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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७८१

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७८१
प्रशस्तपादभाष्यम्
प्रतिनियमो ज्ञायते । यथा कुण्डदध्नोः संयोगैकत्वे भवत्याश्रयाश्रयिभाव-
नियमः । तथा द्रव्यादीनामपि समवायैकत्वेऽपि व्यङ्ग्यव्यञ्जकशक्तिभेदादाधा-
राधेयनियम इति ।
समवाय सम्बन्ध से अपने द्रव्यादि आश्रयों में ही हैं, गुणादि में नहीं ।
जिस प्रकार कुण्ड और दधि दोनों में एक ही संयोग के रहते हुए भी
आधार कुण्ड ही होता है दधि नहीं एवं आधेय दधि ही होता है कुण्ड
नहीं, उसी प्रकार द्रव्यत्वादि सभी (समवेत) वस्तुओं का समवाय एक
होने पर भी कथित संयोग की तरह अभिव्यक्त करनेवाले एवं
अभिव्यक्त होनेवाले की विभिन्न शक्ति के कारण प्रत्येक समवेत वस्तुओं
का आधार-आधेय भाव नियमित होता है ।
न्यायकन्दली
उत्तरमाह-अन्वयव्यतिरेकदर्शनादिति । द्रव्यत्वनिमित्तस्य प्रत्ययस्य द्रव्येष्वन्वयो गुणकर्मभ्य-
श्च व्यतिरेकः, गुणत्वनिमित्तस्य प्रत्ययस्य गुणेष्वन्वयो द्रव्यकर्मभ्यश्च व्यतिरेकः, तथा
कर्मत्वनिमित्तस्य प्रत्ययस्य कर्मस्वन्वयो द्रव्यगुणेष्वञ्च व्यतिरेको दृश्यते, तस्मादन्वयव्यतिरेक-
दर्शनाद् द्रव्यत्वादिनां नियमो ज्ञायते । अस्य विवरणं सुगमम् । समवायाविशेषे कुत
एवायं नियमो द्रव्यत्वस्य पृथिव्यादिष्वेव समवायो गुणत्वस्य रूपादिष्वेव कर्मत्वस्योत्क्षेपणा-
दिष्वेव, नान्यत्र ? इत्यत आह-यथेति । संयोगैकत्वेऽपि कुण्डदध्नोराश्रयाश्रयि-
कर्मत्व क्रियाओं में ही रहता है । 'अन्वयव्यतिरेकदर्शनात्' इत्यादि सन्दर्भ के
द्वारा इसी प्रश्न का उत्तर दिया गया है । अभिप्राय यह है कि द्रव्यत्व के
द्वारा उत्पन्न (द्रव्यत्वविषयक) प्रत्यय का 'अन्वय' (विशेष्यता सम्बन्ध से) द्रव्यों
में ही देखा जाता है एवं द्रव्यत्व के उक्त प्रत्यय का 'व्यतिरेक' भी गुणकर्मादि में
देखा जाता है । इसी प्रकार गुणत्वजनित (गुणत्वविषयक) प्रतीति का अन्वय गुणों
में ही देखा जाता है और द्रव्यकर्मादि में गुणत्वविषयक उक्त प्रतीति का व्यतिरेक
भी देखा जाता है एवं कर्मत्व से होनेवाली (कर्मत्वविषयक) प्रतीति का अन्वय
कर्मों में ही देखा जाता है और उक्त प्रतीति का व्यतिरेक भी द्रव्यगुणादि में देखा
जाता है । इन अन्वयों और व्यतिरेकों के दर्शन से समझते हैं कि द्रव्यादि तत्तत्
आश्रयों में ही समवाय सम्बन्ध से द्रव्यत्वादि नियमित हैं । इसका ('इहेति
समवायनिमित्तस्य' इत्यादि स्वपदवर्णन रूप भाष्य का) अभिप्राय समझना सुगम
है । द्रव्यत्वादि सभी जातियों में यदि समवाय एक ही है तो फिर यह नियम
किस प्रकार उपपन्न होगा कि द्रव्यत्व का समवाय पृथिव्यादि द्रव्यों में ही रहे
