वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७६७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७६७
प्रशस्तपादभाष्यम्
गवादिष्वश्वादिभ्यस्तुल्याकृतिगुणक्रियावयवसंयोगनिमित्ता प्रत्ययव्या-
वृत्तिर्दृष्टा, गौः शुक्लः शीघ्रगतिः पीनककुद्मान् महाघण्ट
इति । तथास्मद्विशिष्टानां योगिनां नित्येषु तुल्याकृतिगुणक्रियेषु
समझानेवाला (अत्यन्त व्यावृत्ति-बुद्धि का) कोई दूसरा कारण नहीं है ।
जिस प्रकार हम साधारण जनों को गो में अश्व से कुछ सादृश्य के
रहते हुए भी विशेष आकृति, विशेष गुण, विशेष प्रकार की क्रिया एवं
अवयवों के विशेष प्रकार के संयोगों के कारण (गो में अश्व से) ये
व्यावृत्तिप्रत्यय होते हैं कि 'यह गो है' (अश्व नहीं, क्योंकि यह) विशेष
प्रकार का शुक्ल है, यह विशेष प्रकार से दौड़ता है या इसका ककुद् बहुत
न्यायकन्दली
गवादिष्वश्वादिभ्यस्तुल्याकृतिनिमित्ता गौरिति, गुणनिमित्ता शुक्ल इति, क्रियानिमित्ता
शीघ्रगतिरिति, अवयवनिमित्ता पीनककुद्मानिति, संयोगनिमित्ता महाघण्ट इति, अस्म-
दादीनां प्रत्ययव्यावृत्तिर्दृष्टा । तथास्मद्विशिष्टानां योगिनां तुल्याकृतिगुणक्रियेषु तुल्या-
कृतिषु तुल्यगुणेषु तुल्यक्रियेषु परमाणुषु मुक्तात्ममनस्सु चान्यनिमित्तासम्भवाद् येभ्यो निमि-
त्तेभ्यः प्रत्याधारमयमस्माद् विलक्षण इति प्रत्ययव्यावृत्तिर्भवति तेऽन्त्या विशेषाः ।
(योगियों से भिन्न) साधारण पुरुषों को सभी गो व्यक्तियों में समान आकृति
के कारण उनसे भिन्न अश्वादि सभी पदार्थों से भिन्नत्व (व्यावृत्ति) की प्रतीति होती
है । एवं उसी गो में 'शुक्लः' इस आकार की व्यावृत्तिबुद्धि शुक्लवर्ण रूप गुण के
कारण होती है । उसी गो में 'यह शीघ्र चलने वाला है' इस आकार की
व्यावृत्तिबुद्धि 'शीघ्रचलन' रूप क्रिया के कारण होती है । 'इसका ककुद् बहुत
स्थूल है' इस आकार की व्यावृत्तिबुद्धि ककुद् रूप अवयव के कारण होती है एवं
'यह बड़ा घण्टावाला है' इस प्रकार की व्यावृत्तिबुद्धि घण्टा के संयोग के कारण
होती है । इसी प्रकार अस्मदादि से विशेष सामर्थ्यवाले योगियों को मादृश
साधारण जनों से अत्यन्त दिव्यदृष्टि रूप वैशिष्ट्य के कारण समान आकृतिवाले,
समान गुणवाले एवं समान क्रियावाले परमाणुओ में, मुक्त आत्माओं में और उनके
मनो में जो परस्पर व्यावृत्ति की बुद्धियाँ होती हैं, आकृति-भेद (गुणभेदादि) उनके
कारण नहीं हो सकते । अतः (यह कल्पना करनी पड़ती है कि कथित परमाणु
प्रभृति) प्रत्येक आधार में 'यह इससे विभिन्न प्रकार का है' इस आकार की
व्यावृत्तिबुद्धि जिन कारणों से होती है, वे ही 'विशेष' हैं ।
