वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४५९
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४५९
प्रशस्तपादभाष्यम्
मुत्पद्यते, सद् द्रव्यं पृथिवी विषाणी शुक्लो गौर्गच्छतीति ।
रूपरसगन्धस्पर्शेष्वनेकद्रव्यसमवायात् स्वगतविशेषात् स्वाश्रयसन्नि-
इन्द्रियों के द्वारा रूप, रस, गन्ध और स्पर्श विषयक प्रत्यक्ष के उत्पादन
के लिए इनमें से प्रत्येक के लिए नियमित चक्षुरादि तत्तत् इन्द्रिय,
अनेक अवयवों से बने हुए द्रव्य में समवाय, रूपादि प्रत्येक में रहने-
वाले रूपत्वादि असाधारण धर्म, एवं कथित रूपादि विषयों के आश्रयीभूत
न्यायकन्दली
विशिष्टज्ञानतयोदयादपरोक्षं न भवति, दुःसमाधेयमित्युपरम्यते ।
रूपादिषु प्रत्यक्षोत्पत्तिकारणमाह-रूपरसेत्यादि । अनेकेष्ववयवेषु समवेतं द्रव्यमनेक-
द्रव्यम्, तत्र समवायात्। स्वगतो विशेषो रूपे रूपत्वं रसे रसत्वं गन्धे गन्धत्वं स्पर्शे स्पर्शत्वं
तस्मात् स्वाश्रयसन्निकर्षाद् रूपादीनां य आश्रयस्तस्य ग्राहकैरिन्द्रियैः सन्निकर्षान्नियतेन्द्रियनिमित्तं
चक्षुर्निमित्तं रूपे, रसननिमित्तं रसे, घ्राणनिमित्तं गन्धे, त्वगिन्द्रियनिमित्तं स्पर्शे ज्ञानमुत्पद्यते ।
प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, तो फिर इस प्रश्न का समाधान कठिन है, अतः हम इससे
विरत होते हैं ।
'रूपरस' इत्यादि पङ्क्ति के द्वारा रूपादि विषयों के प्रत्यक्ष के कारण कहे गये
हैं । (इस वाक्य के 'अनेकद्रव्यसमवायात्' इस पद का) 'अनेकेष्ववयवेषु समवेतं
द्रव्यमनेकद्रव्यं तत्र समवायात्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार अनेक अवयवों में समवाय
सम्बन्ध से रहनेवाला (द्रव्य ही 'अनेकद्रव्य' शब्द का) अर्थ है, उसमें रूपादि का
समवाय रूपादि के प्रत्यक्ष का कारण है । (अर्थात् कथित 'अनेकद्रव्य' में समवाय
सम्बन्ध से रहनेवाले रूपादि का ही प्रत्यक्ष होता है, अन्य रूपादि का नहीं) रूप में
रूपत्व, रस में रसत्व, गन्ध में गन्धत्व और स्पर्श में स्पर्शत्व ही प्रकृत
'स्वगतविशेष' शब्द से अभिप्रेत हैं, ये भी क्रमशः रूपादि प्रत्यक्ष के कारण हैं ।
'स्वाश्रयसन्निकर्ष' से अर्थात् रूपादि के जो आश्रयद्रव्य हैं, उनका अपने-अपने
ग्राहक इन्द्रियों के साथ जो संनिकर्ष (उससे रूपादि का) 'नियतेन्द्रियनिमित्त'
अर्थात् रूप में चक्षु स्वरूप निमित्त से, रस में रसनेन्द्रिय निमित्त से, गन्ध में घ्राण
रूप निमित्त से, एवं स्पर्श में त्वक् रूप निमित्त से प्रत्यक्ष की उत्पत्ति होती है ।
चूँकि 'स्वगतविशेष' अर्थात् रूपत्वादि धर्म भी क्रमशः रूपादि प्रत्यक्ष के कारण हैं,
अतः (रूप का प्रत्यक्ष चक्षु से ही हो, रस का प्रत्यक्ष रसनेन्द्रिय से ही हो
इत्यादि प्रकार की) व्यवस्थायें उपपन्न होती हैं । ऐसा न मानने पर कोई व्यव-
च्छेदक न रहने के कारण इन्द्रियों के साङ्कर्य की आपत्ति होगी । 'शब्दस्य त्रय-
