह हेतु आश्रयासिद्ध होगा ।
अगर एक ही समय दो ज्ञानों की उत्पत्ति न होने के कारण मन की सिद्धि मान
लें, तो मन का अमूर्त्तत्वरूप साध्य मनरूप धर्मी के ज्ञापक 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्ति' रूप
प्रमाण से ही बाधित होगा; क्योंकि, 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्ति' अर्थात् एक ही समय दो
ज्ञानों की अनुत्पत्ति तभी उपपन्न हो सकती है जब कि मन अणु (मूर्त्त) हो;
क्योंकि मन अगर व्यापक होगा' तो एक ही समय सभी इन्द्रियों के साथ
सम्बद्ध हो सकेगा, जिससे एक ही क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति सम्भव
हो जाएगी । 'अनुमेयोद्देश' अर्थात् ज्ञान में आगम के विरोध से कौन सा दोष
होगा ? इसी प्रश्न का समाधान 'अयं तु विरुद्धभेद इति' इस भाष्य वाक्य से
किया गया है । अर्थात् 'अनुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा' इस प्रतिज्ञा-लक्षण में
'अविरोधि' पद के उपादान से जिन प्रत्यक्षादि विरुद्ध प्रतिज्ञाभासों का निराकरण
किया गया है, उन्हीं (निराकृत प्रतिज्ञाभासों) में से ही 'अमूर्त्तं मनः' यह
आगमविरोधी प्रतिज्ञा भी है । अतः यहाँ प्रतिज्ञाभास ही दोष है, सन्दिग्ध रूप
हेत्वाभास नहीं । प्रकृत भाष्य वाक्य में प्रयुक्त 'तु' शब्द के द्वारा यह व्यक्त किया

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५९३

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५९३
प्रशस्तपादभाष्यम्
यश्चानुमेये विद्यमानस्तत्समानासमानजातीययोरसन्नेव सोऽन्य-
तरासिद्धोऽनध्यवसायहेतुत्त्वादनध्यवसितः, यथा सत्कार्यमुत्पत्तेरिति ।
४. कथित अन्यतरासिद्ध हेत्वाभास ही यदि अनुमेय (पक्ष) में रहे;
किन्तु सपक्ष और विपक्ष में न रहे, तो वही 'अनध्यवसाय' रूप ज्ञान
का हेतु होने से 'अनध्यवसित' नाम का हेत्वाभास कहा जाता है ।
जैसे कि ('कार्यं सद् उत्पत्तिमत्त्वात्' इस अनुमान का उत्पत्तिमत्त्व) हेतु
न्यायकन्दली
परिमाणत्वे सति सम्भवात्, व्यापकत्वे मनसो युगपत्समस्तेन्द्रियसम्बन्धायुगपदेव ज्ञानानि
प्रसज्यन्ते ।
अनुमेयोद्देशस्यागमविरोधः किं दूषणमत आह-अयं तु विरुद्धभेद इति ।
अयमागमविरुद्धोऽनुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञेत्यविरोधिग्रहणेन निवर्त्तितानां प्रत्यक्षादि-
विरुद्ध नां प्रतिज्ञाभासानां प्रभेद एव, नायं सन्दिग्धो हेत्वाभासः; किन्तु विरुद्धप्रभेद
एवेति तु शब्दार्थः ।
अनध्यवसित इत्यसाधारणो हेत्वाभासः कथ्यते । तं व्युत्पादयति-
यश्चानुमेये विद्यमानस्तत्समानासमानजातीययोरित्यादि । सर्वं कार्यमुत्पादात्
पूर्वमपि सदिति साध्यते, उत्पत्तेरिति हेतुः सांख्यानाम् । सति सपक्षे व्योमादा-
वसति विपक्षे गगनकुसुमादावभावात्रैकतरपक्षाध्यवसायं करोति । विशिष्टार्थ-
गया है कि अमूर्तत्व का साधक (अस्पर्शवत्त्व हेय) विरुद्ध हेत्वाभास का ही एक
प्रभेद है (सन्दिग्ध नहीं) ।
'असाधारण' नाम का हेत्वाभास ही (इस शास्त्र में) 'अनध्यवसित' शब्द से
कहा गया है । 'यश्चानुमेये विद्यमानस्तत्समानजातीययोः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा
उसी (असाधारण) को समझाते हैं । 'सभी कार्य अपनी उत्पत्ति से
पहले भी 'सत्' अर्थात् विद्यमान ही हैं' इसको सिद्ध करने के लिए सांख्याचार्यगण
'उत्पत्तेः' इस हेतुवाक्य का प्रयोग करते हैं । इस वाक्य के द्वारा उपस्थापित
यह 'उत्पत्ति' रूप हेतु 'असाधारण' (या अनध्यवसित) नाम का हेत्वाभास
है; क्योंकि (सदा से विद्यमान) आकाशरूप सपक्ष में भी यह हेतु नहीं है एवं
(सर्वदा असत्) आकाशकुसुमादि में भी यह 'उत्पत्ति' रूप हेतु नहीं है
(क्योंकि आकाश और आकाशकुसुम इन दोनों से किसी की उत्पत्ति नहीं
होती), अतः यह हेतु (कार्यों की उत्पत्ति से पूर्व सत्त्व और असत्त्व) इन
दोनों में से किसी भी पक्ष का साधन नहीं कर सकता । गगनादि नित्य पदार्थों
की तरह घटादि अनित्य पदार्थ भी अगर पहले से ही हैं, तो फिर 'उत्पत्ति' रूप
हेतु कहाँ रहेगा ? कहीं पर निश्चित न रहने के कारण सांख्याचार्यों के इस

