वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७६३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७६३
न्यायकन्दली
तत्र गौरेव वक्तव्यो नञा यः प्रतिषिध्यते ।
गव्यसिद्धे त्यगौर्नास्ति तदभावे तु गौः कुतः ॥ इति ।
अथान्यापोहः शब्दार्थोऽनारोपितबाह्यत्वम् ? तत्राप्युच्यते, कोऽयमपोहो नाम ? किम-
गोरपोहो भावोऽभावो वा ? यदि भावः, स किं गोपिण्डस्वभावोऽथागोपिण्डात्मकः ?
गोपिण्डात्मकत्वे तावदस्यासाधारणता, न चासाधारणात्मकेऽर्थे शब्दप्रवृत्तिरित्युक्तम् ।
अगोपिण्डात्मकत्वेऽप्ययमेव दोषो दूषणान्तरं चैतदधिकम् । यद् गोशब्दस्य गौरित्ययमर्थो न
प्राप्नोति । यदि तु पिण्डव्यतिरिक्तमनेकसाधारणं वस्तुभूतमपोहतत्त्वमिष्यते ? शब्दमात्र-
विषया विप्रतिपत्तिः । अथापोहोऽन्यव्यावृत्तिरूपत्वादभावस्वभाव इष्यते ? तदास्य प्रत्ययत्वेन
ग्रहणं न स्यात्, ज्ञानजनकस्यैव ग्राह्यलक्षणत्वात् । अभावस्य च समस्तार्थक्रियाविरहलक्षण-
(फलतः) गो की सिद्धि के बिना 'अगो' की सत्ता सिद्ध नहीं की जा सकती ।
एवं 'अगो' की सिद्धि के बिना (तद्व्यावृत्ति-बुद्धि के विषय) गो की सत्ता ही किस
प्रकार सिद्ध की जा सकती है ?
(प्र.) अपोह शब्द के द्वारा आरोपित बाह्यत्व से भिन्न किसी ऐसे अर्थ का
बोध होता है, जिसका बाह्यत्व रूप से आरोप न हो । (उ.) इस प्रसङ्ग में पूछना है
कि 'अगो' का यह 'अपोह' कौन-सी वस्तु है ? भाव रूप है? अथवा अभाव रूप
है? यदि 'भाव रूप है' तो फिर इस प्रसङ्ग में पूछना है कि (यह भावरूप अपोह)
गोव्यक्ति स्वभाव का है? अथवा 'अगो' व्यक्तियों के स्वभाव का है? यदि उसे
'गोव्यक्ति' स्वरूप मानें, तो यह अपोह 'असाधारण' (एकमात्र पुरुषग्राह्य) होगा ।
पहले कह चुके हैं कि असाधारण अर्थ में शब्द की प्रवृत्ति नहीं होती है । यदि
'अगो' पिण्ड स्वरूप मानें तो फिर उक्त असाधारण्य रूप दोष तो है ही, यह दोष
और अधिक है कि 'गो' शब्द से 'गो'रूप अर्थ का ग्रहण नहीं होगा । यदि
सभी गोपिण्डों में रहनेवाला अथ च गोपिण्डों से भिन्न कोई 'भाव' पदार्थ ही
'अपोह' हो तो फिर हम दोनों का विवाद 'सामान्य' शब्द और 'अपोह' शब्द के
प्रसङ्ग में ही रह जायेगा । यदि अपोह को अन्यव्यावृत्तिरूप होने के कारण
अभावरूप मानें तो फिर विज्ञानत्वरूप से उसका ग्रहण न हो सकेगा; क्योंकि विज्ञान
वही है जो किसी ज्ञान का जनक हो । किसी भी अर्थक्रिया के सामर्थ्य से शून्य को
ही 'अभाव' कहते हैं । इस प्रकार अभावरूप अपोह में किसी शब्द की प्रवृत्ति ही
नहीं होगी । (अपोह में शब्दों की प्रवृत्ति मान लेने पर भी) श्रोता को उस शब्द
'सिद्धश्च गौरपोहेत' इस प्रकार है । किन्तु विषयविवेचन की दृष्टि से 'सिद्धश्चागौरपोहेत'
ऐसा पाठ उचित है । चौखम्भा से मुद्रित श्लोकवार्त्तिक में ऐसा ही पाठ है भी । तदनुसार ही
अनुवाद किया गया है ।
७६४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
न्यायकन्दली