४६० न्याय्कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष-
प्रशस्तपादभाष्यम्
कर्षाश्रियतेन्द्रियनिमित्तमुत्पद्यते । शब्दस्य त्रयसन्निकर्षाच्छ्रोत्रसमवेतस्य तेनै-
वोपलब्धिः । संख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वस्नेह-
तत्तत् द्रव्य में चक्षुरादि तत्तद् इन्द्रिय का सन्निकर्ष, इन तीन कारणों की
और अपेक्षा होती है । श्रोत्र (रूप आकाश) में रहनेवाले शब्द का ही
श्रोत्र रूप इन्द्रिय से प्रत्यक्ष होता है (किन्तु) इसमें आत्मा, मन और
श्रोत्र रूप इन्द्रिय इन तीनों के (दो) सन्निकर्षों की भी अपेक्षा होती है
(रूपादि प्रत्यक्ष में कथित आत्मादि चार वस्तुओं के तीन सन्निकर्षों की
नहीं) । संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, स्नेह,
न्यायकन्दली
स्वगतविशेषाणां हेतुत्वाद् रूपादिष्विन्द्रियव्यवस्था, अन्यथा परिप्लवः स्याद् विशेषा-
भावात् । शब्दस्य त्रयसन्निकर्षाच्छ्रोत्रसमवेतस्य तेनैवोपलब्धिः । त्रयसन्निकर्षादिति आत्ममन
इन्द्रियाणां सन्निकर्षो दर्शितः । इन्द्रियार्थसन्निकर्षः श्रोत्रसमवेतस्येत्यनेनोक्तः ।
तेनैवोपलब्धिरिति । श्रोत्रेणैवोपलब्धिरित्यर्थः । संख्यादीनां कर्मान्तानां प्रत्यक्षद्रव्यसमवेता-
नामाश्नयवच्चक्षुःस्पर्शनाभ्यां ग्रहणम् ।
कर्मप्रत्यक्षमिति न मृष्यामहे, गच्छति द्रव्ये संयोगविभागातिरिक्तपदार्था-
न्तरानुपलब्धेः । यस्त्वयं चलतीति प्रत्ययः, स संयोगविभागानुमितक्रियालम्बन
इति । तदसारम्, यदि कर्माप्रत्यक्षं विभागसंयोगाभ्यामनुमीयते, तदा विभाग-
संयोगयोरुभयवृत्तित्वादाश्रयान्तरेऽपि कर्मानुमीयेत । न च मूलादग्रमग्राच्च मूलं
गच्छति शाखामृगे तरावप्यनारतसंयोगविभागाधिकरणे चलतीति प्रत्यय उदयते ।
सन्निकर्षात्' इत्यादि वाक्य के 'त्रयसन्निकर्षात्' इस पद के द्वारा आत्मा, मन और
इन्द्रियों के सन्निकर्ष (प्रत्यक्ष के कारण रूप में) दिखलाये गये हैं । एवं
'श्रोत्रसमवेतस्य' इस पद के द्वारा (शब्द प्रत्यक्ष के कारणीभूत) इन्द्रिय और अर्थ
का सन्निकर्ष दिखलाया गया है । 'तेनैवोपलब्धिः' अर्थात् श्रोत्र में समवाय सम्बन्ध
से रहनेवाले शब्द का श्रोत्रेन्द्रिय से ही प्रत्यक्ष होता है । प्रत्यक्ष के विषय द्रव्यों में
रहनेवाले 'संख्यादीनां कर्मान्तानाम्' अर्थात् संख्या से लेकर कर्मपर्यन्त (संख्या
परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, स्नेह, द्रवत्व, वेग और कर्म
इन ग्यारह वस्तुओं का) चक्षु और त्वचा इन दोनों इन्द्रियों से ग्रहण होता है ।
(प्र.) हम यह स्वीकार नहीं कर सकते कि कर्म का भी प्रत्यक्ष होता है, क्योंकि द्रव्य
के चलने पर (उत्तर देश के साथ) संयोग और (पूर्व देश से) विभाग इन दोनों से भिन्न
किसी वस्तु की प्रतीति द्रव्य में नहीं होती है । द्रव्य में जो 'चलति' इस प्रकार की