५९४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-
प्रशस्तपादभाष्यम्
अयमप्रसिद्धोऽनपदेश इति वचनादवरुद्धः । ननु चायं विशेषः संशय-
हेतुरभिहितः शास्त्रे तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु विशेषस्योभयथा
अनध्यवसित नाम का हेत्वाभास है । सूत्रकार ने इसे 'अप्रसिद्धोऽन-
पदेशोऽसन् सन्दिग्धश्चानपदेशः' (अ.३,आ.१,सू.१५) इस सूत्र के द्वारा
संग्रह किया है ।
(प्र.) (सपक्ष और विपक्ष में न रहनेवाले एवं केवल पक्ष में ही
रहनेवाले) हेतु को 'तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु विशेषस्योभयथादृष्टत्वात्'
(अ.२,आ.२,सू.२२) इस वैशेषिक सूत्रमें संशय का कारण कहा गया है,
न्यायकन्दली
क्रियाजननयोग्येन रूपेण पूर्वमनभिव्यक्तस्य पश्चादभिव्यक्तिरेवोत्पत्तिरिति सांख्याः, तेन
तेषामुत्पत्तेरिति हेतोर्न स्वतोऽसिद्धता ।
अयमनध्यवसितो हेत्वाभासः केन वचनेन सूत्रकृता संगृहीत इत्याह-अयमप्रसिद्धोऽ-
ऽनपदेश (अ.३, आ.१,सू.१५) इति । अनैकान्तिकवदसाधारणो धर्मः संशयं करोति,
तेनास्य 'सन्दिग्धश्चानपदेशः' इत्यनेन संग्रहो युक्तो न पुनरप्रसिद्धवचनेनेत्यभिप्रायेणाह-ननु
चेति । तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेष्विति पञ्चम्यर्थे सप्तमी । पदार्थानां विशेषस्तुल्यजाती-
येभ्यो भवति, अर्थान्तरभूतेभ्यश्च भवति । यथा पृथिव्यां गन्धवत्त्वं विशेषो द्रव्या-
न्तरेभ्योऽपि स्याद् गुणकर्मभ्यश्च भवति । शब्दे च श्रावणत्वं विशेषो दृश्यते । तत् किं
उत्पत्तिरूप हेतु में असत्कार्यवादियों को स्वतः असिद्धता का आक्षेप करना उचित
नहीं है; क्योंकि (जल-हरणादि) विशेष कार्यों के उपयोगी रूप से अनभिव्यक्त
(किन्तु सर्वदा विद्यमान घटादि ) कार्यों की अभिव्यक्ति ही सांख्याचार्यों के मत से
कार्यों की 'उत्पत्ति' है ।
इस 'अनध्यवसित' हेत्वाभास का संग्रह सूत्रकार ने किस सूत्र (वचन) से किया
है ? इसी प्रश्न का समाधान 'अयमप्रसिद्धोऽनपदेशः' भाष्य के इस वाक्य के
द्वारा किया गया है । अनैकान्तिक (सव्यभिचार) हेत्वाभास की तरह यह असाधारण
(अनध्यवसित) हेत्वाभास भी (साध्य) संशय को उत्पन्न करता है, अतः इसका संग्रह
'सन्दिग्धश्चानपदेशः' सूत्र के इस अंश के द्वारा ही होना उचित है, 'अप्रसिद्धवचन'
अर्थात् 'अप्रसिद्धोऽनपदेशः' इस अंश के द्वारा नहीं । 'तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु'
इस वाक्य के दोनों पदों में सप्तमी विभक्ति का प्रयोग पञ्चमी विभक्ति के अर्थ में
किया गया है । (अभिप्राय यह है कि) पदार्थों का अपने सजातीय और विजातीय
दोनों प्रकार के पदार्थों की अपेक्षा 'विशेष' अर्थात् असाधारण धर्म होता है ।
जैसे कि पृथिवी का गन्धवत्त्व रूप 'विशेष' उक्त दोनों ही प्रकार से पृथ्वी
का विशेष है; क्योंकि गन्धवत्त्व पृथिवी के (द्रव्यत्व रूप से) सजातीय जलादि द्रव्यों में
भी नहीं है; और उसके विजातीय गुणादि पदार्थों में भी नहीं है । इसी प्रकार
शब्द में भी श्रावणत्व (श्रवणेन्द्रिय से गृहीत होना) रूप 'विशेष' है । उसके प्रसङ्ग

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५९५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५९५
प्रशस्तपादभाष्यम्
दृष्टत्वादिति (अ.२, आ. २, सू. ७) नान्यार्थत्वाच्छब्दे विशेषदर्शनात् ।
संशयानुत्पत्तिरित्युक्ते नायं द्रव्यादीनामन्यतमस्य विशेषः स्याच्छ्रावणत्वं
अतः कथित अनध्यवसित हेत्वाभास असाधारण के उक्त लक्षण से युक्त
होने के कारण संशय रूप ज्ञान का ही कारण होगा, अनध्यवसाय रूप
ज्ञान का नहीं; क्योंकि वस्तुओं के विशेष (व्यक्तिगत) धर्म ही उनके
सजातियों और विजातियों की अपेक्षा 'असाधारण' समझे जाते हैं ।
(उ.) यह आक्षेप युक्त नहीं है; क्योंकि उस सूत्र का कुछ दूसरा ही अर्थ है ।
किसी ने आक्षेप किया था कि शब्द में श्रावणत्व (कान से सुनना) रूप उसका
न्यायकन्दली
शब्दस्य रूपादिभ्यः समानजातीयेभ्योऽयं विशेषः ? किं वा विजातीयेभ्यः ? यदि शब्दो
