वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७५७
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७५७
न्यायकन्दली
मह्यादिव्यावृत्तं किञ्चिदेकं रूपमाक्षिपति, १ एकार्थक्रियाकारित्वादेकहेतुत्वाच्च । गोव्यक्ती-
नामेकत्वमिति चेत् ? नासति सामान्ये व्यक्तीनामिव व्यक्तिहेतूनां व्यक्तिकार्याणामपि परस्पर-
व्यावृत्तानामेकत्वात् २ । किञ्च, यद्येकहेतुत्वादेकत्वम्, भिन्नकारणप्रभवाणां व्यक्तीनामेकत्वं
न स्यात् । दृश्यते चाभिन्नस्वभावानामपि कारणभेदो यथा वह्नेर्दारुनिर्मथनाद् विद्युत् आदित्य-
गभस्तिक्षोभितात् सूर्यकान्तादपि मणेरुत्पत्तिः । एककार्यत्वादेकत्वे च विजातीयाना-
में रहनेवाले किसी एक धर्म की कल्पना आवश्यक हो जाती है । (प्र.) सभी
व्यक्ति यतः एक ही प्रकार के कार्यों के सम्पादक हैं एवं एक ही प्रकार की
सामग्रियों से उत्पन्न होती हैं, अतः सभी गोव्यक्ति एक ही हैं (इसी एकत्व के
कारण एकाकार की प्रतीतियाँ होती हैं) । (उ.) जिस प्रकार सामान्य के न रहने
पर व्यक्तियों की एकता सम्भव नहीं है, उसी प्रकार व्यक्तिरूप कार्यों और व्यक्ति
के कारणों की एकता भी सम्भव नहीं है; क्योंकि व्यक्तियों की तरह उनके कार्य
और उनके कारण भी तो परस्पर विभिन्न हैं, उनमें रहनेवाले सामान्यों के बिना
उनमें भी एकत्व का सम्पादक कौन होगा ? दूसरी बात यह है कि यदि एक
प्रकार की सामग्री से उत्पन्न होना ही व्यक्तियों में एकरूपता का कारण हो तो
फिर भिन्न प्रकार की सामग्री से एक प्रकार के कार्य की उत्पत्ति न हो सकेगी;
किन्तु सभी अग्नियों का एक प्रकार का स्वभाव होते हुए भी उनके कारण भिन्न-
भिन्न हैं, यतः कभी काष्ठों के मन्थन से, कभी विद्युत् से और कभी सूर्य की
किरणों से क्षुभित सूर्यकान्त मणि से वह्नि की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार यदि
एक प्रकार के कार्यों के उत्पादक होने से ही व्यक्तियों में एकता मानी जाय तो
कुछ विजातीय वस्तुओं में भी एकता माननी पड़ेगी; क्योंकि दोहन, वाहनादि
क्रियायें समान रूप से गोप्रभृति व्यक्तियों से और महिषादि व्यक्तियों से भी उत्पन्न
होती हैं । (एवं एककार्यकारित्व को यदि एकता का प्रयोजक मानें तो फिर)
जिन गोव्यक्तियों से दोहन, भारवाहनादि क्रियायें सम्पादित ही नहीं होतीं, उनमें
- मुद्रित पुस्तक में 'रूपमाक्षिपति' इस वाक्य के आगे पूर्ण विराम नहीं है । 'एकार्थ-
क्रियाकारित्वादेकहेतुत्वाच्च' इस वाक्य के आगे पूर्ण विराम है, जिससे सङ्गति ठीक नहीं
बैठती है । अतः 'रूपमाक्षिपति' इसी वाक्य के आगे पूर्णविराम देकर और आगे के वाक्य
को पूर्वपक्षियों के साधक हेतुओं का बोधक मानकर अनुवाद किया गया है । - इस सन्दर्भ में 'परस्परव्यावृत्तानामेकत्वात्' यह मुद्रित पाठ उचित नहीं जान पड़ता,
इसे प्रथमान्त होना चाहिए । आगे के 'भिन्नकारणप्रभवाणामेकत्वम्' इस प्रथमान्त पाठ से
यह और स्पष्ट हो जाता है । अतः उक्त पाठ को प्रथमान्त मानकर ही अनुवाद किया
गया है ।
७५८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
न्यायकन्दली
