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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७९

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७९
न्यायकन्दली
स्वभावायाः पृथिव्याः सत्त्वे किं प्रमाणम् ? अनुमानम्, अणुपरिमाणतारतम्यं क्वचिद्
विश्रान्तं परिमाणतारतम्यत्वाद् महत्परिमाणतारतम्यवत्, यत्रेदं विश्रान्तं यतः परमणुर्नास्ति
स परमाणुः । अत एव नित्यो द्रव्यत्वे सत्यनवयवत्वादाकाशवत् । अथायं सावयवो न
तर्हि परमाणुः, कार्य्यपरिमाणापेक्षया तदवयवपरिमाणस्य लोकेऽल्पीयस्त्वप्रतीतेः, यश्च तस्या-
वयवः स परमाणुर्भविष्यति । अथ सोऽपि न भवति, अवयवान्तरसद्भावात् ? एवं तर्ह्यनवस्था,
ततश्चावयविनामल्पतरत्वादिभावो न स्यात्, सर्वेषामनन्तकारणजन्यत्वाविशेषेण परिमाण-
प्रकर्षप्रकर्षहेतोः कारणसङ्ख्याभूयस्त्वभूयस्त्वयोरसम्भवात् । अस्ति तावदयं परिमाणभेदः,
तस्मादणुपरिमाणं क्वचिन्निरातिशयमिति सिद्धो नित्यः परमाणुः । स चैको नारम्भकः,
लिए लिखते हैं कि 'परमाणुलक्षणा नित्या, कार्यलक्षणा त्वनित्या' इस वाक्य के
दोनों ही 'लक्षण' शब्द 'स्वभाव' के बोधक हैं । (प्र.) परमाणु स्वभाव की पृथिवी
की सत्ता में प्रमाण क्या है ? (उ.) यह अनुमान प्रमाण है कि अणुपरिमाण का
न्यूनाधिक भाव भी कहीं समाप्त होता है, क्योंकि वह भी परिमाण का न्यूनाधिक
भाव है, जैसे कि महत्परिमाण का न्यूनाधिक भाव । अणुपरिमाण का यह तारतम्य जहाँ
समाप्त होता है, चूँकि उससे छोटा कोई और अणु नहीं है, अतः वही परमाणु
है । अतएव वह नित्य भी है, क्योंकि वह द्रव्य होने पर भी सावयव नहीं है जैसे
कि आकाश । अगर वह सावयव है तो फिर वह परमाणु नहीं है, क्योंकि यह
लोक में सिद्ध है कि कार्य के परिमाण से कारण का परिमाण अल्प होता है ।
फिर वही कारणीभूत द्रव्य परमाणु कहलायेगा । यह परमाणु भी नहीं कहला
सकता, अगर इसके छोटे अवयव हैं । इस प्रकार (परमाणु को सावयव मानने में)
अनवस्था होगी एवं इस अनवस्था से अवयवियों में परस्पर छोटे-बड़े के भेद ही
उठ जायेंगे । कोई अवयवी किसी दूसरे अवयवी से बड़ा इसलिए है कि उसका
निर्माण उस छोटे अवयवी के निर्मापक अवयवों से अधिकसंख्यक अवयवों से
होता है । कोई अवयवी किसी अवयवी से छोटा इसलिए है कि उस अवयवी के
निर्मापक अवयवों से अल्पसंख्यक अवयवों से उसका निर्माण होता है । अगर सभी
को सावयव मान लें तो सभी अवयवियों को असंख्य अवयवों से निर्मित मानना
पड़ेगा । फिर अवयवियों में परस्पर छोटे-बड़े का व्यवहार ही किससे होगा ? किन्तु
अवयवियों में परस्पर छोटे-बड़े का भेद सार्वजनीन अनुभव से सिद्ध है । तस्मात्
अणुपरिमाण का न्यूनाधिक भाव अवश्य ही कहीं समाप्त होता है । जहाँ यह समाप्त
होता है वही 'नित्य परमाणु' है । उन परमाणुओं में से किसी एक से ही कार्य की
उत्पत्ति नहीं हो सकती; क्योंकि इससे सभी समय कार्योत्पत्ति की आपत्ति
होगी, कारण कि उसे दूसरे की अपेक्षा नहीं है । अगर एक ही नित्य वस्तु