गुणस्तदा रूपादिभ्यः सजातीयेभ्यो विशेषोऽयम्, अथ द्रव्यं कर्म वा ? तदा विजातीयेभ्य
इति शब्दे श्रावणत्वाद् द्रव्यं गुणः कर्मेति संशय इति पूर्वपक्षवादिना सूत्रविरोधे दर्शिते
सत्याह-नान्यार्थत्वादिति । नायं सूत्रार्थो यदसाधारणो धर्मः संशयहेतुरिति; किन्त्वस्यान्य
एवार्थः । तमेवार्थं दर्शयति-शब्दे विशेषदर्शनादित्यादिना । श्रोत्रग्रहणे योऽर्थः स शब्द
इति प्रतिपाद्य तस्मिन् द्रव्यं गुणः कर्मेति संशय इत्यभिहितं सूत्रकारेण । तस्यायमर्थः-तस्मिन्
में यह वितर्क उपस्थित होता है कि शब्द में क्या उसके सजातीय रूपादि गुणों की
अपेक्षा यह 'श्रावणत्व' रूप विशेष है, अथवा द्रव्यकर्मादि विजातीय पदार्थों की अपेक्षा
यह 'विशेष' है ? शब्द अगर गुण है तो फिर रूपादि उसके सजातियों की अपेक्षा
श्रावणत्व ही उसका विशेष है । शब्द अगर द्रव्य या कर्म है ? तो फिर
विजातीय की अपेक्षा यह श्रावणत्व रूप विशेष शब्द में है । इस रीति से श्रावणत्व
रूप असाधारण धर्म के द्वारा शब्द में 'यह द्रव्य है ? या गुण है ? अथवा कर्म हैं' ?
इस प्रकार के संशय की आपत्ति के द्वारा सूत्रविरोध का प्रसङ्ग पूर्वपक्षवादियों के
उठाने पर उसके समाधान के लिए ही भाष्यकार ने 'न, अन्यार्थत्वात्' यह वाक्य
लिखा है । अर्थात् उक्त सूत्र का यह अभिप्राय नहीं है कि 'असाधारण धर्म संशय का
कारण है', उस सूत्र का कोई दूसरा ही अर्थ है । 'शब्दे विशेषदर्शनात्' इत्यादि
सन्दर्भ के द्वारा वही दूसरा अर्थ प्रतिपादित हुआ है । 'जो वस्तु श्रवणेन्द्रिय के द्वारा
गृहीत हो वही शब्द है' यह प्रतिपादन करने के बाद सूत्रकार ने कहा कि
(श्रोत्रग्राह्य) उस वस्तु में यह संशय होता है कि 'यह द्रव्य है ? या गुण है ? अथवा
कर्म है ?' इस पर पूर्वपक्षवादी ने कहा कि श्रोत्रेन्द्रिय से गृहीत होनेवाले शब्दरूप
अर्थ में जिन संशयों का तुमने उल्लेख किया है उनसे 'श्रोत्रग्राह्यत्व' रूप असाधारण
धर्म में ही उक्त संशयों की कारणता व्यक्त होती है; किन्तु सो ठीक नहीं है; क्योंकि

५१६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-
प्रशस्तपादभाष्यम्
किन्तु सामान्यमेव सम्पद्यते, कस्मात् ? तुल्यजातीयेष्वर्थान्तर्भूतेषु
द्रव्यादिभेदानामैकैकशो विशेषस्योभयथादृष्टत्वादित्युक्तम्, न संशय-
असाधारण (विशेष) धर्म देखा जाता है, अतः कान से सुने जानेवाले एवं सत्ता
जाति से सम्बद्ध शब्द में 'यह द्रव्य है ? या गुण है ? अथवा कर्म है ?' इस
प्रकार का संशय नहीं होगा । इसी आक्षेप के समाधान में उक्त सूत्र के द्वारा
कहा गया है कि श्रावणत्व द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में से किसी का 'विशेष'
अर्थात् असाधारण धर्म नहीं है। उनका वह साधारण धर्म ही प्रतीत होता
है; क्योंकि द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में से प्रत्येक द्रव्य, प्रत्येक गुण एवं
प्रत्येक कर्म के असाधारण धर्म अपने सजातियों के (अर्थात् अपने में और
अपने सजातियों में समान रूप से रहनेवाले ) सामान्य धर्म के साथ ही देखा
न्यायकन्दली
श्रोत्रग्रहणेऽर्थे संशयः किं द्रव्यं किं वा गुणः किमुत कर्मेति । अत्र परेणोक्तम्-श्रोत्रग्रहणे
शब्दे संशयं वदता त्वया श्रोत्रग्राह्यत्वमेव संशयकारणत्यमुक्तम् । श्रोत्रग्राह्यत्वं च विशेषः,
तस्य दर्शनात् संशयानुपपत्तिः । विरुद्धोभयस्मृतिपूर्वको हि संशयः, स्मृतिश्च नासाधारण-
धर्मदर्शनाद्भवति, तस्य केनचिद्विशेषेण सहानुसम्भवादिति परेणोक्ते सति सूत्रकारेण
प्रतिविहितमेतत्, नायं द्रव्यादीनामन्यतमस्य विशेषः श्रावणत्वम्, द्रव्यगुणकर्मणां
मध्येऽन्यतमस्य द्रव्यस्य गुणस्य कर्मणो वा श्रावणत्वं विशेषो न भवति; किन्तु तेषां
सामान्यमेवेदं सम्पद्यते, कस्मात् ? तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु च द्रव्यादिभेदानामे-
कैकशो विशेषस्योभयथा दृष्टत्वादित्युक्तम् । भिद्यन्त इति भेदाः, द्रव्यादय एव भेदा
श्रोत्रग्राह्यत्व शब्द का 'विशेष' अर्थात् असाधारण धर्म है, अतः उसके ज्ञान से संशय