एवं गुणत्व का समवाय रूपादि गुणों में ही रहे एवं कर्मत्व का समवाय उत्क्षेपणादि
कर्मों में ही रहे, पृथिव्यादि से अन्यत्र द्रव्यत्व का समवाय न रहे एवं गुणत्व

७८२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
सम्बन्ध्यनित्यत्वेऽपि न संयोगवदनित्यत्वं भाववद-
कारणत्वात् । यथा प्रमाणतः कारणानुपलब्धेर्नित्यो भाव इत्युक्तं
तथा समवायोऽपीति । न ह्यस्य किञ्चित् कारणं प्रमाणत उप-
प्रतियोगियों और अनुयोगियों के अनित्य होने पर भी संयोग की तरह
समवाय अनित्य नहीं है; क्योंकि सत्ता जाति की तरह उसके भी कारण
नहीं दीखते हैं । (विशदार्थ यह है कि) जिस प्रकार किसी भी प्रमाण से
कारणों की उपलब्धि न होने से सत्ता जाति में नित्यत्व का व्यवहार
न्यायकन्दली
भावस्य नियमो दृष्टः, शक्तिनियमात् । कुण्डमेवाश्रयो दध्येवाश्रयि । एवं समवायैकत्वेऽपि
द्रव्यादीनामाधाराधेयनियमो व्यङ्ग्यव्यञ्जकशक्तिभेदात् । किमुक्तं स्यात् ? द्रव्याभिव्यञ्जिका
शक्तिर्द्रव्याणामेव, तेन द्रव्येष्वेव द्रव्यत्वं समवैति, नान्यत्रेति । एवं गुणकर्मस्वपि व्याख्येयम् ।
किं पुनरयमनित्य आहोस्विन्नित्यः ? इति संशये सत्याह-सम्बन्ध्यनित्यत्वेऽपीति ।
यथा सम्बन्धिनोरनित्यत्वे संयोगस्यानित्यत्वम्, न तथा समवायिनोरनित्यत्वे समवायस्या-
नित्यत्वं भाववदकारणत्वादिति । एतद् विवृणोति- यथेत्यादिना ।
का समवाय रूपादि से अन्यत्र न रहे और कर्मत्व का समवाय उत्क्षेपणादि से भिन्न
वस्तुओं में न रहे । इन्हीं प्रश्नों का समाधान 'यथा' इत्यादि से किया गया है ।
अर्थात् मटका और दही दोनों में संयोग बराबर है, फिर भी मटका ही दही का
आश्रय कहलाता है एवं दही आधेय ही कहलाता है । इस सार्वजनिक प्रतीति से
जिस प्रकार उक्त एक ही संयोग से मटके में आश्रयत्व व्यवहार को उत्पन्न करने
की एक शक्ति और दही में आधेयत्व व्यवहार की उससे भिन्न शक्ति की कल्पना
की जाती है । उसी प्रकार द्रव्यत्वादि सभी जातियों में यद्यपि एक ही समवाय है,
फिर भी पृथिव्यादि में ही द्रव्यत्व की अभिव्यक्ति होती है, अन्यत्र नहीं । अतः
पृथिव्यादि में ही द्रव्यत्व को अभिव्यक्त करने की शक्ति माननी पड़ती है एवं
पृथिव्यादि में द्रव्यत्व ही अभिव्यक्त होता है, अतः पृथिव्यादि में ही अभिव्यक्त होने
की शक्ति की कल्पना द्रव्यत्व में ही करनी पड़ती है । एवं गुणत्व की अभिव्यक्ति
रूपादि में ही होती है, अतः गुणत्व को अभिव्यक्त करने की शक्ति रूपादि में ही
माननी पड़ती है, अन्यत्र नहीं । एवं रूपादि में ही गुणत्व अभिव्यक्त होता है, अतः
रूपादि में अभिव्यक्ति होने की शक्ति की कल्पना गुणत्व में करनी पड़ती है,
अन्य जातियों में नहीं । उपर्युक्त भाष्य की इस प्रकार से व्याख्या करनी चाहिए ।