मप्येकत्यापत्तिः, दृष्टा हि वाहदोहनादिक्रिया गवादिव्यक्तिनामिव महिष्यादि-
व्यक्तीनामपि । या च गौर्न दुह्यते न च वाह्यते, सा गौर्न स्यात् ।
अपि च सामान्याभावे कोऽर्थः शब्दसंसर्गविषयः ? न तावत् स्वलक्षणम्, तस्य
क्षणिकस्य सर्वतो व्यावृतस्य सङ्केतविषयत्वाभावात् । नापि विकल्पः शब्दार्थः, तस्य
क्षणिकत्वादसाधारणत्वाच्च । विकल्पाकारः शब्दार्थ इति चेत् ? किं विकल्पाकारो
विकल्पव्यतिरिक्तः ? अव्यतिरिक्तो वा ? यदि भिन्नः, स किं सर्वविकल्पसाधारणः, किं
वा प्रतिविकल्पं भिद्यते ? साधारणत्वे तावदेतस्य सामान्यादभेदः, यदि परम् ? तव
ज्ञानधर्मोऽयमस्माकं चार्थधर्मः (इति) बहिर्मुखतया प्रतीयमानत्वादिति (न) कश्चिद्
विशेषः । यदि व्यतिरिक्तोऽयमाकारः प्रतिज्ञानं भिद्यते, अथवा ज्ञानाद्व्यतिरिक्त
एव, उभयथापि न शब्दसंसर्गयोग्यता, ज्ञानवदशक्यसङ्केतत्वात् । विकल्पः पारम्पर्येण
तदुत्पत्तिप्रतिबन्धाद् बाह्यात्मतया स्वाकारमारोप्य विकल्पयति, तत्रायं शब्दसंसर्ग
एक आकार की कथित प्रतीति नहीं होगी । एवं जिस गाय से न दूध मिलता है
और न माल ढोया जाता है वह गाय ही नहीं रह जायगी ।
दूसरी बात यह है कि यदि सामान्य नाम की कोई वस्तु ही न हो तो शब्दों
का (सङ्केत रूप) सम्बन्ध कहाँ मानेंगे ? घटादि विषयों के 'स्वलक्षण' में घटादि
शब्दों का सम्बन्ध मान नहीं सकते; क्योंकि उक्त 'स्वलक्षण' तो क्षणिक है एवं
और किसी भी वस्तु में वह नहीं रहता है, अतः उसमें किसी भी शब्द का (सङ्केत
या) सम्बन्ध नहीं हो सकता । उसका विकल्प भी शब्दसङ्केत का विषय नहीं हो
सकता; क्योंकि 'विकल्प' भी क्षणिक है और साथ-साथ असाधारण (एकमात्र
पुरुषवृत्ति) भी है । (प्र.) एक व्यक्तिव्यक्ति क्षणिक और असाधारण है; किन्तु
विकल्पों के आकार तो असाधारण हैं (क्योंकि एक आकार के अनेक विकल्प
अनेक पुरुषों में देखे जाते हैं), अतः विकल्प का आकार शब्दसङ्केत का विषय हो
सकता है । (उ.) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि विकल्प का यह आकार विकल्प से
भिन्न कोई स्वतन्त्र वस्तु है ? या यह विकल्प से अभिन्न (वस्तुतः विकल्प ही)
है ? यदि पहला पक्ष मानें (कि विकल्प का आकार विकल्प से भिन्न स्वतन्त्र वस्तु
है) तो फिर इस प्रथम पक्ष के प्रसङ्ग में भी यह पूछना है कि यह 'आकार' सभी
विकल्पों में साधारण रूप से रहनेवाली एक ही वस्तु है ? या प्रत्येक विकल्प में
रहनेवाला आकार अलग-अलग है ? यदि सभी विकल्पों में साधारण रूप से
रहनेवाले एक 'आकार' को स्वीकार कर लिया जाय, तो वह सामान्य से अभिन्न
ही होगा । फलतः सामान्य स्वीकृत ही हो गया । थोड़ा अन्तर इतना रह जाता है
कि उसे (आकार को) आप ज्ञानों का धर्म मानते हैं और हम लोग उसे (सामान्य
को) बहिर्मुखतया प्रतीत होने से विषयों का धर्म मानते हैं । यदि आकार को
विकल्प से भिन्न मानें तो फिर वह ज्ञान से भिन्न ही होगा या ज्ञान स्वरूप ही होगा ।
दोनों ही स्थितियों में उनमें शब्दों के सम्बन्ध की सम्भावना नहीं रहेगी; क्योंकि ज्ञान
की तरह (उससे भिन्न या अभिन्न आकार भी क्षणिक होने के कारण) शब्दसङ्केत