नहीं हो सकता । चूँकि विरुद्ध दो कोटियों की उपस्थिति स्मृति का कारण है, यह स्मृति
असाधारण धर्म के ज्ञान से सम्भव नहीं है; क्योंकि किसी भी विशेष धर्म के साथ
उसकी उपलब्धि नहीं होती है । पूर्वपक्षवादियों के द्वारा यह आक्षेप किये जाने पर
महर्षि कणाद ने यह समाधान किया है कि जिस श्रावणत्व धर्म का उल्लेख किया
गया है, वह द्रव्यादि में से किसी एक का 'विशेष' नहीं है, अर्थात् द्रव्य या गुण अथवा
कर्म इन तीनों में से श्रावणत्व किसी एक का 'विशेष' नहीं है; किन्तु उन तीनों का वह
सामान्य ही प्रतिपन्न होता है । अपने इस उत्तर क प्रसङ्ग में 'कस्मात्' अर्थात् किस हेतु
से आप यह बात कहते हैं ? यह पूछे जाने पर सूत्रकार ने "तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु
द्रव्यादिभेदानामनेकैकशो विशेषस्योभयथादृष्टत्वात्" इत्यादि सूत्र के द्वारा इसका

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५९७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५९७
न्यायकन्दली
द्रव्यादिभेदा द्रव्यगुणकर्माणि, तेषां मध्य एकैकस्य द्रव्यस्य गुणस्य कर्मणो वा तुल्यजातीयेभ्योऽ-
र्थान्तरभूतेभ्यो विशेष 'उभयथादृष्ट:' । पृथिव्याः स्वसमानजातीयेभ्यो विशेषः पृथिवीत्वं
द्रव्यत्वेन सह दृष्टम् ? रूपस्य विशेषो रूपत्वं गुणत्वेन सह दृष्टम्, उत्क्षेपणस्य विशेष उत्क्षेपणत्वं
कर्मत्वेन सह दृष्टम् । शब्दस्यापि श्रावणत्वं विशेषो गुणत्वेन, तस्मादेतदपि विशेषत्वेन
रूपेण द्रव्यादीनां सामान्यमेव । ततश्चास्य तेन रूपेण संशयहेतुत्वं युक्तम् । यत् पुनर-
साधारणं रूपं न तत् संशयकारणम्, विशेषस्मारकत्वाभावादित्याह-न संशयकारणमिति ।
तुल्यजातीयेभ्योऽर्थान्तरभूतेभ्यश्चेति वक्तव्ये सूत्रे सप्तम्यभिधानादेषोऽप्यर्थो गम्यते । शब्दे
श्रावणत्वविशेषदर्शनाद् द्रव्यं गुणः कर्मेति संशयः । द्रव्यादिभेदानामेकैकशो विशेषस्य तुल्य-
जातीयेषु सपक्षेष्वर्थान्तरभूतेषु विपक्षेषु दर्शनादिति । किमुक्तं स्यात् ? विशेषो द्रव्ये गुणे
उत्तर दिया है । 'भिद्यन्त इति भेदाः, द्रव्यादय एव भेदा द्रव्यादिभेदाः' इस व्युत्पत्ति
के अनुसार उक्त सूत्र में प्रयुक्त 'द्रव्यादिभेद' शब्द से द्रव्य, गुण और कर्म, ये
तीनों ही अभिप्रेत हैं । उन तीनों में से एक-एक का अर्थात् द्रव्य या गुण अथवा
कर्म का इनमें से सभी में 'तुल्यजातीयों' से अर्थात् समानजातीयों एवं
'अर्थान्तरभूत वस्तुओं' से अर्थात् भिन्नजातीयों से, दोनों प्रकार की वस्तुओं से
'विशेष' अर्थात् व्यावृत्ति देखी जाती है । दोनों प्रकार से व्यावृत्ति या विशेष का
यह देखा जाना ही सूत्र के 'उभयथादृष्ट' शब्द से अभिप्रेत है । पृथिवी का
'विशेष' है पृथिवीत्व , जो (उसके समानजातीय जलादि द्रव्यों में रहनेवाले) द्रव्यत्व
के साथ ही पृथिवी में है । रूप का 'विशेष' है रूपत्व, जो रूप में गुणत्व के साथ
ही देखा जाता है । एवं उत्क्षेपणरूप क्रिया का विशेष है उत्क्षेपणत्व, जो कर्मत्व के
साथ ही देखा जाता है । इसी तरह शब्दों का श्रावणत्वरूप विशेष भी गुणत्व के
साथ ही रहेगा । अतः यह श्रावणत्वरूप धर्म गन्धवत्त्वादि अन्य सभी विशेषों के समान
होने के कारण 'सामान्य' ही है (साधारण धर्म ही है), 'विशेष' अर्थात् असाधारण
धर्म नहीं, अतः श्रावणत्व शब्द में द्रव्यत्वादि संशय का अवश्य ही कारण है; किन्तु
असाधारण धर्म होने के नाते नहीं; किन्तु साधारण धर्म होने के नाते ही ।
असाधारण धर्म कभी संशय का कारण होता ही नहीं; क्योंकि वह किसी व्यावृत्ति
का (अभाव का) स्मारक नहीं है । यही बात भाष्यकार ने 'न संशयकारणम्' इस
वाक्य से कही है । 'तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु' इत्यादि सूत्र में साधारण रीति से प्राप्त
पञ्चमी विभक्ति से युक्त 'तुल्यजातीयेभ्योऽर्थान्तरभूतेभ्यः' इस प्रकार के पदों का
प्रयोग न कर उक्त सप्तमी विभक्ति से युक्त पदों के प्रयोग से भी यही मालूम होता है
कि शब्द में श्रावणत्वरूप विशेष के ज्ञान से यह संशय होता है कि 'शब्द द्रव्य है ?