८० न्यायकिन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये पृथिवी-
न्यायकन्दली
एकस्य नित्यस्य चारम्भकत्वे कार्य्यस्य सततोत्पत्तिः स्यादपेक्षणीयाभावात्, अविनाशि-
त्वञ्च प्रसज्येत, आश्रयविनाशस्यावयविभागस्य च विनाशहेतोरभावात् । त्रयाणामप्यारम्भ-
कत्वमयुक्तम्, इह महत्कार्य्यद्रव्यस्योत्पत्तौ स्वपरिमाणापेक्षयाऽल्पपरिमाणस्य कार्य्यद्रव्यस्यैव
सामर्थ्यदर्शनात् । त्र्यणुकं कार्यद्रव्येणैव जन्यते, महत्परिमाणत्वात्, घटवत् । एवं त्रयाणा-
मेकस्य चारम्भकत्वे प्रतिषिप्ते द्वाभ्यामेव परमाणुभ्यामारभ्यते यत् तद्व्यणुकमिति सिद्धम् ।
द्वयणुकैर्बहुभिरारभ्यत इत्यपि नियमो न, द्वाभ्यां तस्याणुपरिमाणोत्पत्तौ कारणसद्भावेनाणु-
त्वोत्पत्तावारम्भवैयर्थ्यात्, बहुषु त्वनियमः । कदाचित् त्रिभिरारभ्यत इति त्र्यणुक-
मित्युच्यते, कदाचित्चतुर्भिरारभ्यते, कदाचित् पञ्चभिरिति यथेष्टं कल्पना । न च
कार्य्यस्य व्यर्थता, यथा यथा कारणसङ्ख्याबाहुल्यं तथा तथा महत्परिमाणतारतम्योपलम्भात् ।
न चैवं सति द्व्यणुकानामेव घटारम्भकत्वप्रसक्तिः, घटस्य भङ्गेऽल्पतरतमादिभागदर्शनेन
तथैवारम्भकल्पनात् । तदेवं द्व्यणुकादिक्रमेण क्रियते कार्यलक्षणा पृथिवी ।
से कार्य की उत्पत्ति मानें तो कार्य का विनाश ही असम्भव होगा, क्योंकि कार्यों
का नाश दो ही वस्तुओं से सम्भव है, एक आश्रय के नाश से (समवायिकारण के
नाश से) दूसरे अवयवों के विभाग से (फलतः असमवायिकारण के नाश से), ये
दोनों ही प्रकार नित्य वस्तु से कार्यों की उत्पत्ति मान लेने पर असम्भव हैं । तीन
परमाणु भी मिलकर कार्य को उत्पन्न नहीं कर सकते; क्योंकि तीन परमाणुओं से
जो बनेगा वह अवश्य ही महान् होगा । महत्परिमाण के कार्यद्रव्य का यह स्वभाव
सर्वत्र देखा जाता है कि उसकी उत्पत्ति उसके परिमाण से न्यून परिमाणवाले
कार्यद्रव्यों से होती है । तस्मात् त्र्यणुक कार्यद्रव्यों से उत्पन्न होता है; क्योंकि उसमें
महापरिमाण है, जैसे कि घटादि । इससे एक परमाणु से और तीन परमाणुओं
से कार्य की उत्पत्ति खण्डित हो जाने पर यह सिद्ध होता है कि दो परमाणुओं
से ही कार्य की उत्पत्ति होती है एवं उस कार्य का नाम द्वयणुक है । यह
भी निश्चित ही है कि दो से अधिक द्वयणुकों से ही कार्य की उत्पत्ति हो सकती
है, दो द्वयणुकों से नहीं क्योंकि दो द्वयणुकों से उत्पन्न कार्य का परिमाण 'अणु'
ही होगा, क्योंकि उसके परिमाण में अणुपरिमाण को ही उत्पन्न करने का
सामर्थ्य है । दो द्वयणुकों से जिस अणुपरिमाणवाले द्रव्य की उत्पत्ति होगी
उसका उत्पन्न होना ही व्यर्थ है । दो से अधिक कितने द्वयणुकों से कार्य की
उत्पत्ति होती है, इसका कोई नियम नहीं है, कभी तीन द्वयणुकों से ही कार्योत्पत्ति
होती है, कभी चार या पाँच द्वयणुकों से कार्योत्पत्ति की यथेच्छ कल्पना की जा
सकती है । इस पक्ष में कार्योत्पत्ति की व्यर्थता नहीं है; क्योंकि जिस क्रम से
कारणों की संख्या में अधिकता होगी, उसी क्रम से उनके कार्यों में परिमाण-