सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४७
प्रशस्तपादभाष्यम्
व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । एवं पृथिवीत्वरूपत्वोत्क्षेपणत्वगोत्वघटत्वपटत्वादीना-
मपि प्राण्यप्राणिगतानामनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यविशेषभावः सिद्धः ।
एतानि तु द्रव्यत्वादीनि प्रभूतविषयत्वात् प्राधान्येन सामान्यानि, स्वाश्रय-
विशेषकत्वाद् भक्त्या विशेषाख्यानीति ।
होने से 'विशेष' भी है । इसी प्रकार प्राणियों में रहनेवाले और
अप्राणियों में रहनेवाले पृथिवीत्व, रूपत्व, उत्क्षेपणत्व, गोत्व, घटत्व, पटत्व
प्रभृति जातियों में भी अनुवृत्तिप्रत्ययजनकत्व हेतु से सामान्यत्व और
व्यावृत्तिप्रत्ययजनकत्व हेतु से विशेषत्व की सिद्धि समझनी चाहिए ।
द्रव्यत्वादि जातियाँ सामान्य के पूर्णलक्षण से युक्त होने के कारण वस्तुतः
सामान्य ही हैं; किन्तु अपने आश्रयों को अपने से भिन्न वस्तुओं से
पृथक् रूप में समझाने की योग्यता भी उनमें किसी अंश में संघटित
होती है, अतः उनमें 'विशेष' शब्द का भी गौणप्रयोग होता है ।
न्यायकन्दली
स्वरूपं वास्तवम् ? किं वा विशेषस्वरूपता ? आहोस्विदुभयस्वरूपता ? अत्राह-
एतानीति । समानानां भावः सामान्यमिति सामान्यलक्षणं द्रव्यत्वादिषु विद्यते, स्वाश्रयं
सर्वतो विशिनष्टीति विशेष इति तु लक्षणं नास्ति । अत एतानि मुख्यया वृत्त्या
सामान्यान्येव न विशेषाः, विशेषसंज्ञां तूपचारेण लभन्ते । विशेषो हि स्वाश्रयं सर्वतो
विशिनष्टि, द्रव्यत्वादिकमपि विजातीयेभ्यः स्वाश्रयस्य विशेषणमित्येतावता साधर्म्येणोप-
चारप्रवृत्तिः ।
प्राणियों में रहनेवाली जातियाँ हैं एवं घटत्व, पटत्व प्रभृति अप्राणियों में रहनेवाली
जातियाँ हैं । (प्र.) (द्रव्यत्वादि सामान्य और विशेष दोनों कहे गये हैं) इस प्रसङ्ग में
प्रश्न उठता है कि वे वास्तव में 'सामान्य' रूप हैं ? या वास्तव में वे 'विशेष' रूप
ही हैं ? अथवा उनके दोनों ही स्वरूप वास्तव हैं ? इन्हीं विकल्पों का समाधान
'एतानि' इत्यादि ग्रन्थ से दिया गया है । अर्थात् 'समानानां भावः सामान्यम्'
सामान्य का यह लक्षण द्रव्यत्वादि में पूर्ण रूप से है; किन्तु 'स्वाश्रयं सर्वतो
विशिनष्टीति विशेषः' (जो अपने आश्रय को इतर सभी पदार्थों से अलग करे,
वहीं 'विशेष' है) विशेष का यह लक्षण द्रव्यत्वादि में नहीं है (क्योंकि द्रव्यत्वादि
अपने आश्रयीभूत एक द्रव्य व्यक्ति से अपने आश्रयीभूत दूसरे द्रव्य व्यक्ति को
अलग नहीं समझा सकता), अतः द्रव्यत्वादि जातियाँ 'सामान्य' शब्द के ही
मुख्यर्थ हैं । उनमें 'विशेष' शब्द का लक्षणावृत्ति से ही प्रयोग होता है । अभिप्राय
यह है कि जिस प्रकार 'विशेष' पदार्थ अपने आश्रय को इतर सभी पदार्थों से