अथवा गुण है ? किं वा कर्म है ?' क्योंकि 'द्रव्यादि भेदों' के अर्थात् द्रव्य, गुण और
कर्म में से प्रत्येक के 'विशेष' से अपने आश्रय के तुल्यजातीयों से अर्थात् सपक्षों से और

An accurate line-by-line transcription of the provided page in pure Markdown and Unicode Devanagari:

५९८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने निदर्शन-
प्रशस्तपादभाष्यम्
कारणम् । अन्यथा षट्स्वपि पदार्थेषु संशयप्रसङ्गात् । तस्मात् सामान्य-
प्रत्ययादेव संशय इति ।
द्विविधं निदर्शनं साधर्म्येण वैधर्म्येण च । तत्रानुमेयसामान्येन
लिङ्गसामान्यानुविधानदर्शनं साधर्म्यनिदर्शनम् । तद्यथा
जाता है । उक्त सूत्र के द्वारा यह नहीं कहा गया है कि विशेष
(असाधारण) धर्म संशय का कारण है । अगर ऐसी बात न हो तो
(शब्द में गुणत्व के संशय की तरह) छः पदार्थों में भी अविराम संशय
की आपत्ति होगी । अतः सामान्य (साधारण) धर्म के ज्ञान से ही संशय
होता है (असाधारण धर्म के ज्ञान से नहीं) ।
साधर्म्य (अन्वय) एवं वैधर्म्य (व्यतिरेक) भेद से निदर्शन (उदाहरण)
भी १. साधर्म्योदाहरण और २. वैधर्म्योदाहरण भेद से दो प्रकार का
है । इनमें अनुमेय (साध्य) सामान्य के साथ लिङ्ग (हेतु) सामान्य
न्यायकन्दली
कर्मणि च दृष्टः । शब्दे च श्रावणत्वं विशेषो दृश्यते, तस्माद्विशेषत्वाद् द्रव्यादिविषयः
संशयः । यदि चासाधारणमपि रूपं संशयकारणम्, तदा षट्स्वपि पदार्थेषु संशयप्रसङ्गः ?
सर्वेषामेव तेषामसाधारणधर्मयोगित्वात्, ततश्च संशयस्याविरामप्रसङ्ग इत्याह - अन्यथेति ।
उपसंहरति-तस्मादिति । साधारणो धर्मो विरुद्धविशेषाभ्यां सह दृष्टसाहचर्यः, तयोः
स्मरणं शक्नोति कारयितुमतस्तद्दर्शनादेव संशयो भवति, नासाधारणधर्मदर्शनादि-
त्युपसंहारार्थः ।
निदर्शनस्वरूपनिरूपणार्थमाह-द्विविधं निदर्शनं साधर्म्येण वैधर्म्येण
चेति । साध्यसाधनयोरनुगमो निदर्श्यते येन वचनेन तद्वचनं साधर्म्य-
विपक्षों से अर्थात् भिन्नजातीयों से, दोनों से व्यावृत्तिबुद्धि का उत्पादन देखा जाता
है । इसका फलितार्थ क्या हुआ ? यही कि द्रव्य, गुण और कर्म तीनों में ही
'विशेष' देखे जाते हैं एवं शब्द में भी श्रावणत्वरूप विशेष देखा जाता है, अतः
संशय होता है कि 'शब्द द्रव्य है ? अथवा गुण है ? कि वा कर्म है ?' अगर
असाधारण धर्म भी संशय का कारण हो तो फिर छः पदार्थों में ही संशय की
आपत्ति होगी; क्योंकि वे सभी असाधारण धर्म से युक्त हैं । जिससे संशय की
अनन्त धारा की आपत्ति होगी । यही बात 'अन्यथा' इत्यादि ग्रन्थ से आचार्य ने
कही है । 'तस्मात्' इत्यादि से इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । इस उपसंहार ग्रन्थ
का आशय है कि परस्पर विरुद्ध दो विशेष धर्मों के साथ दृष्ट होने के कारण साधारण
धर्म ही उन परस्पर विरुद्ध दोनों धर्मों की स्मृति को उत्पन्न कर सकता है । अतः
साधारण धर्म के ज्ञान से ही संशय होता है, असाधारण धर्म के ज्ञान से नहीं ।
'द्विविधं निदर्शनं साधर्म्येण वैधर्म्येण च' भाष्य का यह वाक्य 'निदर्शन' के
स्वरूप को समझाने के लिए लिखा गया है । 'साध्य और हेतु का एक जगह रहना

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५९९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५९९
