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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४९
न्यायकन्दली
द्वे वस्तुनी प्रतिभासयति । नापि तयोर्विशेषण-विशेष्यभावः ,गोत्वा 1गोत्ववानित्येयमनुदयात्;
किन्तु तादात्म्यग्राहिणी प्रतीतिरियम्, गौरयमित्येकात्मतापरामर्शात्, उभयोरन्योन्यप्रहाणेन
स्वरूपान्तराभावाच्च । अनुवृत्तता हि गोत्वस्यैव सामान्यान्तरस्यापि स्वरूपम्, व्यावृत्ततापि
गोव्यक्तेर्व्यक्त्यन्तराणामपि स्वभावः । सामान्यान्तरव्यावृत्तं तु गोत्वस्य स्वरूपम्,
व्यक्त्यन्तरव्यावृत्तिश्च गोव्यक्तेः स्वभावः परस्परान्यतामन्तरेणान्यो न शक्यते निर्देष्टुम् ।
जिस प्रकार 'दण्डी पुरुषः' इत्यादि विशिष्टबुद्धियों में दण्ड और पुरुष दोनों में
से एक सामान्यविधया और दूसरा व्यक्तिविधया स्पष्ट रूप से प्रतिभासित होता है,
उस प्रकार से 'अयं गौः, अयं गौः' इत्यादि आकार के अनुवृत्तिप्रत्ययों में गोत्वादि
सामान्य रूप से और गोप्रभृति विशेष (व्यक्ति) रूप से प्रतिभासित नहीं होते ।
एवं उक्त प्रतीतियों में गो विशेष्य रूप से और गोत्व विशेषण रूप से भी
प्रतिभासित नहीं होते; क्योंकि ऐसी बात होती तो प्रतीति का अभिलाप 'गौः1
गोत्वन्' इस आकार का होता ('अयं गौः' इस आकार का नहीं) । तस्मात् 'अयं
गौः' यह प्रतीति तादात्म्यविषयक है; क्योंकि 'अयम्' पदार्थ और 'गौः' पदार्थ
दोनों के एकरूपत्व का ही उससे परामर्श होता है । दूसरी युक्ति यह भी है कि गो
को छोड़कर गोत्व का कोई अपना स्वरूप नहीं है एवं गोत्व को छोड़कर गो
का भी कोई स्वरूप नहीं है; क्योंकि केवल अनुवृत्तत्व जैसे गोत्व जाति में है,
वैस ही अश्वत्वादि जातियों में भी है । एवं केवल व्यावृत्तत्व (अर्थात् स्वभिन्न-
भिन्नत्व) जैसे गो व्यक्ति में है, वैसे ही अश्वादि व्यक्तियों में भी है, अतः गोत्व
का ऐसा ही स्वरूप मानना पड़ेगा जो दूसरे सामान्यों में न रहे एवं गोव्यक्ति

  1. मुद्रित न्यायकन्दली में 'गोत्वा गोत्ववान्' ऐसा पाठ है । यह तो स्पष्ट है कि इसमें एक 'ए'
    का चिह्न छूट गया है । अतः 'गोत्वो गोत्ववान्' ऐसा पाठ संशोधक को अभिप्रेत मालूम
    होता है । किन्तु सो भी ठीक नहीं जँचता; क्योंकि प्रथम विकल्प में कहा गया है कि 'अयं
    गौः' इस आकार की प्रतीति में गो का व्यक्तिविधया और गोत्व का जातिविधया भान नहीं
    होता है । इसके बाद 'नापि तयोः' इत्यादि से जो विकल्प किया गया है, उसमें द्विवचनान्त
    'तयोः' पद से गो और गोत्व इन्हीं दोनों का ग्रहण समुचित जान पड़ता है । 'किन्तु
    तादात्म्यग्राहिणी' इत्यादि से इस विकल्प का खण्डन किया गया है कि 'अयं गौः' यह
    प्रतीति 'इदम्' पदार्थ में गो के तादात्म्यविषयक ही है । इससे भी इसी प्रतिषेध का आक्षेप
    होता है कि 'अयं गौः' यह प्रतीति गोविशेष्यक एवं गोत्वविशेषणक नहीं है । यदि ऐसी
    बात है तो फिर 'गौः गोत्ववान्' ऐसा ही पाठ उचित है । अतः तदनुसार ही अनुवाद
    किया गया है ।