७६८ न्यायखण्डलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ विशेषनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
परमाणुषु मुक्तात्ममनस्सु चान्यनिमित्तासम्भवाद् येभ्यो निमित्तेभ्यः
बड़ा है या इसके गले में बहुत बड़ा घण्टा है । इसी प्रकार हम लोगों से
सर्वथा उत्कृष्ट योगियों को सभी परमाणुओं में नित्य एवं समान आकृति के
रहते हुए भी 'यह परमाणु उस परमाणु से भिन्न है' इस प्रकार की व्यावृत्ति
की प्रतीति जिस कारण से होती है, वही 'विशेष' है । मुक्त आत्माओं में सर्वथा
न्यायकन्दली
यथास्मदादीनां गवादिव्यक्तिषु प्रत्ययभेदो भवति, तथा परमाण्वादिष्वपि तद्दर्शिनां
परस्परापेक्षया प्रत्ययभेदेन भवितव्यम्, व्यक्तिभेदसम्भवात् । न चास्य व्यक्तिभेद एव
निमित्तम् । तदुपलम्भेऽपि स्थाण्वादिषु संशयदर्शनात् । निमित्तान्तरं च नास्ति,
आकृतेर्गुणस्य क्रियायाश्च तुल्यत्वात् । न च निर्निमित्तः प्रत्ययभेदो दृष्टः, तस्माद् यदस्य
निमित्तं स विशेष इति । देशविप्रकर्षेण कालविप्रकर्षेण च दृष्टाः परमाणवः कस्यचित्
प्रत्यभिज्ञाविषयाः सामान्यविशेषवत्त्वाद् घटादिवत् । न च पूर्वदृष्टेऽर्थे प्रत्यभिज्ञानं
विशेषावगतिमन्तरेण भवति, अतोऽस्ति तस्य निमित्तं विशेषः ।
अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार हम जैसे साधारण जनों को गो प्रभृति
व्यक्तियों में विभिन्न प्रकार की प्रतीतियाँ होती हैं; क्योंकि वे व्यक्तियों परस्पर
विभिन्न होती हैं । इसी प्रकार परमाणु प्रभृति व्यक्तियों में भी परस्पर भेद रहने के
कारण उन्हें प्रत्यक्ष देखनेवाले योगियों की उनमें से प्रत्येक में परस्पर व्यावृत्तिबुद्धि
होनी ही चाहिए । परमाणु प्रभृति में योगियों की इस व्यावृत्तिबुद्धि का कारण
उनका परस्पर भेद नहीं हो सकता; क्योंकि स्थाणु प्रभृति में पुरुषादि का भेद
उपलब्ध होने पर 'अयं स्थाणुः पुरुषो वा' इत्यादि संशय ही होते हैं । योगियों की
उन व्यावृत्तिबुद्धियों का कोई दूसरा कारण उपलब्ध नहीं होता है; क्योंकि परमाणु
प्रभृति की आकृति और क्रिया प्रभृति समान हैं (अतः उनसे यहाँ व्यावृत्तिबुद्धि
उत्पन्न नहीं हो सकती) । बिना विशेष कारण के प्रतीतियों की विभिन्नता कहीं
उपलब्ध नहीं होती । तस्मात् योगियों की उन व्यावृत्तिबुद्धियों के जो कारण हैं, वे
ही 'विशेष' हैं । (इस प्रसङ्ग में यह अनुमान भी है कि) जिस प्रकार परसामान्य
और विशेष (अपरसामान्य) से युक्त होने के कारण किसी व्यक्ति की प्रत्यभिज्ञा के
द्वारा घटादि ज्ञात होते हैं, उसी प्रकार एवं उन्हीं हेतुओं से विभिन्न स्थानों
और विभिन्न समयों में देखे गये परमाणु भी किसी की प्रत्यभिज्ञा के द्वारा ही