प्रशस्तपादभाष्यम्
यत् क्रियावत् तद् द्रव्यं दृष्टं यथा शर इति । अनुमेयविपर्यये च
लिङ्गस्याभावदर्शनं वैधर्म्यनिदर्शनम्, तद्यथा यदद्रव्यं तत् क्रियावन्न भवति यथा
सत्तेति । अनेन निदर्शनाभासा निरस्ता भवन्ति ।
की अनुगति जहाँ देखी जाय, वह 'साधर्म्य निदर्शन' है । जैसे कि
जिसमें क्रिया देखी जाती है, वह द्रव्य ही होता है, जैसे कि तीर (में
क्रिया देखी जाती है और वह द्रव्य है) ।
अनुमेय (साध्य) के अभाव के साथ लिङ्ग (हेतु) के अभाव का
आनुगत्य जहाँ देखा जाय, वह 'वैधर्म्य निदर्शन' है । जैसे कि क्रियायुक्त
किसी वस्तु को देखकर उसमें द्रव्यत्व के अनुमान के लिए प्रयुक्त (जो
द्रव्य नहीं है, उसमें क्रिया भी नहीं रहती है, जैसे कि) सत्ता (जाति
द्रव्य नहीं है, अतः उसमें क्रिया भी नहीं है) । अतः उक्त अनुमान में
सत्ता 'वैधर्म्य निदर्शन' है । निदर्शनों के इन लक्षणों से (जो वस्तुतः
निदर्शन नहीं हैं; किन्तु अज्ञ के द्वारा निदर्शन रूप से प्रयुक्त होने के
कारण निदर्शन की तरह प्रतीत होते हैं, उन) निदर्शनाभासों में
निदर्शनत्व खण्डित हो जाता है ।
न्यायकन्दली
निदर्शनम्, साध्यावृत्त्या साधनव्यावृत्तिर्येन वचनेन निदर्श्यते तद्वैधर्म्यनिदर्शनमिति
भेदः । तत्र तयोर्मध्ये साधर्म्यनिदर्शनं कथयति-तत्रानुमेयेत्यादिना । तद्व्यक्तमेव ।
वैधर्म्यनिदर्शनं कथयति-अनुमेयविपर्यय इत्यादिना । तदपि व्यक्तमेव ।
जिस वाक्य से 'निदर्शित' हो, उसे 'साधर्म्यनिदर्शन' कहते हैं । एवं जिस वाक्य से
साध्य के अभाव के द्वारा हेतु का अभाव निर्दिष्ट हो, उसे 'वैधर्म्यनिदर्शन' कहते
हैं, यही दोनों (निदर्शनों) में अन्तर है । 'तत्र' अर्थात् उन दोनों में 'तत्रानुमेय-
सामान्येन' इत्यादि वाक्य के द्वारा 'साधर्म्यनिदर्शन' का उपपादन हुआ है । इस
वाक्य का अर्थ स्पष्ट है । 'अनुमेयविपर्यय' इत्यादि वाक्य के द्वारा 'वैधर्म्यनिदर्शन'
का उपपादन हुआ है, इस वाक्य का भी अर्थ स्पष्ट ही है । 'अनेन निदर्शनाभासा
निरस्ता भवन्ति' जो वस्तुतः 'निदर्शन' नहीं हैं, वे भी निदर्शन के किसी सादृश्य
के कारण निदर्शन की तरह प्रतीत होते हैं, इस प्रकार जो निदर्शनाभास अर्थात्
निदर्शन न होने पर भी निदर्शन के समान हैं, वे 'अनेन' अर्थात् निदर्शन के इस
प्रकार के लक्षण के निर्देश से निदर्शन की श्रेणी से अलग हो जाते हैं; क्योंकि उन
निदर्शनाभासों में निदर्शन का यह लक्षण नहीं है ।

६०० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुग्मने निदर्शन-
प्रशस्तपादभाष्यम्
तद्यथा-नित्यः शब्दोऽमूर्त्तत्वात्, यदमूर्त्तं दृष्टं तन्नित्यम्, यथा परमाणुर्यथा
कर्म, यथा स्थाली, यथा तमोऽम्बरवदिति, यद् द्रव्यं तत् क्रियावद् दृष्टमिति च
लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाननुगतविपरीतानुगताः साधर्म्यनिदर्शनाभासाः ।
अगर कोई शब्द में नित्यत्व के साधन के लिए अमूर्तत्व हेतु को
उपस्थित कर (शब्दो नित्यः, अमूर्त्तत्वात्) १. परमाणु, २. क्रिया,
३. वर्त्तन, ४. अन्धकार, ५. आकाश जैसी वस्तुओं को (साधर्म्य)
निदर्शन के लिए उपस्थित करे तो (उक्त अनुमान के लिए) ये सभी
(साधर्म्य) 'निदर्शनाभास' होंगे । एवं आकाशादि निष्क्रिय द्रव्यों में
केवल द्रव्यत्व हेतु से अगर कोई क्रियावत्त्व के अनुमान के लिए ६.