७५० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
न्यायकन्दली
न च तस्य स एव स्वभावः सं एव च सम्बन्धीत्युपपद्यते, निःस्वभावस्य सम्बन्धाभावात् ।
तस्माज्जातिव्यक्त्योः परस्परात्मकतैव तत्त्वम् । एवं सति भेदाभेदवादोऽपि सिद्धयति । यथा
हि शाबलेयो गौरित्येवं प्रतीयते तथा बाहुलेयोऽपि । न चास्ति कस्यचिद् बाधः शाबलेय
एव गौर्न बाहुलेय इति; किन्तु सर्वेषामेकमतित्त्वमेव 'स गौरयमपि गौरिति' । तत्र
प्रतीतिबलेन शाबलेयात्मकस्य गोत्वस्य बाहुलेयात्मकत्वे सिद्धे शाबलेयाद् भेदोऽपि
सिद्धयति । अयमेव हि सामान्यस्य पूर्वपिण्डाद् भेदो यत् पिण्डान्तरात्मकत्वम् । इदमेव
च सामान्यरूपत्वं यदुभयात्मकत्वम् । भेदाभेदावेकस्य विरुद्धाविति चेत् ? न, युक्तिज्ञस्य
भवतः साम्प्रतमेतदभिधातुम् । तद्विरुद्धं यत्र बुद्धिर्विपर्य्येति । यत्तु सर्वदा प्रमाणेन तथैव
प्रतीयते, तत्र विरोधाभिधानमेव विरुद्धम् ।
अन्यत्रैवं न दृष्टमिति चेत् ? किं वै प्रत्यक्षमपि अनुमानमिव दृष्टमनु-
का स्वरूप भी ऐसा ही मानना पड़ेगा जो अश्वादि व्यक्तियों में न रहे । अतः इन
दोनों स्वरूपों का उपयुक्त निर्णय तभी हो पायेगा, जब कि गोव्यक्ति और गोत्व
जाति दोनों में तादात्म्य मान लें । अर्थात् ऐसा मान लें कि गोत्वाभिन्नत्व ही
गोव्यक्ति का स्वभाव है एवं गोव्यक्तियों से अभिन्न रहना ही गोत्व जाति का स्वभाव
है । ऐसा तो हो नहीं सकता कि वही उसका स्वभाव भी हो और वही उसका सम्बन्धी
भी हो; क्योंकि किसी स्वभाव से युक्त वस्तु में ही किसी का सम्बन्ध होता है । बिना
स्वभाव के वस्तु में किसी का सम्बन्ध सम्भव नहीं है । तस्मात् 'जाति व्यक्तिस्वरूप है
और व्यक्ति भी जातिस्वरूप ही है' यही सिद्धान्त ठीक है । ऐसा मान लेने पर जाति
और व्यक्ति में परस्पर भेद और अभेद दोनों की ही सिद्धि (प्रतीतियों के भेद से) हो
सकती है । जिस प्रकार शाबलेय गो में 'यह गो है' इस आकार की प्रतीति होती है,
उसी प्रकार बाहुलेय नाम के गो में भी 'यह गो है' इस प्रकार की प्रतीति होती है ।
ऐसी कोई बाधबुद्धि भी नहीं है कि शाबलेय ही गो है बाहुलेय नहीं; किन्तु यही सबों
का अनुभव है कि 'शाबलेय' भी गो है एवं 'बाहुलेय' भी गो है । इस स्थिति में
शाबलेय गो के स्वरूप गोत्व में बाहुलेय गो की स्वरूपता जिस प्रकार सिद्ध होती है,
उसी प्रकार गोत्व में शाबलेय गो के भेद की भी सिद्धि होती है । (गोत्व रूप)
सामान्य में पूर्वपिण्ड (शाबलेय गोरूप पिण्ड) का भेद इसीलिए है कि सामान्य
(गोत्व) पिण्डान्तर (बाहुलेय गोरूप दूसरा पिण्ड) स्वरूप है । सामान्यरूपता
इसलिए है कि वह उभयात्मक है । (उ.) एक ही वस्तु में एक ही वस्तु का भेद
और अभेद दोनों का रहना परस्पर 'विरुद्ध' है ? (प्र) युक्तियों से अभिज्ञ
आप जैसे व्यक्ति का ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि 'विरुद्ध' वही कहलाता
है जिसमें कि बुद्धि का विपर्यास हो । जो बराबर प्रमाण के द्वारा उसी प्रकार
का प्रतीत होता है, उसको विरुद्ध कहना ही 'विरुद्ध' है । यदि यह