ज्ञात होते हैं । किसी 'विशेष' ज्ञान के बिना पहले देखी हुई वस्तु का प्रत्यभिज्ञान
नहीं हो सकता, अतः परमाण्वादिविषयक प्रत्यभिज्ञानों का जो असाधारण कारण
है, वही 'विशेष' है ।
ऽप्रकरणम्] । भाषानुवादसहितम् ७६९
प्रशस्तपादभाष्यम्
प्रत्याधारं विलक्षणोऽयं विलक्षणोऽयमिति प्रत्ययव्यावृत्तिः, देशकालविप्रकर्षे च
परमाणौ स एवायमिति प्रत्यभिज्ञानं च भवति, तेऽन्त्या विशेषाः । यदि
पुनरन्त्यविशेषमन्तरेण योगिनां योगजाद् धर्मात् प्रत्ययव्यावृत्तिः प्रत्यभिज्ञानं च
साम्य के रहते हुए भी 'यह आत्मा उस आत्मा से भिन्न है' इस
आकार की व्यावृत्ति प्रतीति जिस हेतु से होती है, वही 'विशेष' है।
इसी प्रकार सभी मनों में परस्पर सादृश्य के रहते हुए भी योगियों
को जिस कारण से 'यह मन उस मन से भिन्न है' इस आकार
की व्यावृत्ति-बुद्धि उत्पन्न होती है, वही 'विशेष' है। इसी प्रकार
विभिन्न समयों में या विभिन्न देशों में रहनेवाले परमाणुओं में भी
'यह वही है' इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा योगियों को जिन हेतुओं से
होती है, वे अन्तों में रहने वाले 'विशेष' ही हैं। योग से उत्पन्न केवल
विशेष प्रकार के धर्म से ही योगियों की व्यावृत्ति की उक्त प्रतीति
न्यायकन्दली
अत्र चोदयति- यदि पुनरिति । यथा योगजधर्मसामर्थ्याद् योगिनामतीन्द्रियार्थदर्शनं
भवति, तथा विशेषमन्तरेणैव प्रत्ययव्यावृत्तिः प्रत्यभिज्ञानं च भविष्यतीति चोदनार्थः ।
समाधत्ते-नैवमिति । यथा योगिनामशुक्ले शुक्लप्रत्ययो न भवति,
अत्यन्तादृष्टे च प्रत्यभिज्ञानं न स्यात् । यदि स्यात् ? मिथ्याप्रत्ययो भवेत् ।
'यदि पुनः' इत्यादि से इसी प्रसङ्ग में पुनः आक्षेप करते हैं। आक्षेप करनेवालों
का अभिप्राय है कि जिस प्रकार योग से उत्पन्न विशेष धर्मरूप विशेष सामर्थ्य के
कारण योगियों को परमाण्वादि अतीन्द्रिय विषयों का भी प्रत्यक्ष होता है, उसी
विशेष सामर्थ्य के द्वारा योगियों को उक्त व्यावृत्तिबुद्धि और उक्त प्रत्यभिज्ञान दोनों
ही हो सकते हैं, इसके लिए विशेष पदार्थ की कल्पना अनावश्यक है। 'नैवम्'
इत्यादि से इसी का समाधान करते हैं। अर्थात् जिस प्रकार योगियों को भी
अशुक्ल द्रव्य में शुक्ल की प्रतीति नहीं होती है, उसी प्रकार पहले बिना देखी हुई
वस्तु की प्रत्यभिज्ञा योगियों को भी नहीं हो सकती। यदि होगी (योगियों को
शुक्ल में अशुक्ल की प्रतीति और अज्ञात वस्तु की प्रत्यभिज्ञा यदि होगी) तो वह
मिथ्या ही होगी । अतः योगियों को कथित परमाण्वादि में उक्त परस्पर व्यावृत्ति
की प्रतीति 'विशेष' पदार्थ को माने बिना केवल योगजनित विशेष धर्म से नहीं हो
सकती। योगज धर्म से योगियों के अतीन्द्रिय अर्थों के ज्ञानों में भी योगज धर्म के