तीर प्रभृति सक्रिय द्रव्य को उपस्थित करे, तो वह भी साधर्म्य
निदर्शनाभास ही होगा । कथित ये (छः) वस्तु कथित अनुमान के लिए
प्रयुक्त होने पर साधर्म्य निदर्शन के निम्नलिखित छः दोषों में से क्रमशः
एक से युक्त होने के कारण 'साधर्म्यनिदर्शनाभास' ही होंगे, इन दोषों
के १. लिङ्गासिद्धि, २. अनुमेयासिद्धि, ३. उभयासिद्धि, ४. आश्रया-
सिद्धि, ५. अननुगत और ६. विपरीतानुगत (ये छः नाम हैं) ।
न्यायकन्दली
अनेन निदर्शनाभासा निरस्ता भवन्ति । अनिदर्शनान्यपि केनचित् साधर्म्येण निदर्शन-
वदाभासन्त इति निदर्शनसदृशाः, अनेन निदर्शनलक्षणेनार्थान्निरस्ता भवन्ति, तल्लक्षण-
रहितत्वात् । यावन्निदर्शनाभासानां स्वरूपं न ज्ञायते, तावत् तेषां स्ववाक्ये वर्जनं परवाक्ये
चोपालम्भो न शक्यते कर्तुम्, अतस्तेषां स्वरूपं कथयति-यथा नित्यः शब्दोऽमूर्त्तत्वात्,
यदमूर्त्तं तन्नित्यं दृष्टम्, यथा परमाणुः, यथा कर्म, यथा स्थाली, यथा तमोऽम्बरवद्
निदर्शनाभासों का स्वरूप जब तक ज्ञात न हो जाय, तब तक न तो अपने
द्वारा किये जानेवाले प्रयोगों में उनसे बचा जा सकता है और न दूसरे यदि उनका
प्रयोग करें तो उन वाक्यों में (निदर्शनाभास रूप) दोष का दिखाना ही सम्भव हो
सकता है, अतः 'तद्यथा' इत्यादि वाक्यों से उनके उदाहरण और अन्त में उनके
भेद दिखलाये गये हैं । अर्थात् (१) लिङ्गासिद्ध, (२) अनुमेयासिद्ध,
(३) उभयासिद्ध, (४) आश्रयासिद्ध, (५) अननुगत और (६) विपरीतानुगत ये
छः भेद 'निदर्शनाभास' के हैं ।
(१) 'नित्यः शब्दोऽमूर्त्तत्वात्, यथा परमाणुः' अर्थात् शब्द में अमूर्तत्व हेतु से निरव-
यवत्व के साधन के लिए कोई अगर 'यदमूर्तं तन्नित्यम्, यथा परमाणुः' इस प्रकार के
निदर्शन वाक्य का प्रयोग करे तो वह 'लिङ्गासिद्ध' निदर्शनाभास होगा; क्योंकि परमाणु

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६०१

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६०१
न्यायकन्दली
यद् द्रव्यं तत् क्रियावद् दृष्टमिति च लिङ्गानुमेयाभयाश्रयासिद्धाननुगतविपरीतानुगताः
साधर्म्यनिदर्शनाभासाः । नित्यः शब्दोऽमूर्त्तत्वात्, यथा परमाणुरिति लिङ्गासिद्धो
निदर्शनाभासः परमाणोर्मूर्त्तत्वाभावात् । यथा कर्मेत्यनुमेयासिद्धः, कर्मणो नित्यत्वा-
भावात् । यथा स्थालीत्युभयासिद्धः, न स्थाल्यां साध्यं नित्यत्वमस्ति, नापि साधन-
ममूर्त्तत्वम् । यथा तम इत्याश्रयासिद्धः । परमार्थतस्तमो नाम न किञ्चिदस्ति, क्व साध्य-
साधनयोर्व्याप्तिः कथ्यते ? अम्बरवदित्यननुगतोऽयं निदर्शनाभासः । यद्यप्यम्बरे
नित्यत्वममूर्त्तत्वमुभयमप्यस्ति, तथापि यदमूर्त्तं तन्नित्यमेवं न ब्रूते; किन्त्वम्बरवदित्येतावन्मा-
त्रमाह । न चैतस्माद् वचनादप्रतिपन्नसाध्यसाधनयोरम्बरे सद्भावप्रतीतिरस्ति, तस्मादननु-
के मूर्त्त होने के कारण उसमें अमूर्त्तत्व नाम का हेतु ही सिद्ध नहीं है । (निदर्शन
में साध्य की तरह हेतु का निश्चित रहना भी आवश्यक है ।)
(२) 'नित्यः शब्दोऽमूर्त्तत्वात् ' इसी अनुमान में अगर कोई 'यदमूर्त्तं दृष्टं
तन्नित्यम्, यथा कर्म' इस निदर्शन-वाक्य का प्रयोग करे तो वह 'अनुमेयासिद्ध'
निदर्शनाभास होगा; क्योंकि क्रिया में नित्यत्व रूप अनुमेय अर्थात् साध्य ही सिद्ध
नहीं है ।
(३) उसी अनुमान में 'यदमूर्त्तं दृष्टं तन्नित्यम्, यथा स्थाली' इस प्रकार के
निदर्शन-वाक्य का अगर कोई प्रयोग करे, तो वह 'उभयासिद्ध' नाम का
निदर्शनाभास होगा; क्योंकि स्थाली (बटलोही) में नित्यत्व रूप अनुमेय और
अमूर्त्तत्व रूप लिङ्ग दोनों ही सिद्ध नहीं हैं ।
(४) उसी अनुमान में कोई अगर 'यदमूर्त्तं दृष्टं तन्नित्यम्, यथा तमः' इस
प्रकार से निदर्शन-वाक्य का प्रयोग करे, तो वह 'आश्रयासिद्ध' नाम का
निदर्शनाभास होगा; क्योंकि तम नाम का कोई (भाव) पदार्थ वस्तुतः है ही
नहीं, साध्य और हेतु की व्याप्ति का प्रदर्शन कहाँ होगा ? (क्योंकि निदर्शन का