त्यात् । न च प्रत्यक्षागृहीतेऽर्थे सङ्केतग्रहणमस्तीत्यभावे शब्दस्याप्रवृत्तिरेव । न च तस्मिन्
प्रतीयमाने श्रोतुरर्थविषया प्रवृत्तिः स्यात्, भावाभावयोरन्त्यादसम्बन्धाच्च ।
स्वलक्षणात्मकत्वेनाभावप्रतीतावविवेकेन स्वलक्षणे प्रवृत्तिरिति चेत् ? १दृश्य-
विकल्प्यावर्थावेकीकृत्यात्तत्संन्निवेशिभ्यो भ्रान्त्या प्रतिपत्तिः प्रतिपत्तृणामिति । तदयुक्तम् ।
अप्रतीते तदात्मकतया अभावसमारोपानुपपत्तेः । न च श्रोतुस्तदानीमर्थप्रतिपत्तिरस्ति शब्द-
स्यातद्विषयत्वात् प्रमाणान्तरस्याभावात् । अस्ति च शब्दार्थे प्रवृत्तिस्तस्मान्नाभावोऽपि
शब्दार्थः । न चान्यदेकं निमित्तं किञ्चिदस्ति । सर्वमिदमर्थजातं परस्परव्यावृत्तं प्रतिक्षणम-
पूर्वमपूर्वमनुभूयमानं न शब्दात् प्रतीयते । नापि प्रत्यक्षाप्रतीतमपि हानोपादानविषयो
भवेत्, अपरिज्ञातसामर्थ्यात् । अस्ति च शब्दो व्यवहारः, अस्ति च प्राण-
से किसी भी भावार्थ में प्रवृत्ति नहीं होगी; क्योंकि (घटादि) भाव और उनमें
रहनेवाला (अपोहरूप) अभाव दोनों भिन्न हैं । एवं परस्पर विरोधी होने से अपोह
एवं घटादि पदार्थ दोनों का सम्बन्ध भी सम्भव नहीं है । (प्र.) घटादि की
स्वलक्षणा प्रतीति और अपोह की प्रतीति दोनों में भेद-बुद्धि न रहने के कारण
(अपोह के वाचक घटादि शब्दों से घटादिविषयक) प्रवृत्तियाँ होती हैं । जैसा कि
आचार्यों ने कहा है कि-
'दृश्य अर्थ और समारोपित अर्थ जो वस्तुतः परस्पर सम्बद्ध नहीं हैं, उन
दोनों को एक समझकर ही सुननेवाले की तद्विषयक प्रवृत्ति उत्पन्न होती है ।
(उ.) किन्तु यह कहना भी अयुक्त है । अज्ञात वस्तु (भाव) में अभिन्न रूप से
अभाव (अपोह) का आरोप भी नहीं किया जा सकता । उस समय (शब्द को
सुनने के बाद) श्रोता को अर्थ का ज्ञान नहीं है; क्योंकि शब्द प्रामाणिक (गवादि)
अर्थों का बोधक प्रमाण नहीं है । एवं उस समय शब्द को छोड़ दूसरा प्रमाण उपस्थित
भी नहीं है; किन्तु शब्द से (घटादि) अर्थों में प्रवृत्ति होती है । अतः (घटादि शब्दों
के घटत्वादि रूप से घटादि भाव ही अर्थ हैं, अपोह रूप से) अभाव नहीं ।
(घटत्वादि) सामग्रियों को छोड़कर शब्दों का कोई एक (प्रवृत्ति) निमित्त नहीं है ।
यह कहना भी सम्भव नहीं है कि जितने भी अर्थ उत्पन्न होते हैं वे सभी परस्पर भिन्न
हैं और प्रतिक्षण नये-नये ही उत्पन्न होते हैं और उन्हीं अर्थों का शब्द से अनुभव
होता है । एवं (सामान्य के न मानने पर) प्रत्यक्ष के द्वारा अज्ञात व्यक्तियों में प्रवृत्ति
और निवृत्ति नहीं होगी, (किन्तु प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात व्यक्ति के सजातीय) उन
- यहाँ मुद्रित पाठ को यथावत् मानना उचित नहीं जान पड़ता । अतः "दृश्यविकल्प्यौ"
इसके पहले 'यथोक्तम्' इतना अधिक जोड़कर एवं 'प्रतिपत्तिः' इसके स्थान में 'प्रवृत्तिः'
ऐसा पाठ मानकर अनुवाद किया गया है । ये दोनों ही पाठभेद नीचे के पाठभेदों में भी
मुद्रित हैं ।