अलग रूप में रखता है, उसी प्रकार द्रव्यत्वादि सामान्य भी अन्ततः अपने आश्रय

७४८ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
लक्षणभेदादेषां द्रव्यगुणकर्मभ्यः पदार्थान्तरत्वं सिद्धम् । अत एव च नित्यत्वम् ।
द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों से इसका स्वरूप (लक्षण) भिन्न है,
अतः सिद्ध होता है कि यह सामान्य (द्रव्यादि की तरह) दूसरा ही
(स्वतन्त्र) पदार्थ है । यतः लक्षणभेद के कारण द्रव्यादि से यह भिन्न है,
अतः यह सिद्ध होता है कि सामान्य नित्य है ।
न्यायकन्दली
द्रव्यत्वादीनि द्रव्यादिव्यतिरिक्तानि न भवन्ति, अतस्तेषां पृथक् कार्यनिरूपण-
मन्याय्यमित्याह-लक्षणभेदादिति । अनुगताकारबुद्धिवेद्यानि द्रव्यत्वादीनि, व्यावृत्तिबुद्धि-
वेद्याश्च द्रव्यादिव्यक्तयः, तस्मादेषां द्रव्यत्वादीनां लक्षणभेदात् प्रतीतिभेदाद् द्रव्य-
गुणकर्मभ्यः पदार्थान्तरत्वम् । अत एव च नित्यत्वम् । यत एव सामान्यस्य द्रव्यादिभ्यो
भेदः, अत एव नित्यत्वम् । द्रव्याद्यभेदे सामान्यस्य द्रव्यादिविनाशे विनाशास्तदुत्पादे
चोत्पादः स्यात्, भेदे तु नायं विधिरवतिष्ठत इति ।
अत्रैके वदन्ति । भिन्नेष्वनुगता बुद्धिः सामान्यं व्यवस्थापयति ।
सा च प्रतिपिण्डं दण्डपुरुषादिव न स्वातन्त्र्येण सामान्यविशेषलक्षणे
को दूसरी जाति के आश्रयीभूत पदार्थों से तो अलग करते ही हैं, केवल इतने ही
सादृश्य के कारण द्रव्यत्वादि सामान्यों में भी 'विशेष' शब्द का लाक्षणिक प्रयोग होता है ।
किसी सम्प्रदाय का मत है कि द्रव्यत्वादि जातियाँ आश्रयीभूत द्रव्यादि व्यक्तियों
से भिन्न नहीं हैं, अतः उनका अलग से निरूपण करना उचित नहीं है । इसी
आक्षेप का समाधान 'लक्षणभेदात्' इत्यादि से किया गया है । अनुगत आकार की
प्रतीति के द्वारा ही द्रव्यत्वादि सामान्य समझे जाते हैं । द्रव्यादि व्यक्तियों का बोध
व्यावृत्तिबुद्धि से होता है । तस्मात् 'एषाम्' अर्थात् द्रव्यत्वादि सामान्यों के लक्षण
(द्रव्यादि व्यक्तियों के लक्षण से) भिन्न हैं, अतएव द्रव्यत्वादि सामान्य द्रव्यादि
व्यक्तियों से अलग स्वतन्त्र पदार्थ हैं । "अत एव च नित्यत्वम्" अर्थात् द्रव्यत्वादि
सामान्य यदि द्रव्यादि व्यक्तियों से अभिन्न होते, तो फिर द्रव्यादि के विनाश से उनका
भी विनाश होता एवं उनकी उत्पत्ति से उनकी भी उत्पत्ति होती । यदि द्रव्यत्वादि
सामान्य और द्रव्यादि व्यक्ति इन दोनों को भिन्न पदार्थ मान लेते हैं, तो यह स्थिति
नहीं उत्पन्न होती (अतः उनको नित्य मानते हैं) ।
इसी प्रसङ्ग में किसी सम्प्रदाय के लोगों का कहना है कि (प्र.) विभिन्न व्यक्तियों
में एक आकार की बुद्धि (अनुवृत्तिप्रत्यय) से ही सामान्य की सिद्धि की जाती है; किन्तु