यही प्रयोजन है कि वहाँ साध्य और हेतु की व्याप्ति निश्चित रहे, जिससे कि
प्रकृत पक्ष में साध्य की सिद्धि के लिए उसका प्रयोग किया जा सके ।)
(५) 'शब्दो नित्यः, अमूर्त्तत्वात्' इसी स्थल में अगर उदाहरण को दिखाने के
लिए 'अम्बरवत्' केवल इतने ही अंश का कोई प्रयोग करे 'यदमूर्त्तं तन्नित्यम्' इस
अंश का प्रयोग न करे तो वह 'अननुगत' नाम का निदर्शनाभास होगा । यद्यपि
आकाश में नित्यत्व और अमूर्तत्व ये दोनों ही हैं, फिर भी 'यदमूर्त्तं तन्नित्यम्' इस
अंश का प्रयोग नहीं किया गया है; किन्तु केवल 'अम्बरवत्' इतना ही कहा गया
है, केवल इसी त्रुटि से यह 'अननुगत' नाम का हेत्वाभास होगा; क्योंकि इस
वाक्य के बिना पहले से अज्ञात साध्य और हेतु इन दोनों की सत्ता का ज्ञान
आकाश में नहीं हो सकेगा, अतः यह (साध्य और हेतु आकाशरूप अधिकरण में
अनुगत रूप से ज्ञापक न होने के कारण) 'अननुगत' नाम का निदर्शनाभास है ।

६०२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने निदर्शन-
न्यायकन्दली
गतोऽयं निदर्शनाभासः । यद् द्रव्यं तत् क्रियावद् दृष्टमिति विपरीतानुगतः, द्रव्यं वायुः
क्रियावत्त्वादित्यत्रापि व्याप्यं क्रियावत्त्वं व्यापकं च द्रव्यत्वम् । यच्च व्याप्यं तदेकनियता
व्याप्तिर्न संयोगवदुभयत्र व्यासज्यते, व्यापकस्य व्याप्यव्यभिचारात् । यत्रापि समव्याप्तिके
कृतकत्वानित्यत्वादौ व्याप्यस्यापि व्यापकत्वमस्ति, तत्रापि व्याप्यत्वरूपं समाश्रित्यैव व्याप्तिर्न
व्यापकत्वरूपाश्रयत्वात्, व्यभिचारिण्यपि तद्रूपस्यापि सम्भवात् । यथोपदिशन्ति गुरवः -
व्यापकत्वगृहीतस्तु व्याप्यो यद्यपि वस्तुतः ।
आधिक्येऽप्यविरुद्धत्वाद् व्याप्यं न प्रतिपादयेत् ॥ इति ।
(६) 'द्रव्यं वायुः क्रियावत्त्वात्' इस अनुमान के लिए अगर कोई 'यद्द्रव्यं तत्
क्रियावद् दृष्टम्' इस प्रकार ('यत् क्रियावत् तत् द्रव्यं दृष्टम्' इस प्रकार से
निदर्शन वाक्य प्रयोग न करके) उसके विपरीत वाक्य का कोई प्रयोग करे, तो
वह निदर्शन न होकर 'विपरीतानुगत' नाम का निदर्शनाभास होगा; क्योंकि इस
अनुमान में 'क्रियावत्त्व' हेतु है, अतः वही व्याप्य है एवं साध्य होने के कारण
द्रव्यत्व ही व्यापक है । अनुमान की उपयोगी व्याप्ति केवल व्याप्य (हेतु) में ही
रहती है, व्यापक (साध्य) में नहीं । एक ही व्याप्ति संयोग की तरह व्यापक और
व्याप्य अपने दोनों सम्बन्धियों में व्याप्त होकर रहनेवाली वस्तु नहीं है; क्योंकि
(साध्य) व्यापक में व्याप्य (हेतु) की व्याप्ति नहीं (भी) रहती है; क्योंकि साध्य
हेतु के बिना भी देखा जाता है । जिन समव्याप्तिक (जिस अनुमान के साध्य और
हेतु दोनों समान आश्रयों में हों, साध्य का आश्रय हेतु के आश्रय से अधिक न
हो) स्थलों में जैसे कि 'घटोऽनित्यः कृतकत्वात्' इत्यादि अनुमान के कृतकत्व हेतु
में व्याप्यत्व की तरह साध्य का व्यापकत्व भी है, फिर भी कृतकत्व हेतु में जो
अनित्यत्व रूप साध्य की व्याप्ति है, वह इसी कारण है कि वह साध्य का व्याप्य है ।
इसलिए कृतकत्व हेतु में अनित्यत्व रूप साध्य की व्याप्ति नहीं है कि कृतकत्व रूप
हेतु अनित्यत्व रूप साध्य का व्यापक है । अगर साध्य के व्यापक होने के कारण
ही साध्य की व्याप्ति हेतु में मानें तो ('धूमवान् वह्नेः' इत्यादि) व्याभिचारी स्थलों
के हेतुओं में भी साध्य की व्याप्ति माननी होगी; क्योंकि व्याप्ति के प्रयोजक साध्य
का व्यापकत्व तो वहाँ भी है ही (वह्नि धूम का व्यापक है ही) । जैसा कि
गुरुचरणों का उपदेश है कि-(किसी) व्याप्य (हेतु) में भी साध्य की व्यापकता
वस्तुतः रहने पर भी, वह हेतु व्यापक होने के कारण व्याप्य का (अपने से व्याप्य
साध्य का केवल उसके व्याप्य होने के कारण ज्ञापन नहीं कर सकता; क्योंकि
साध्य की व्यापकता (केवल समव्याप्त हेतु में ही नहीं, किन्तु) साध्य से अधिक
स्थानों में रहनेवाले (व्यभिचारी) हेतु में भी है ।