अतिरिक्त विषयादि निमित्तों की अपेक्षा होती है।
७७० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ विशेषनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
स्यात् ? ततः किं स्यात् ? नैवं भवति । यथा न योगजाद् धर्मादशुक्ले
शुक्लप्रत्ययः सञ्जायते, अत्यन्तादृष्टे च प्रत्यभिज्ञानम् । यदि स्यान्मिथ्या
भवेत् । तथेहाप्यन्त्यविशेषमन्तरेण योगिनां न योगजाद् धर्मात् प्रत्ययव्यावृत्तिः
प्रत्यभिज्ञानं वा भवितुमर्हति ।
अथान्त्यविशेषेष्विव परमाणुषु कस्मान्न स्वतः प्रत्ययव्यावृत्तिः
कल्प्यत इति चेत् ? न, तादात्म्यात् । इहातादात्मकेष्वन्यनिमित्तः प्रत्ययो
और प्रत्यभिज्ञा की उपपत्ति सम्भव नहीं है; क्योंकि जिस प्रकार शुक्ल
रूप से शून्य द्रव्य में शुक्ल की प्रतीति एवं पहले से न देखी हुई वस्तुओं
में प्रत्यभिज्ञा ये दोनों ही योगियों को भी नहीं होती हैं, यदि हों तो वे
मिथ्या ही होंगी । इसी प्रकार कथित स्थलों में भी व्यावृत्ति-प्रतीतियाँ
और प्रत्यभिज्ञा ये दोनों बिना अन्त्य-विशेष के केवल योगजनित उत्कृष्ट
धर्म से योगियों को भी नहीं हो सकतीं ।
(प्र.) यह कल्पना क्यों नहीं करते कि अन्त्य-विशेषों की तरह
उक्त परमाणुओं में भी व्यावृत्ति-प्रतीतियाँ स्वतः (बिना और किसी
न्यायकन्दली
तथा अन्त्यविशेषमन्तरेण प्रत्ययव्यावृत्तिः प्रत्यभिज्ञानं च न भवितुमर्हति । योगजाद्
धर्मादतीन्द्रियार्थदर्शनं न पुनरसन्मात्रिनिमित्त एव प्रत्ययो भविष्यतीत्यभिप्रायः ।
पुनश्चोदयति- अथान्त्यविशेषेष्विति । न तावदन्त्यविशेषेष्वपि विशेषान्तरसम्भ-
वोऽनवस्थानात् । यथा च तेषु विशेषान्तरमन्तरेण स्वत एव प्रत्ययव्यावृत्तिर्भवति योगिनां
तथा परमाणुष्वपि भविष्यति ? किं विशेषकल्पनयेत्यत्रोत्तरमाह- नेति ।
यत्त्वयोक्तं तन्न, कुतस्तादात्म्यात् । एतदेव विवृणोति-इहेति ।
'अथान्त्यविशेषेषु' इत्यादि ग्रन्थ से इसी प्रसङ्ग में पुनः आक्षेप करते हैं ।
अर्थात् कथित 'अन्त्यविशेषों' में दूसरे 'विशेष' की सम्भावना नहीं है;
क्योंकि (ऐसी कल्पना करने पर) अनवस्थादोष होगा । यह जो आक्षेप किया
गया है कि विशेषों में दूसरे विशेषों के न रहने पर भी जैसे कि स्वतः
उनमें परस्पर व्यावृत्तिबुद्धि योगियों को होती है वैसे ही परमाणु प्रभृति में
स्वतः ही व्यावृत्तिबुद्धि होगी । इसके लिए 'विशेष' नाम के स्वतन्त्र पदार्थ को
मानने की क्या आवश्यकता है ? उसी (आक्षेप) के समाधान के लिए 'न'
इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् तुमने जो आक्षेप किया है वह ठीक
नहीं है; क्योंकि परमाणु प्रभृति में 'परस्पर तादात्म्य' है । इसी 'तादात्म्य' हेतु का